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Bageshwar News: बेटे की जिद में नौ बार प्रसव... दुनिया की उम्मीदों से थककर चली गई बीना
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बागेश्वर। चार बेटियां होने के बावजूद बेटे की जिद, अंधविश्वास और स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियों की अनदेखी की कीमत बीना देवी को जान देकर चुकानी पड़ी। जिस बेटे की चाह में परिवार जोखिम उठाता रहा वह भी नहीं बच सका।
गरुड़ विकासखंड के दूरस्थ ग्राम नौगांव कोट्यूड़ा में चार बेटियों की मां 37 वर्षीय बीना का यह नौवां गर्भधारण था। ग्रामीणों के अनुसार बीना देवी इससे पहले वह चार बेटियों को जन्म दे चुकी थीं जिनकी उम्र दो से पांच वर्ष के बीच है। इसके अलावा चार अन्य शिशुओं की जन्म के तुरंत बाद मौत हो गई।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार आठवें गर्भधारण के दौरान भी उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई थी और स्वास्थ्य कर्मियों ने बड़ी मुश्किल से उनकी जान बचाई थी। चिकित्सकों ने बार-बार गर्भधारण से होने वाले खतरे को देखते हुए परिवार को नसबंदी अथवा अन्य परिवार नियोजन उपाय अपनाने की सलाह दी थी। इसके बावजूद बेटे की चाह में यह सलाह अनसुनी कर दी गई। सामाजिक झिझक और लोकलाज के कारण बीना देवी ने गर्भधारण की जानकारी स्वास्थ्य विभाग से छिपाए रखी।
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मई माह में एक आशा कार्यकर्ता को संदेह होने पर पूछताछ की गई तब गर्भधारण का खुलासा हुआ। जांच में यह हाई रिस्क प्रेग्नेंसी पाई गई। अल्ट्रासाउंड में बच्चे के गले में नाल फंसी होने की पुष्टि हुई। चिकित्सकों ने स्पष्ट रूप से सलाह दी थी कि प्रसव किसी बड़े अस्पताल में कराया जाए लेकिन परिजनों ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया।
29 मई की रात क्षेत्र में तेज बारिश और तूफान के कारण बिजली और मोबाइल नेटवर्क ठप हो गए थे। ऐसे में अस्पताल ले जाने के बजाय घर पर ही प्रसव कराने का निर्णय लिया गया। 30 मई की तड़के बीना देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। चार बेटियों के बाद बेटे के जन्म से परिवार में खुशी का माहौल बना लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। प्रसव के बाद उत्पन्न गंभीर जटिलताओं के चलते सुबह बीना देवी मृत पाई गईं।
मां की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम नवजात को बचाने के लिए गांव पहुंची। करीब 1500 ग्राम वजन वाले नवजात की हालत गंभीर थी। चिकित्सकों ने उसे तत्काल जिला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराने की सलाह दी लेकिन परिजनों ने इसका विरोध किया। विभागीय अधिकारियों के अनुसार टीम के साथ अभद्र व्यवहार भी किया गया और नवजात को अस्पताल भेजने से मना कर दिया गया। परिणामस्वरूप अगले दिन उस मासूम की भी मौत हो गई।
मजबूरी और लाचारी का दंश
इस पूरे मामले में बेटे की चाह और अंधविश्वास के साथ-साथ गरीबी और भौगोलिक परिस्थितियां भी एक बड़ा कारण बनकर उभरी हैं। मृतका बीना देवी का पति नंदन राम बेरोजगार है, जिसके कारण परिवार लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। उनका गांव नौगांव कोट्यूड़ा एक अत्यंत दूरस्थ और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है। प्रसव की रात मौसम इतना खराब था कि इस दूरदराज के इलाके में न तो बिजली थी और न ही मोबाइल नेटवर्क। आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और मुख्यधारा से कटे इस बेहद पिछड़े और दूरस्थ गांव की भौगोलिक लाचारी ने भी दोनों जिंदगियों को समय पर इलाज न मिल पाने में एक बड़ी भूमिका निभाई।
.....कोट
बेटे की चाहत और सामाजिक झिझक के कारण नौवें गर्भधारण को छिपाना और अंत समय में नवजात को उच्च चिकित्सा संस्थान ले जाने में परिजनों का कड़ा विरोध करना बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने गर्भावस्था के पंजीकरण से लेकर अल्ट्रासाउंड और नवजात की जान बचाने के लिए 108 एंबुलेंस और डॉक्टर भेजने तक के हरसंभव प्रयास किए थे लेकिन परिजनों के असहयोग के आगे व्यवस्थाएं लाचार हो गईं। इस संवेदनशील मामले की विस्तृत विभागीय जांच और मातृ एवं शिशु मृत्यु की समीक्षा कराई जा रही है।
