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महंगाई की मार: गैस किल्लत के बीच कोयले के बढ़े दाम, घर बनाना होगा महंगा; आसमान छुएंगे ईंटों के भाव
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 14 Mar 2026 11:53 PM IST
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सार
नई ईंटों का रेट 5700 रुपये से 6200 रुपये प्रति हजार के आसपास है, लेकिन लागत दोगुनी होने के कारण यह दाम जल्द ही आसमान छूने वाले हैं। अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ईंट भट्ठे दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ तकनीकी बदलाव का दबाव है, तो दूसरी तरफ ईंधन की असहनीय महंगाई।
दुकान में बिक्री को रखा कोयला।
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विस्तार
रसोई गैस की किल्लत के बीच कोयले के बढ़ते चलन से इसकी खपत बढ़ गई है। इसका सीधा असर ईंट भट्ठा व्यवसाय पर पड़ा है। सीजन शुरू होते ही हाइड्रा तकनीक से पकाई जाने वाली ईंटों की लागत बढ़ गई है। इससे आने वाले समय में ईंटों के दाम बढ़ेंगे और घर बनाना महंगा हो जाएगा।
सरकार द्वारा औद्योगिक उपयोग के एलपीजी सिलेंडरों पर लगाई गई हालिया रोक के बाद कोयले के बाजार में ऐसा भूचाल आया है कि ईंट भट्ठा उद्योग झुलस गया है। जिले के लगभग 325 और नौहझील क्षेत्र के 135 भट्ठों पर इस वक्त अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। प्रदूषण की विकराल समस्या से निपटने के लिए प्रशासन ने पहले ईंट भट्ठों पर कड़ा रुख अपनाया था, जिसके बाद संचालकों ने भारी निवेश कर हाइड्रा जैसी आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल तकनीक को अपनाया। सरकार ने मार्च से जून तक के पीक सीजन में इसी तकनीक से ईंट पकाने की अनुमति दी है।
विडंबना देखिए कि जिस तकनीक को पर्यावरण बचाने का हथियार माना गया, वह अब महंगे कोयले के कारण भट्ठा स्वामियों के लिए गले की फांस बन गई है। औद्योगिक क्षेत्रों में गैस की कमी होते ही बड़ी कंपनियों ने कोयले का रुख किया, जिससे बाजार में कोयले की मांग अचानक बढ़ गई और इसके दाम रॉकेट की तरह ऊपर जा रहे हैं।
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सरकार द्वारा औद्योगिक उपयोग के एलपीजी सिलेंडरों पर लगाई गई हालिया रोक के बाद कोयले के बाजार में ऐसा भूचाल आया है कि ईंट भट्ठा उद्योग झुलस गया है। जिले के लगभग 325 और नौहझील क्षेत्र के 135 भट्ठों पर इस वक्त अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। प्रदूषण की विकराल समस्या से निपटने के लिए प्रशासन ने पहले ईंट भट्ठों पर कड़ा रुख अपनाया था, जिसके बाद संचालकों ने भारी निवेश कर हाइड्रा जैसी आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल तकनीक को अपनाया। सरकार ने मार्च से जून तक के पीक सीजन में इसी तकनीक से ईंट पकाने की अनुमति दी है।
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विडंबना देखिए कि जिस तकनीक को पर्यावरण बचाने का हथियार माना गया, वह अब महंगे कोयले के कारण भट्ठा स्वामियों के लिए गले की फांस बन गई है। औद्योगिक क्षेत्रों में गैस की कमी होते ही बड़ी कंपनियों ने कोयले का रुख किया, जिससे बाजार में कोयले की मांग अचानक बढ़ गई और इसके दाम रॉकेट की तरह ऊपर जा रहे हैं।
बाजार के आंकड़े किसी को भी चौंका सकते हैं। कुछ समय पहले तक जो कोयला 9 से 10 रुपये प्रति किलो के भाव पर आसानी से उपलब्ध था, आज उसके दाम 16 से 17 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। हैरानी की बात यह है कि दोगुने दाम देने के बावजूद भट्ठा संचालकों को पर्याप्त मात्रा में कोयला नहीं मिल रहा है।
