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Ghazipur News: 133 करोड़ खर्च, फिर भी 18 नालों का गंदा पानी गंगा में गिर रहा
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शहर के कलक्टर घाट पर गंगा में मिलता नाले का पानी। संवाद
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गाजीपुर। शहर को सीवरेज नेटवर्क से जोड़कर गंगा को प्रदूषणमुक्त बनाने के उद्देश्य से 133 करोड़ रुपये की लागत से शुरू की गई सीवर परियोजना अपने मूल मकसद पर खरी नहीं उतर सकी है। परियोजना पूरी होने के बावजूद शहर के 18 बड़े नालों का करीब 37.15 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) गंदा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। ऐसे में नमामि गंगे और स्वच्छ गंगा अभियान के दावे सवालों के घेरे में हैं।
वर्ष 2019 में शुरू हुई सीवर परियोजना के तहत शहर में 105 किलोमीटर लंबी सीवर लाइन बिछाई गई और 12,650 घरों को इससे जोड़ा गया। वहीं, नमामि गंगे योजना के तहत देवकठिया-जमुनादेवा के पास 68.65 करोड़ रुपये की लागत से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) भी बनाया गया। इसके बावजूद ददरीघाट से लेकर पत्थर घाट तक कई स्थानों पर नालों का गंदा पानी सीधे गंगा में समा रहा है।
शहर के ददरीघाट, कलक्टरघाट, रामेश्वर घाट, गोलाघाट, स्टीमर घाट, चीतनाथ घाट, रामघाट, अंजनी घाट, पोस्ता घाट, खिड़की घाट, श्मशान घाट, बूढ़े महादेवा, बड़ा महादेवा और पत्थर घाट समेत 18 स्थानों पर नालों का प्रवाह अब भी गंगा तक पहुंच रहा है। इससे न केवल गंगा का जल प्रदूषित हो रहा है, बल्कि घाटों पर आने वाले श्रद्धालुओं को भी दुर्गंध और गंदगी का सामना करना पड़ रहा है।
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133 करोड़ रुपये खर्च होने और एसटीपी बनने के बाद भी यदि गंगा में रोजाना 37.15 एमएलडी गंदा पानी गिर रहा है, तो सवाल यह है कि शहर की बहुप्रचारित सीवर परियोजना गंगा को प्रदूषण से बचाने के अपने उद्देश्य में कितनी सफल रही है।
केस-1 : स्नान घाट के बगल में बह रहा सीवेज
ददरीघाट शहर का प्रमुख धार्मिक घाट है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु स्नान और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। घाट के समीप नाले का गंदा पानी सीधे गंगा में गिरता है। श्रद्धालुओं का कहना है कि एक ओर लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर सीवेज का पानी गंगा में मिल रहा है।
केस-2 : शहर के बीचोंबीच प्रदूषण का स्रोत
कलक्टर घाट पर भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। लालदरवाजा, मियांपुरा और आसपास के इलाकों का गंदा पानी नालों के माध्यम से यहां गंगा में पहुंचता है। दुर्गंध के कारण स्थानीय लोगों और घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी उठानी पड़ती है।
लोगों की राय
जब सीवर परियोजना बन गई है तो गंगा में गंदा पानी गिरना बंद होना चाहिए। इसके लिए जिम्मेदार विभागों को गंभीरता से काम करना होगा। - संतोष वर्मा, चीतनाथ
गंगा की स्वच्छता सिर्फ योजनाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर काम दिखने से होगी। नालों का पानी सीधे गंगा में गिरना चिंताजनक है। - विनय गुप्ता, महुआबाग
जिम्मेदारों की दलील
जल निगम शहरी के अधिशासी अभियंता स्वतंत्रत सिंह का कहना है कि शहर की कुल परिधि लगभग 250 किलोमीटर है, जबकि स्वीकृति केवल 105 किलोमीटर सीवर लाइन की मिली थी। इसलिए सभी क्षेत्रों को परियोजना से नहीं जोड़ा जा सका।
गंगा में गिरने वाले नालों की टैपिंग की योजना तैयार कर ली गई है। यह कार्य जल निगम ग्रामीण की ओर से कराया जाएगा। टैपिंग पूरी होने के बाद नालों का पानी सीधे गंगा में नहीं गिरेगा। - डीके राय, अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका
वर्ष 2019 में शुरू हुई सीवर परियोजना के तहत शहर में 105 किलोमीटर लंबी सीवर लाइन बिछाई गई और 12,650 घरों को इससे जोड़ा गया। वहीं, नमामि गंगे योजना के तहत देवकठिया-जमुनादेवा के पास 68.65 करोड़ रुपये की लागत से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) भी बनाया गया। इसके बावजूद ददरीघाट से लेकर पत्थर घाट तक कई स्थानों पर नालों का गंदा पानी सीधे गंगा में समा रहा है।
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शहर के ददरीघाट, कलक्टरघाट, रामेश्वर घाट, गोलाघाट, स्टीमर घाट, चीतनाथ घाट, रामघाट, अंजनी घाट, पोस्ता घाट, खिड़की घाट, श्मशान घाट, बूढ़े महादेवा, बड़ा महादेवा और पत्थर घाट समेत 18 स्थानों पर नालों का प्रवाह अब भी गंगा तक पहुंच रहा है। इससे न केवल गंगा का जल प्रदूषित हो रहा है, बल्कि घाटों पर आने वाले श्रद्धालुओं को भी दुर्गंध और गंदगी का सामना करना पड़ रहा है।
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केस-1 : स्नान घाट के बगल में बह रहा सीवेज
ददरीघाट शहर का प्रमुख धार्मिक घाट है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु स्नान और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। घाट के समीप नाले का गंदा पानी सीधे गंगा में गिरता है। श्रद्धालुओं का कहना है कि एक ओर लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर सीवेज का पानी गंगा में मिल रहा है।
केस-2 : शहर के बीचोंबीच प्रदूषण का स्रोत
कलक्टर घाट पर भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। लालदरवाजा, मियांपुरा और आसपास के इलाकों का गंदा पानी नालों के माध्यम से यहां गंगा में पहुंचता है। दुर्गंध के कारण स्थानीय लोगों और घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी उठानी पड़ती है।
लोगों की राय
जब सीवर परियोजना बन गई है तो गंगा में गंदा पानी गिरना बंद होना चाहिए। इसके लिए जिम्मेदार विभागों को गंभीरता से काम करना होगा। - संतोष वर्मा, चीतनाथ
गंगा की स्वच्छता सिर्फ योजनाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर काम दिखने से होगी। नालों का पानी सीधे गंगा में गिरना चिंताजनक है। - विनय गुप्ता, महुआबाग
जिम्मेदारों की दलील
जल निगम शहरी के अधिशासी अभियंता स्वतंत्रत सिंह का कहना है कि शहर की कुल परिधि लगभग 250 किलोमीटर है, जबकि स्वीकृति केवल 105 किलोमीटर सीवर लाइन की मिली थी। इसलिए सभी क्षेत्रों को परियोजना से नहीं जोड़ा जा सका।
गंगा में गिरने वाले नालों की टैपिंग की योजना तैयार कर ली गई है। यह कार्य जल निगम ग्रामीण की ओर से कराया जाएगा। टैपिंग पूरी होने के बाद नालों का पानी सीधे गंगा में नहीं गिरेगा। - डीके राय, अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका