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Mathura News: ऋषभ को वृंदावन की माटी से था गहरा लगाव, यहीं छूटी दुनिया
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मांट। जगरांव के ऋषभ बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। क्रिकेट खेलने के साथ ही भजन गायिकी शुरू की तो कृष्ण भक्ति में मन रम गया। साथियों के साथ हर साल वृंदावन आते। दोस्तों से कहते कि मन करता है सब कुछ छोड़कर वृंदावन में ही बस जाऊं, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था, वृंदावन में बस तो नहीं सके मगर इसी माटी में प्राण त्याग दिए।
रुंधे गले से यह बताते हुए ऋषभ के पिता उमेश शर्मा फकक-फफक कर रो पड़े। पेशे से कारोबारी उमेश के दो बेटों में ऋषभ बड़े थे। एलएलबी प्रथम वर्ष के छात्र ऋषभ बचपन से ही मल्टी टेलेंटेड थे।
पिता ने बताया कि बचपन से होनहार ऋषभ क्रिकेटर युवराज सिंह के बड़े फैन थे। क्रिकेट के इसी शौक के चलते उन्हें युवराज सिंह की अकादमी में दाखिला दिलवाया। यहां उन्होंने क्रिकेट की बारीकियां सीखीं। करीब तीन साल से बच्चों को भी क्रिकेट के कोच बन गए। इसके बाद दोस्तों के साथ वृंदावन आना जाना शुरू किया तो वह कान्हा की भक्ति में रम गया। भजन गायिकी करने लगा।
उमेश ने बताया कि वृंदावन इतना भाने लगा था कि यहीं बसने की बात कहता था, लेकिन नियति को शायद कुछ और मंजूर था। ऋषभ अपने साथियों के साथ वृंदावन जाने को निकले तो वह बेहद खुश थे। क्या पता था कि जिस वृंदावन की माटी में उसे जिंदगी बसर करनी थी, उसी माटी में उसकी जान भी चली जाएगी। जगरांव से आए उमेश के रिश्तेदार उन्हें संभाल रहे थे। पिता का रो-रोकर बुरा हाल था।
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रुंधे गले से यह बताते हुए ऋषभ के पिता उमेश शर्मा फकक-फफक कर रो पड़े। पेशे से कारोबारी उमेश के दो बेटों में ऋषभ बड़े थे। एलएलबी प्रथम वर्ष के छात्र ऋषभ बचपन से ही मल्टी टेलेंटेड थे।
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पिता ने बताया कि बचपन से होनहार ऋषभ क्रिकेटर युवराज सिंह के बड़े फैन थे। क्रिकेट के इसी शौक के चलते उन्हें युवराज सिंह की अकादमी में दाखिला दिलवाया। यहां उन्होंने क्रिकेट की बारीकियां सीखीं। करीब तीन साल से बच्चों को भी क्रिकेट के कोच बन गए। इसके बाद दोस्तों के साथ वृंदावन आना जाना शुरू किया तो वह कान्हा की भक्ति में रम गया। भजन गायिकी करने लगा।
उमेश ने बताया कि वृंदावन इतना भाने लगा था कि यहीं बसने की बात कहता था, लेकिन नियति को शायद कुछ और मंजूर था। ऋषभ अपने साथियों के साथ वृंदावन जाने को निकले तो वह बेहद खुश थे। क्या पता था कि जिस वृंदावन की माटी में उसे जिंदगी बसर करनी थी, उसी माटी में उसकी जान भी चली जाएगी। जगरांव से आए उमेश के रिश्तेदार उन्हें संभाल रहे थे। पिता का रो-रोकर बुरा हाल था।