कोयले के साथ-साथ ईंटों को सुलगाने के लिए इस्तेमाल होने वाली तूरी (कृषि अवशेष) के दामों में भी भारी तेजी आई है। वर्तमान में नई ईंटों का रेट 5700 रुपये से 6200 रुपये प्रति हजार के आसपास है, लेकिन लागत दोगुनी होने के कारण यह दाम जल्द ही आसमान छूने वाले हैं। अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ईंट भट्ठे दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ तकनीकी बदलाव का दबाव है, तो दूसरी तरफ ईंधन की असहनीय महंगाई। यदि सरकार ने कोयले की आपूर्ति और कीमतों पर जल्द नियंत्रण नहीं किया तो आने वाले हफ्तों में आम आदमी के लिए अपने सपनों का आशियाना तैयार करना एक महंगा सपना बनकर रह जाएगा।
मथुरा जिला ईंट भट्ठा एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सुधीर चौधरी फौजदार ने बताया कि सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए हमें हाइड्रा तकनीक अपनाने को कहा, हमने लाखों खर्च कर उसे अपनाया, लेकिन अब कोयले के दाम आसमान छू रहे हैं और पर्याप्त स्टॉक मिल भी नहीं रहा। अगर लागत इसी तरह बढ़ती रही, तो हमें ईंटों के दाम बढ़ाने ही पड़ेंगे, वरना भट्ठा बंद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
ईंट भट्ठा संचालक विष्णु अग्रवाल ने बताया कि ईंट बनाना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। हम फिलहाल पुराने रेट पर ईंटें बेच रहे हैं, क्योंकि हमें लेबर पेमेंट के लिए नकदी चाहिए, लेकिन नया स्टॉक तैयार होते ही महंगाई का सीधा बोझ ग्रामीण जनता की जेब पर पड़ेगा।
यह है हाइड्रा तकनीकी
ईंट पकाने के लिए चिमनी के चारों ओर एक घेरा बनाया जाता है। इसमें कच्ची ईंटें रखी जाती हैं। ईंटों को पकाने के लिए कोयला डाला जाता है। इसमें जगह-जगह पंखे लगे हैं। इन पंखों का संचालन जनरेटर से होता है। इससे कोयला में आग जल्दी सुलग जाती है। पंखे धुएं को खींचकर तेजी से बाहर निकाल देते हैं। इस धुआं कम उठता है और प्रदूषण कम होता है।
कोयले के साथ-साथ ईंटों को सुलगाने के लिए इस्तेमाल होने वाली तूरी (कृषि अवशेष) के दामों में भी भारी तेजी आई है। वर्तमान में नई ईंटों का रेट 5700 रुपये से 6200 रुपये प्रति हजार के आसपास है, लेकिन लागत दोगुनी होने के कारण यह दाम जल्द ही आसमान छूने वाले हैं। अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ईंट भट्ठे दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ तकनीकी बदलाव का दबाव है, तो दूसरी तरफ ईंधन की असहनीय महंगाई। यदि सरकार ने कोयले की आपूर्ति और कीमतों पर जल्द नियंत्रण नहीं किया तो आने वाले हफ्तों में आम आदमी के लिए अपने सपनों का आशियाना तैयार करना एक महंगा सपना बनकर रह जाएगा।
मथुरा जिला ईंट भट्ठा एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सुधीर चौधरी फौजदार ने बताया कि सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए हमें हाइड्रा तकनीक अपनाने को कहा, हमने लाखों खर्च कर उसे अपनाया, लेकिन अब कोयले के दाम आसमान छू रहे हैं और पर्याप्त स्टॉक मिल भी नहीं रहा। अगर लागत इसी तरह बढ़ती रही, तो हमें ईंटों के दाम बढ़ाने ही पड़ेंगे, वरना भट्ठा बंद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
ईंट भट्ठा संचालक विष्णु अग्रवाल ने बताया कि ईंट बनाना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। हम फिलहाल पुराने रेट पर ईंटें बेच रहे हैं, क्योंकि हमें लेबर पेमेंट के लिए नकदी चाहिए, लेकिन नया स्टॉक तैयार होते ही महंगाई का सीधा बोझ ग्रामीण जनता की जेब पर पड़ेगा।
यह है हाइड्रा तकनीकी
ईंट पकाने के लिए चिमनी के चारों ओर एक घेरा बनाया जाता है। इसमें कच्ची ईंटें रखी जाती हैं। ईंटों को पकाने के लिए कोयला डाला जाता है। इसमें जगह-जगह पंखे लगे हैं। इन पंखों का संचालन जनरेटर से होता है। इससे कोयला में आग जल्दी सुलग जाती है। पंखे धुएं को खींचकर तेजी से बाहर निकाल देते हैं। इस धुआं कम उठता है और प्रदूषण कम होता है।