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UK: अब लैब में 50 दिन में तैयार होगा यारसा गंबू, कुमाऊं विवि ने ईजाद की नई तकनीक; पेटेंट कराने की तैयारी

Thu, 09 Jul 2026 10:58 AM IST
Heera पंकज कुमार
पंकज कुमार Published by: Heera Updated Thu, 09 Jul 2026 10:58 AM IST
सार

कुमाऊं विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग ने कीड़ाजड़ी की वृद्धि दर बढ़ाने की नई तकनीक विकसित की है। वैज्ञानिक डॉ. संतोष उपाध्याय ने सही तापमान और वातावरण का संतुलन बनाकर इसे रिकॉर्ड समय में उगाने में सफलता पाई है। 

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Now Yarsa Gumba will be prepared in the lab in 50 days in Kumaon University
कीड़ाजड़ी

विस्तार

कुमाऊं यूनिवर्सिटी के बायोटेक्नोलॉजी विभाग ने कीड़ाजड़ी (कॉर्डिसेप्स मिलिटेरिस) की वृद्धि दर तेज करने की नई तकनीक खोजी है। वैज्ञानिक डॉ. संतोष उपाध्याय ने सही तापमान और माहौल का तालमेल बिठाकर इस दुर्लभ परजीवी कवक को रिकॉर्ड समय में उगाने में कामयाबी पाई है। यूनिवर्सिटी अब इस तकनीक का पेटेंट कराएगी ताकि भविष्य में बड़े पैमाने पर इसका व्यावसायिक उत्पादन किया जा सके।

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डॉ. संतोष उपाध्याय ने कल्टीवेशन प्रोटोकॉल के दौरान प्रयोगशाला में तापमान, प्रकाश, आर्द्रता और पोषक तत्वों जैसी विभिन्न भौतिक-रासायनिक परिस्थितियों में वैज्ञानिक बदलाव किए। इस सटीक संतुलन के कारण यह कवक बेहद कम समय में अपनी इष्टतम वृद्धि हासिल करने में सफल रहा। डॉ. उपाध्याय के मुताबिक विकसित किया गया यह कल्टीवेशन प्रोटोकॉल पूरी तरह से नया और उन्नत है जिससे कम समय में बेहतर फसल चक्र प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक रूप से मिलने वाली कीड़ा जड़ी हिमालयी क्षेत्रों के बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में पाई जाती है। अत्यधिक अंधाधुंध कटाई के कारण यह प्रजाति खतरे में है। विश्वविद्यालय की इस सफलता से इन-विट्रो उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। इससे प्राकृतिक संपदा पर से दोहन का दबाव काफी हद तक कम हो जाएगा। इसके साथ ही यह बाजार में शुद्धता और एक किफायती विकल्प भी पेश करेगी। प्राकृतिक रूप से मिलने वाले कॉर्डिसेप्स की कीमत बाजार में 1.2 लाख से 9 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है जिससे यह आम लोगों की पहुंच से दूर है। कहा कि उनकी ओर से विकसित इन-विट्रो तकनीक से तैयार सूखे फ्रूटिंग बॉडीज बाजार में महज 18,000 से 40,000 रुपये प्रति किलोग्राम की किफायती दर पर उपलब्ध हो सकेगा।

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उच्च गुणवत्ता की है लैब में उगाई गई कीड़ा जड़ी
प्रयोगशाला में उगाई गई इस कीड़ा जड़ी के औषधीय गुण इसके जंगली रूप के समान ही उच्च गुणवत्ता वाले हैं। इसमें पाए जाने वाले एक्टिव बायो-कंपाउंड्स मुख्य रूप से एंटी-एजिंग (कोशिकाओं की उम्र बढ़ने से रोकने), कैंसर-रोधी गतिविधियों को बाधित करने, कामोत्तेजक और इम्यूनोमोड्यूलेटरी (रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने) गुणों से भरपूर हैं। इसके अलावा यह सूजन-रोधी, एंटीऑक्सीडेंट और न्यूरोप्रोटेक्टिव (तंत्रिका तंत्र की रक्षा करने) में पूरी तरह सक्षम पाई गई है।

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इस क्षेत्र में आएगी काम
विषय विशेषज्ञों के मुताबिक कुमाऊं विश्वविद्यालय का यह सफल शोध आने वाले समय में उत्तराखंड में मेडिकल बायोटेक, फार्मास्युटिकल और मशरूम कल्टीवेशन के क्षेत्र में स्टार्टअप और व्यावसायिक क्रांति लाने के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

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