{"_id":"6ae23e555c09e3efb30d9e5b","slug":"no-medication-available-for-the-treatment-of-mental-illnesses-at-the-medical-college-hardoi-news-c-213-1-hra1004-159202-2026-10-28","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hardoi News: मेडिकल कॉलेज में मानसिक रोग के इलाज की दवा नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hardoi News: मेडिकल कॉलेज में मानसिक रोग के इलाज की दवा नहीं
विज्ञापन
फोटो- 43- मेडिकल कॉलेज का दवा काउंटर। संवाद
हरदोई। संसाधनों और व्यवस्थाओं में सुधार के दावों के बीच चौकाने वाली जानकारी यह है कि मेडिकल कॉलेज की फार्मेसी में मानसिक रोगी को लिखी जाने वाली एक भी दवा उपलब्ध नहीं है। चिकित्सक से परामर्श के बाद मरीज और तीमारदार दवा काउंटर पर लंबी लाइन में खड़े हो जाते हैं। बारी आने पर पता चलता है कि दवा तो है ही नहीं। मतलब यह कि मानसिक रोग मरीजों की सेहत के साथ ही जेब पर भी भारी पड़ रहा है।
मेडिकल कॉलेज में मानसिक रोग चिकित्सा विभाग है। हर रोज औसतन 250 से 300 मरीज ओपीडी में परामर्श के लिए पहुंचते हैं। इसके बाद चिकित्सक मरीजों को दवा लिख देते हैं। चिकित्सकों की ओर से यही सलाह दी जाती है कि मेडिकल कॉलेज के दवा काउंटर से मरीज दवा ले लें। फार्मेसी में जाने पर दवा नहीं मिलतीं। मानसिक रोगियों को आमतौर पर घबराहट कम करने और मन को शांत रखने वाली दवाएं दी जाती हैं। यह नारकोटिक दवाएं होती हैं। इनकी कीमत भी ज्यादा होती है। ऐसे में सरकारी अस्पताल में निशुल्क दवा मिलने की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को हताश होना पड़ता है।
मानसिक रोग की नहीं मिलती यह दवाएं
डॉक्टर मानसिक रोग से जूझ रहे लाेगों के बेहतर उपचार के लिए कुछ दवाएं लिखते हैं। इनमें मेटाकोना-5, मिराजप, क्लोनोजिपॉम, नैपरोरॉक्स, इटोनाज-पी, प्रोपरानालोल, एक्लोजेन, रेक्सीपारा और टू-पीनॉल सहित कई दवाएं होती हैं लेकिन यह दवाएं फार्मेसी में मिलती ही नहीं। मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
विज्ञापन
महंगी दवाएं खरीदना मुश्किल, इलाज छूटने का खतरा
दूरदराज के गांवों से उपचार कराने आने वाले मरीजों के लिए निजी मेडिकल स्टोरों से दवाएं खरीदना आसान नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर इसका अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। मानसिक रोगों के उपचार में नियमित दवाओं की जरूरत होती है। ऐसे में दवाएं उपलब्ध न होने और उन्हें महंगे दामों पर खरीदने की मजबूरी से मरीजों के सामने उपचार जारी रखना चुनौती बन रहा है।
केस-1- सीतापुर के पिसांवा ब्लॉक के राजूपुरा गांव से आए अभय गौतम ने बताया कि सिर में दर्द समेत उन्हें भ्रम होने की दिक्कत है। मेडिकल कॉलेज में उपचार शुरू कराया गया लेकिन दवाएं उन्हें मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ रही हैं। दवाएं काफी महंगी हैं लेकिन उपचार कराना है तो दवाएं लेनी पड़ती हैं।
