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Sawan 2026: मथुरा के 'कोतवाल' हैं महादेव, कंस वध के बाद कृष्ण-बलराम का सुलझाया था विवाद
Mon, 03 Aug 2026 10:06 PM IST
Dhirendra Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Mon, 03 Aug 2026 10:06 PM IST
सार
मान्यता है कि रंगेश्वर महादेव मंदिर में 40 दिन दीपक जलाने से मनोकामना पूरी होती है। यहां पर दूरदराज क्षेत्र से श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते हैं। कंस वध के बाद कृष्ण और बलराम का विवाद भोले बाबा ने ही सुलझाया था।
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रंगेश्वर महादेव
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
मथुरा के रंगेश्वर महादेव को शहर का कोतवाल माना जाता है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के मामा कंस ने रंगशाला में युद्ध से पहले भगवान शिव की स्थापना कर पूजा-अर्चना की थी। सावन में मंदिर में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मान्यता है कि श्रीकृष्ण के मामा कंस ने इस मंदिर की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना की थी। सावन मास में यहां बड़ी संख्या में भक्त जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए पहुंचते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार कंस ने श्रीकृष्ण और बलराम के वध की योजना के तहत जिस रंगशाला का निर्माण कराया था, वह इसी क्षेत्र में स्थित थी। कुश्ती प्रतियोगिता से पूर्व कंस ने भगवान शिव का पूजन कर विजय का आशीर्वाद मांगा था। बाद में इसी रंगभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया।
कंस-वध के बाद श्रीकृष्ण और बलराम के बीच यह बहस हुई कि कंस का वध किसने किया तभी भगवान शिव प्रकट हुए और दोनों भाइयों के पराक्रम की सराहना करते हुए इस स्थान को अपना पावन धाम बनाया। इस घटना के बाद यह स्थान रंगेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंदिर की प्राचीन दीवारों पर अंकित शिल्प और स्थापत्य कला यहां की समृद्ध परंपरा की झलक प्रस्तुत करते हैं।
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मंदिर के सेवायत कार्तिक ने बताया कि सावन मास में मंदिर में विशेष शृंगार, भजन-कीर्तन, रुद्राभिषेक और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। कार्तिक शुक्ल दशमी को चतुर्वेदी समाज की ओर से आयोजित कंस-वध उत्सव इस मंदिर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाए हुए है।
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मान्यता है कि श्रीकृष्ण के मामा कंस ने इस मंदिर की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना की थी। सावन मास में यहां बड़ी संख्या में भक्त जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए पहुंचते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार कंस ने श्रीकृष्ण और बलराम के वध की योजना के तहत जिस रंगशाला का निर्माण कराया था, वह इसी क्षेत्र में स्थित थी। कुश्ती प्रतियोगिता से पूर्व कंस ने भगवान शिव का पूजन कर विजय का आशीर्वाद मांगा था। बाद में इसी रंगभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया।
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कंस-वध के बाद श्रीकृष्ण और बलराम के बीच यह बहस हुई कि कंस का वध किसने किया तभी भगवान शिव प्रकट हुए और दोनों भाइयों के पराक्रम की सराहना करते हुए इस स्थान को अपना पावन धाम बनाया। इस घटना के बाद यह स्थान रंगेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंदिर की प्राचीन दीवारों पर अंकित शिल्प और स्थापत्य कला यहां की समृद्ध परंपरा की झलक प्रस्तुत करते हैं।
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मंदिर के सेवायत कार्तिक ने बताया कि सावन मास में मंदिर में विशेष शृंगार, भजन-कीर्तन, रुद्राभिषेक और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। कार्तिक शुक्ल दशमी को चतुर्वेदी समाज की ओर से आयोजित कंस-वध उत्सव इस मंदिर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाए हुए है।