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Kargil Diwas: जिन्होंने दिया बलिदान, उनके गांवों को मिला उपेक्षा का दंश; शहीदों के याद में बने स्मारक भी जर्जर

राजेंद्र धानक, संवाद Published by: हीरा मेहरा Updated Fri, 26 Jul 2024 11:32 AM IST
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सार

कारगिल युद्ध में अपनी वीरता से दुश्मन देश को परास्त कर अपने देश का गौरव बढ़ाने वाले शहीदों के गांव के साथ ही उनके परिजन उपेक्षित हैं। शहीदों के गांव विकास को तरस रहे हैं।

The memorial built in memory of martyrs in Kargil is also dilapidated in almora
Kargil Diwas 2024 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

 

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कारगिल युद्ध में अपनी वीरता से दुश्मन देश को परास्त कर अपने देश का गौरव बढ़ाने वाले शहीदों के गांव के साथ ही उनके परिजन उपेक्षित हैं। शहीदों के गांव विकास को तरस रहे हैं। लांसनायक हरीश देवड़ी के गांव देवड़ा में आज तक सड़क नहीं पहुंची। शहीद मोहन सिंह बिष्ट के गांव की सड़क बदहाल है। शहीदों की याद में बने स्मारक भी जर्जर हैं और उनकी निशानी मिट रही है इसे देखने वाला कोई नहीं है।

कारगिल युद्ध में अल्मोड़ा के वीरों ने अपने पराक्रम से देश का गौरव बढ़ाया। कैप्टन आदित्य मिश्रा, हवलदार तम बहादुर क्षेत्री, नायक हरि बहादुर घले, लांस नायक हरीश सिंह देवड़ी, हवलदार हरी सिंह थापा, पीटीआर राम सिंह बोरा, सिपाही मोहन सिंह ने कारगिल युद्ध में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है। चार शहीदों के परिवार अन्य शहरों में बस गए हैं लेकिन जिन्होंने गांव नहीं छोड़ा वह विकास को तरस रहे हैं।

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ये पढ़ें- Kargil Vijay Diwas: शहीद मोहन सिंह के गांव को ना सड़क मिली और ना ही संचार सुविधा, 100 परिवार कर चुके पलायन

 जिले के खड़ाऊं गांव निवासी मोहन सिंह बिष्ट की वीरांगना विमला ने बताया कि गांव के लिए बनी सड़क में डामरीकरण नहीं हुआ है। उन्होंने अपने खर्च से गांव में शहीद स्मारक बनाया जो अब जर्जर हो गया है। कारगिल शहीद लांसनायक हरीश देवड़ी की वीरांगना सावित्री देवी ने बताया कि आज तक शहीद का गांव देवड़ा सड़क से नहीं जुड़ सका है। दलबैंड से देवड़ा तक बनाई जा रही सड़क का निर्माण अधूरा है। शहीद की याद में आज तक उनके पैतृक गांव में स्मारक बनाने की पहल किसी ने नहीं की। कहा सिस्टम को साल में एक बार शहीदों की याद आती है और फिर वे भुला दिए जाते हैं। 

पापा के नक्शे कदम पर चलकर रौबिन बना सीमा का प्रहरी
देश के लिए अपना सुहाग खोने वाली विमला बिष्ट ने बताया कि पति की शहादत के बाद बच्चे यही पूछते थे कि पापा घर कब आएंगे। बेटा रौबिन सिंह बिष्ट पापा की सेना की वर्दी पहने फोटो देखकर बड़ा हुआ और उसने अपने पिता के नक्शे कदम पर चलकर सेना में जाने का मन बनाया। पति की शहादत के बाद विमला किसी की हाल में अपने लाल को खोना नहीं चाहती थीं लेकिन अपना गम भुलाकर उन्होंने देश सेवा को ही सर्वोपरि माना। बेटा रौबिन सेना में भर्ती हुआ तो विमला ने भी खुशी-खुशी सीमा पर जाने की इजाजत दे दी।

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