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Lakhimpur Kheri News: यादों के आईने में झलकी बचपन की ईद
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Fri, 13 Mar 2026 11:32 PM IST
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अमरीन खान
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लखीमपुर खीरी। समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है, लेकिन बचपन की यादें हमेशा दिल में ताजा बनी रहती हैं। खासकर त्योहारों से जुड़ी यादें लोगों के दिलों में लंबे समय तक बस जाती हैं। ईद के मौके पर ईदगाह जाना, मेले में घूमना, छोटी-छोटी चीजें खरीदना और दोस्तों-सहेलियों के साथ त्योहार की खुशियां बांटना बचपन की सबसे प्यारी यादों में शामिल है। उस दौर की सादगी, अपनापन और उत्साह आज भी लोगों को भावुक कर देता है।
ईद का त्योहार केवल इबादत तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह आपसी मेल-मिलाप, खुशियां बांटने और रिश्तों को मजबूत करने का भी अवसर होता है। अतीत के इन्हीं खुशनुमा पलों को याद करते हुए शहर की कई महिलाओं ने अपने बचपन की ईद से जुड़ी यादें साझा कीं और बताया कि वे दिन आज भी उनके लिए बेहद खास और यादगार हैं।
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ईदगाह और मेले का उत्साह आज भी याद
शहर के शाहपुरा कोठी मोहल्ले में रहने वाली मेराज फातमा बताती हैं कि उनकी शादी शाहजहांपुर से लखीमपुर में हुई। वह बताती हैं कि बचपन में ईद के दिन सुबह जल्दी उठकर नए कपड़े पहनना और पिता सबूरदाद खान के साथ ईदगाह जाना सबसे बड़ा उत्साह होता था। ईदगाह के बाहर लगने वाले मेले में खरीदारी करना और फिर रिश्तेदारों व पड़ोसियों के घर जाकर सेंवइयां खाना त्योहार की खुशी को और बढ़ा देता था।
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नए कपड़ों और अम्मी की सेंवइयों की याद
सीतापुर से शादी होकर लखीमपुर आईं अलीशा खान बताती हैं कि बचपन में ईद का उत्साह ही अलग होता था। वह कहती हैं कि पापा मोहम्मद उमर के साथ सभी लोग मेले में घूमने जाते थे। ईद के लिए नए कपड़े बनवाने की खुशी भी खास होती थी। मेले में बच्चों की मस्ती और घर लौटकर अम्मी के हाथ की मीठी सेंवइयों का स्वाद आज भी उनकी यादों में बसा हुआ है।
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ईदी मिलने की खुशी ही अलग थी
महाराज नगर में रहने वाली नगमा सिद्दीकी बताती हैं कि उनका बचपन भी ईद की मीठी यादों से भरा हुआ है। उनके पिता नबी अहमद उस समय रायबरेली में तैनात थे और ईद के मौके पर पूरा परिवार गांव बदली का पुरा जाता था। वह बताती हैं कि जब पिता ईद की नमाज पढ़ने मस्जिद जाते थे तो बच्चे बाहर लगी दुकानों से कुछ न कुछ खरीदकर खाते और मेले का आनंद लेते थे। बाद में पिता अपने मित्रों के घर लेकर जाते, जहां ईदी मिलती थी। बचपन में उस ईदी की खुशी ही अलग होती थी।
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सहेलियों के साथ त्योहार मनाने की यादें
लखीमपुर के हिदायत नगर मोहल्ले में रहने वाली अमरीन खान बताती हैं कि उनका मायका कानपुर में है और करीब 15 वर्ष पहले उनकी शादी लखीमपुर में हुई। बचपन की ईद को याद करते हुए वह कहती हैं कि ईद का इंतजार पूरे साल रहता था। अब्बू नियाज़ अहमद खान के साथ ईदगाह जाना, नई ड्रेस पहनना और सहेलियों के साथ मिलकर त्योहार मनाना बेहद खास होता था। ईद के मेले में घूमना, छोटी-छोटी चीजें खरीदना और बड़ों से ईदी लेना बचपन की सबसे प्यारी यादों में शामिल है।
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ईद का त्योहार केवल इबादत तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह आपसी मेल-मिलाप, खुशियां बांटने और रिश्तों को मजबूत करने का भी अवसर होता है। अतीत के इन्हीं खुशनुमा पलों को याद करते हुए शहर की कई महिलाओं ने अपने बचपन की ईद से जुड़ी यादें साझा कीं और बताया कि वे दिन आज भी उनके लिए बेहद खास और यादगार हैं।
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ईदगाह और मेले का उत्साह आज भी याद
शहर के शाहपुरा कोठी मोहल्ले में रहने वाली मेराज फातमा बताती हैं कि उनकी शादी शाहजहांपुर से लखीमपुर में हुई। वह बताती हैं कि बचपन में ईद के दिन सुबह जल्दी उठकर नए कपड़े पहनना और पिता सबूरदाद खान के साथ ईदगाह जाना सबसे बड़ा उत्साह होता था। ईदगाह के बाहर लगने वाले मेले में खरीदारी करना और फिर रिश्तेदारों व पड़ोसियों के घर जाकर सेंवइयां खाना त्योहार की खुशी को और बढ़ा देता था।
नए कपड़ों और अम्मी की सेंवइयों की याद
सीतापुर से शादी होकर लखीमपुर आईं अलीशा खान बताती हैं कि बचपन में ईद का उत्साह ही अलग होता था। वह कहती हैं कि पापा मोहम्मद उमर के साथ सभी लोग मेले में घूमने जाते थे। ईद के लिए नए कपड़े बनवाने की खुशी भी खास होती थी। मेले में बच्चों की मस्ती और घर लौटकर अम्मी के हाथ की मीठी सेंवइयों का स्वाद आज भी उनकी यादों में बसा हुआ है।
ईदी मिलने की खुशी ही अलग थी
महाराज नगर में रहने वाली नगमा सिद्दीकी बताती हैं कि उनका बचपन भी ईद की मीठी यादों से भरा हुआ है। उनके पिता नबी अहमद उस समय रायबरेली में तैनात थे और ईद के मौके पर पूरा परिवार गांव बदली का पुरा जाता था। वह बताती हैं कि जब पिता ईद की नमाज पढ़ने मस्जिद जाते थे तो बच्चे बाहर लगी दुकानों से कुछ न कुछ खरीदकर खाते और मेले का आनंद लेते थे। बाद में पिता अपने मित्रों के घर लेकर जाते, जहां ईदी मिलती थी। बचपन में उस ईदी की खुशी ही अलग होती थी।
सहेलियों के साथ त्योहार मनाने की यादें
लखीमपुर के हिदायत नगर मोहल्ले में रहने वाली अमरीन खान बताती हैं कि उनका मायका कानपुर में है और करीब 15 वर्ष पहले उनकी शादी लखीमपुर में हुई। बचपन की ईद को याद करते हुए वह कहती हैं कि ईद का इंतजार पूरे साल रहता था। अब्बू नियाज़ अहमद खान के साथ ईदगाह जाना, नई ड्रेस पहनना और सहेलियों के साथ मिलकर त्योहार मनाना बेहद खास होता था। ईद के मेले में घूमना, छोटी-छोटी चीजें खरीदना और बड़ों से ईदी लेना बचपन की सबसे प्यारी यादों में शामिल है।

अमरीन खान

अमरीन खान

अमरीन खान