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Jaunpur News: करोड़ रुपये भरते हैं टैक्स, औद्योगिक इकाइयों को सुविधाएं मयस्सर नहीं
सतहरिया। औद्योगिक क्षेत्र सतहरिया में स्थापित औद्योगिक इकाइयां करोड़ों रुपये टैक्स भरती हैं लेकिन सरकार उन्हें जरूरी सुविधाएं मुहैया नहीं करा पा रही है। शासन की उपेक्षापूर्ण नीतियों के कारण कई औद्योगिक इकाइयां बंद होने के कगार पर पहुंच गईं हैं। औद्योगिक क्षेत्र सतहरिया की आधारशिला 28 जून 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पूर्वांचल के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र के रूप में रखा था लेकिन वह सपना शासन प्रशासन की उपेक्षात्मक रवैया के कारण पूरा नहीं हो सका। औद्योगिक क्षेत्र से प्रतिमाह करीब चार सौ करोड़ के कारोबार होता है। औद्योगिक क्षेत्र (सीडा) से प्रतिमाह करोड़ों रुपये सरकार को टैक्स मिलता है। इसके यहां पर बुनियादी समस्याओं का अभाव है। विकास का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चार किमी परिधि में फैले इस औद्योगिक क्षेत्र में एकमात्र सुलभ शौचालय है। बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। केंद्रीय विद्यालय व राजकीय विद्यालय नहीं है। यहां एकमात्र प्राथमिक विद्यालय व जूनियर हाईस्कूल है। अधिकांश रोडवेज बसों का औद्योगिक क्षेत्र में ठहराव तक नहीं है। औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना के 36 वर्ष बीत गए हैं लेकिन क्षेत्र रेल परिवहन से नहीं जोड़ा जा सका। इसके कारण उद्यमियों को अपने उत्पाद कच्चा माल क्रय-विक्रय को अधिक खर्च करना पड़ता है। बाहरी उद्यमियों को ठहरने के लिए कोई अतिथि गृह नहीं है। 1995 के पूर्व में यहां पर सेल टैक्स के छूट की सुविधा थी। वह भी समाप्त हो गया। वर्तमान में बड़ी फैक्ट्री के रूप में हाॅकिंस कूकर ने एक नया प्लांट लगाया है। उद्यमियों को इस बात का कष्ट है कि सरकार ने विकास के लिए मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं दिया।
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एक सौ उद्यमी बंद कर चले गए : सौ से अधिक उद्यमी कार्य पूंजी, ऋण सुविधा आदि उपलब्ध न कराने के कारण उद्योग स्थापित करने के बाद बंद कर चले गए। इसमें जय मां अंबे प्लास्टिक, अनीता इंडस्ट्रीज, अनिल वायर नीटिंग, विंध्यवासिनी रोलिंग मील, आदर्श रोलिंग मील, निर्मल आर्गनिक, मयूर पाली पैक, चौधराना स्टील प्राइवेट लिमिटेड प्रमुख हैं। उद्यमी सरकार को टैक्स देने के बाद 30 से 40 लाख रुपये सीडा प्राधिकरण को मेंटेनेंस शुल्क अदा करते हैं। साथ ही आसपास के 37 गांवों से भूमि क्रय विक्रय करने पर द़ो प्रतिशत विकास शुल्क सीडा में जमा होता है। क्षेत्र के भूखंडों को क्रय विक्रय पर 15 प्रतिशत ट्रांसफर लेवी जार्ज लिया जाता है। ऐसे में उद्यमियों को मलाल हैं कि उनसे ली जाने वाली धनराशि का आधा भी क्षेत्र के विकास पर खर्च होता तो स्थिति बदहाल नहीं होती।
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