वाल्मीकि आश्रम: दुर्गम पहाड़ियों और सोनहा नदी के पार बसा है माता सीता से जुड़ी मान्यताओं का केंद्र
आश्रम जाने के लिए लोग वाल्मीकिनगर पहुंचते हैं। वहां से जंगल के बीच बने कच्चे रास्ते से होकर नदी तक पहुंचना पड़ता है। रास्ते में एसएसबी का शिविर है, जहां सुरक्षा जांच के बाद आगे जाने की अनुमति मिलती है। इसके बाद सोनहा नदी पार कर पहाड़ी रास्ते से आश्रम तक पहुंचा जाता है।
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भारत-नेपाल सीमा पर नेपाल के त्रिवेणी संगम के निकट स्थित वाल्मीकि आश्रम प्राकृतिक सुंदरता, दुर्गम रास्तों और धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व और नेपाल के चितवन क्षेत्र के बीच स्थित इस आश्रम तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को जंगल के कच्चे रास्तों से गुजरने के बाद पहाड़ी सोनहा नदी पैदल पार करनी पड़ती है। इसके बाद ऊंची पहाड़ियों पर चढ़कर आश्रम पहुंचा जा सकता है।
दुर्गम रास्तों के बावजूद रामायण से जुड़ी मान्यताओं के कारण यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं। नेपाल की सीमा में स्थित यह क्षेत्र घने जंगलों, पहाड़ियों और प्राकृतिक संपदा से घिरा है।
आश्रम जाने के लिए लोग वाल्मीकिनगर पहुंचते हैं। वहां से जंगल के बीच बने कच्चे रास्ते से होकर नदी तक पहुंचना पड़ता है। रास्ते में एसएसबी का शिविर है, जहां सुरक्षा जांच के बाद आगे जाने की अनुमति मिलती है। इसके बाद सोनहा नदी पार कर पहाड़ी रास्ते से आश्रम तक पहुंचा जाता है।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में माता सीता के महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहने तथा लव-कुश के जन्म और शिक्षा का वर्णन मिलता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, लव-कुश ने इसी आश्रम में महर्षि वाल्मीकि से शिक्षा प्राप्त की थी। इन प्रसंगों से जुड़ी मान्यताएं आज भी आश्रम की पहचान बनी हुई हैं।