.........डॉ. कुमार आदित्य तिवारी, सीएमओ, बागेश्वर
गरुड़ विकासखंड के दूरस्थ ग्राम नौगांव कोट्यूड़ा में चार बेटियों की मां 37 वर्षीय बीना का यह नौवां गर्भधारण था। ग्रामीणों के अनुसार बीना देवी इससे पहले वह चार बेटियों को जन्म दे चुकी थीं जिनकी उम्र दो से पांच वर्ष के बीच है। इसके अलावा चार अन्य शिशुओं की जन्म के तुरंत बाद मौत हो गई।
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स्वास्थ्य विभाग के अनुसार आठवें गर्भधारण के दौरान भी उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई थी और स्वास्थ्य कर्मियों ने बड़ी मुश्किल से उनकी जान बचाई थी। चिकित्सकों ने बार-बार गर्भधारण से होने वाले खतरे को देखते हुए परिवार को नसबंदी अथवा अन्य परिवार नियोजन उपाय अपनाने की सलाह दी थी। इसके बावजूद बेटे की चाह में यह सलाह अनसुनी कर दी गई। सामाजिक झिझक और लोकलाज के कारण बीना देवी ने गर्भधारण की जानकारी स्वास्थ्य विभाग से छिपाए रखी।
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मई माह में एक आशा कार्यकर्ता को संदेह होने पर पूछताछ की गई तब गर्भधारण का खुलासा हुआ। जांच में यह हाई रिस्क प्रेग्नेंसी पाई गई। अल्ट्रासाउंड में बच्चे के गले में नाल फंसी होने की पुष्टि हुई। चिकित्सकों ने स्पष्ट रूप से सलाह दी थी कि प्रसव किसी बड़े अस्पताल में कराया जाए लेकिन परिजनों ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया।
29 मई की रात क्षेत्र में तेज बारिश और तूफान के कारण बिजली और मोबाइल नेटवर्क ठप हो गए थे। ऐसे में अस्पताल ले जाने के बजाय घर पर ही प्रसव कराने का निर्णय लिया गया। 30 मई की तड़के बीना देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। चार बेटियों के बाद बेटे के जन्म से परिवार में खुशी का माहौल बना लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। प्रसव के बाद उत्पन्न गंभीर जटिलताओं के चलते सुबह बीना देवी मृत पाई गईं।
मां की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम नवजात को बचाने के लिए गांव पहुंची। करीब 1500 ग्राम वजन वाले नवजात की हालत गंभीर थी। चिकित्सकों ने उसे तत्काल जिला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराने की सलाह दी लेकिन परिजनों ने इसका विरोध किया। विभागीय अधिकारियों के अनुसार टीम के साथ अभद्र व्यवहार भी किया गया और नवजात को अस्पताल भेजने से मना कर दिया गया। परिणामस्वरूप अगले दिन उस मासूम की भी मौत हो गई।
मजबूरी और लाचारी का दंश
इस पूरे मामले में बेटे की चाह और अंधविश्वास के साथ-साथ गरीबी और भौगोलिक परिस्थितियां भी एक बड़ा कारण बनकर उभरी हैं। मृतका बीना देवी का पति नंदन राम बेरोजगार है, जिसके कारण परिवार लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। उनका गांव नौगांव कोट्यूड़ा एक अत्यंत दूरस्थ और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है। प्रसव की रात मौसम इतना खराब था कि इस दूरदराज के इलाके में न तो बिजली थी और न ही मोबाइल नेटवर्क। आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और मुख्यधारा से कटे इस बेहद पिछड़े और दूरस्थ गांव की भौगोलिक लाचारी ने भी दोनों जिंदगियों को समय पर इलाज न मिल पाने में एक बड़ी भूमिका निभाई।
.....कोट
बेटे की चाहत और सामाजिक झिझक के कारण नौवें गर्भधारण को छिपाना और अंत समय में नवजात को उच्च चिकित्सा संस्थान ले जाने में परिजनों का कड़ा विरोध करना बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने गर्भावस्था के पंजीकरण से लेकर अल्ट्रासाउंड और नवजात की जान बचाने के लिए 108 एंबुलेंस और डॉक्टर भेजने तक के हरसंभव प्रयास किए थे लेकिन परिजनों के असहयोग के आगे व्यवस्थाएं लाचार हो गईं। इस संवेदनशील मामले की विस्तृत विभागीय जांच और मातृ एवं शिशु मृत्यु की समीक्षा कराई जा रही है।
.........डॉ. कुमार आदित्य तिवारी, सीएमओ, बागेश्वर