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Barabanki News: सूफी संत की मजार पर होली की परंपरा पर मंडराया संकट
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Fri, 27 Feb 2026 01:16 AM IST
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देवा मजार पर होली खेलने का विहंगम दृश्य।
- फोटो : देवा मजार पर होली खेलने का विहंगम दृश्य।
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देवा। कौमी एकता और सद्भाव के प्रतीक महान सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार पर दशकों से चली आ रही होली खेलने की परंपरा इस वर्ष खतरे में पड़ गई है। जो मजार ‘जो रब वही राम’ के संदेश के साथ सौहार्द की मिसाल पेश करती रही है, वहां होली के रंग इस बार फीके पड़ सकते हैं।
पुरानी वारसी होली समिति द्वारा निजी कारणों से आयोजनों से हाथ खींच लेने के बाद, नवगठित देवा होलीकोत्सव समिति ने भी होली का जुलूस निकालने में असमर्थता जताई है, जिससे इस ऐतिहासिक परंपरा के भविष्य पर गहरा संशय बना हुआ है।
सदियों पुरानी परंपरा पर ग्रहण
सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार पर होली का उत्सव केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच प्रेम, भाईचारे और सौहार्द का जीवंत प्रमाण रहा है। देश के कोने-कोने से आने वाले वारिस भक्तों के लिए यह मजार कौमी एकता का केंद्र रही है, जहां होली के रंग मिलजुलकर खेले जाते थे। यह परंपरा सूफी संत के जीवनकाल से चली आ रही है, जिसे प्रसिद्ध कवि खुसरो वारिस पाक बेदम शाह वारसी ने अपनी रचनाओं में भी पिरोया है।
लगभग पांच दशक से अधिक समय से इस परंपरा को आगे बढ़ा रही वारसी होली समिति के अध्यक्ष शारदे आलम वारसी ने अपनी टीम के उम्रदराज होने के कारण स्वेच्छा से आयोजन से पीछे हटने की घोषणा की है। उन्होंने नई पीढ़ी से इस आयोजन को जारी रखने की अपील की थी। इसके बाद एक नई कमेटी का गठन हुआ, जिसके नवनियुक्त अध्यक्ष पंडित अवध किशोर मिश्रा ने पुलिस और प्रशासन को सूचित किया है कि वे होली खेलने के लिए केवल एक निश्चित सीमा क्षेत्र में सुबह नौ बजे से 12:30 बजे तक का समय निर्धारित करने पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने जुलूस निकालने में असमर्थता जताई।
पुलिस ने बुलाई बैठक
देवा कोतवाली के अतिरिक्त इंस्पेक्टर धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि शुक्रवार को पुरानी समिति, नई समिति, मजार ट्रस्ट के पदाधिकारियों और स्थानीय संभ्रांत लोगों की एक बैठक बुलाई गई है। उन्होंने आश्वासन दिया कि देवा की ऐतिहासिक होली का महत्व बरकरार रहे, इसके लिए उच्च अधिकारियों के साथ सभी पक्षों की वार्ता कराई जाएगी। प्रशासन इस बात का प्रयास कर रहा है कि इस सौहार्दपूर्ण परंपरा को किसी भी कीमत पर टूटने न दिया जाए।
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पुरानी वारसी होली समिति द्वारा निजी कारणों से आयोजनों से हाथ खींच लेने के बाद, नवगठित देवा होलीकोत्सव समिति ने भी होली का जुलूस निकालने में असमर्थता जताई है, जिससे इस ऐतिहासिक परंपरा के भविष्य पर गहरा संशय बना हुआ है।
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सदियों पुरानी परंपरा पर ग्रहण
सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार पर होली का उत्सव केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच प्रेम, भाईचारे और सौहार्द का जीवंत प्रमाण रहा है। देश के कोने-कोने से आने वाले वारिस भक्तों के लिए यह मजार कौमी एकता का केंद्र रही है, जहां होली के रंग मिलजुलकर खेले जाते थे। यह परंपरा सूफी संत के जीवनकाल से चली आ रही है, जिसे प्रसिद्ध कवि खुसरो वारिस पाक बेदम शाह वारसी ने अपनी रचनाओं में भी पिरोया है।
लगभग पांच दशक से अधिक समय से इस परंपरा को आगे बढ़ा रही वारसी होली समिति के अध्यक्ष शारदे आलम वारसी ने अपनी टीम के उम्रदराज होने के कारण स्वेच्छा से आयोजन से पीछे हटने की घोषणा की है। उन्होंने नई पीढ़ी से इस आयोजन को जारी रखने की अपील की थी। इसके बाद एक नई कमेटी का गठन हुआ, जिसके नवनियुक्त अध्यक्ष पंडित अवध किशोर मिश्रा ने पुलिस और प्रशासन को सूचित किया है कि वे होली खेलने के लिए केवल एक निश्चित सीमा क्षेत्र में सुबह नौ बजे से 12:30 बजे तक का समय निर्धारित करने पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने जुलूस निकालने में असमर्थता जताई।
पुलिस ने बुलाई बैठक
देवा कोतवाली के अतिरिक्त इंस्पेक्टर धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि शुक्रवार को पुरानी समिति, नई समिति, मजार ट्रस्ट के पदाधिकारियों और स्थानीय संभ्रांत लोगों की एक बैठक बुलाई गई है। उन्होंने आश्वासन दिया कि देवा की ऐतिहासिक होली का महत्व बरकरार रहे, इसके लिए उच्च अधिकारियों के साथ सभी पक्षों की वार्ता कराई जाएगी। प्रशासन इस बात का प्रयास कर रहा है कि इस सौहार्दपूर्ण परंपरा को किसी भी कीमत पर टूटने न दिया जाए।