केस-2- शहर निवासी दिव्यांशी गुप्ता का उपचार चल रहा है। चिकित्सक ने उन्हें रेक्सीपारा, मिराजप, टू-पीनॉल सहित अन्य दवाएं लिखीं। इनमें से एक भी दवा फार्मेसी में नहीं मिली। उन्हें मजबूरी में तीन दिन की दवा 450 रुपये में मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ी।
दवाओं की उपलब्धता लगातार बनाए रखने के निर्देश हैं। मांग होते ही दो तीन दिन के अंदर दवा उपलब्ध करा दी जाती है। मानसिक रोग से संबंधित दवाएं न होने को लेकर पूरी जानकारी करेंगे। स्टॉक भी चेक कर लेंगे। अगर दवा नहीं है तो व्यवस्था कराई जाएगी। -डॉ. जेबी गोगोई
प्रधानाचार्य
विज्ञापन
मेडिकल कॉलेज में मानसिक रोग चिकित्सा विभाग है। हर रोज औसतन 250 से 300 मरीज ओपीडी में परामर्श के लिए पहुंचते हैं। इसके बाद चिकित्सक मरीजों को दवा लिख देते हैं। चिकित्सकों की ओर से यही सलाह दी जाती है कि मेडिकल कॉलेज के दवा काउंटर से मरीज दवा ले लें। फार्मेसी में जाने पर दवा नहीं मिलतीं। मानसिक रोगियों को आमतौर पर घबराहट कम करने और मन को शांत रखने वाली दवाएं दी जाती हैं। यह नारकोटिक दवाएं होती हैं। इनकी कीमत भी ज्यादा होती है। ऐसे में सरकारी अस्पताल में निशुल्क दवा मिलने की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को हताश होना पड़ता है।
विज्ञापन
मानसिक रोग की नहीं मिलती यह दवाएं
डॉक्टर मानसिक रोग से जूझ रहे लाेगों के बेहतर उपचार के लिए कुछ दवाएं लिखते हैं। इनमें मेटाकोना-5, मिराजप, क्लोनोजिपॉम, नैपरोरॉक्स, इटोनाज-पी, प्रोपरानालोल, एक्लोजेन, रेक्सीपारा और टू-पीनॉल सहित कई दवाएं होती हैं लेकिन यह दवाएं फार्मेसी में मिलती ही नहीं। मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
विज्ञापन
महंगी दवाएं खरीदना मुश्किल, इलाज छूटने का खतरा
दूरदराज के गांवों से उपचार कराने आने वाले मरीजों के लिए निजी मेडिकल स्टोरों से दवाएं खरीदना आसान नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर इसका अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। मानसिक रोगों के उपचार में नियमित दवाओं की जरूरत होती है। ऐसे में दवाएं उपलब्ध न होने और उन्हें महंगे दामों पर खरीदने की मजबूरी से मरीजों के सामने उपचार जारी रखना चुनौती बन रहा है।
केस-1- सीतापुर के पिसांवा ब्लॉक के राजूपुरा गांव से आए अभय गौतम ने बताया कि सिर में दर्द समेत उन्हें भ्रम होने की दिक्कत है। मेडिकल कॉलेज में उपचार शुरू कराया गया लेकिन दवाएं उन्हें मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ रही हैं। दवाएं काफी महंगी हैं लेकिन उपचार कराना है तो दवाएं लेनी पड़ती हैं।
केस-2- शहर निवासी दिव्यांशी गुप्ता का उपचार चल रहा है। चिकित्सक ने उन्हें रेक्सीपारा, मिराजप, टू-पीनॉल सहित अन्य दवाएं लिखीं। इनमें से एक भी दवा फार्मेसी में नहीं मिली। उन्हें मजबूरी में तीन दिन की दवा 450 रुपये में मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ी।
दवाओं की उपलब्धता लगातार बनाए रखने के निर्देश हैं। मांग होते ही दो तीन दिन के अंदर दवा उपलब्ध करा दी जाती है। मानसिक रोग से संबंधित दवाएं न होने को लेकर पूरी जानकारी करेंगे। स्टॉक भी चेक कर लेंगे। अगर दवा नहीं है तो व्यवस्था कराई जाएगी। -डॉ. जेबी गोगोई
प्रधानाचार्य