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बवासीर से लेकर बांझपन तक का इलाज: कुमाऊं विवि ने थारू जनजाति के 100 पौधों की पहचान की, कहा- बचाना जरूरी

Thu, 06 Aug 2026 12:10 PM IST
Heera पंकज कुमार
पंकज कुमार Published by: Heera Updated Thu, 06 Aug 2026 12:10 PM IST
सार

कुमाऊं यूनिवर्सिटी के शोध में तराई-भाबर में थारू जनजाति की ओर से बवासीर और बांझपन के इलाज में उपयोग किए जाने वाले एस्ट्रेसी कुल के 100 से अधिक अनूठे पौधों की पहचान हुई है।

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शोध के दौरान जानकारी लेतीं शोधार्थी शीतल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 

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यदि समय रहते उत्तराखंड की थारू जनजाति के मौखिक औषधीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण नहीं किया गया तो भविष्य की कई जीवनरक्षक दवाओं की कड़ियां हमेशा के लिए खो जाएंगी। कुमाऊं यूनिवर्सिटी के हालिया शोध में तराई-भाबर बेल्ट से एस्ट्रेसी कुल के 100 से अधिक अनूठे पौधों की पहचान की गई है जिनमें से आधे से अधिक का उपयोग थारू समाज बवासीर और बांझपन जैसे रोगों के इलाज में कर रहा है। वैज्ञानिकों ने सचेत किया है कि जंगलों के कटान और शहरीकरण से यह बहुमूल्य पारंपरिक ज्ञान तेजी से लुप्त हो रहा है।

कुमाऊं विश्वविद्यालय की शोधकर्ता शीतल शर्मा और वरिष्ठ वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. स्नेह लता की ओर से उत्तराखंड के मैदानी और तराई क्षेत्रों में फील्ड सर्वे किया गया। इस विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन में एस्ट्रेसी (सूर्यमुखी) परिवार के पौधों की जैविक संरचना और उनके पारंपरिक औषधीय उपयोगों को लेकर कई चौंकाने वाले वैज्ञानिक आंकड़े जारी किए गए हैं। शोध के सांख्यिकीय विश्लेषण और वर्गीकरण से यह प्रमाणित हुआ है कि तराई-भाबर बेल्ट के अनूठे भौगोलिक परिदृश्य, जैसे कि पथरीले रास्तों और दलदली इलाकों से एकत्रित की गई कुल पादप वनस्पति में 88 फीसदी हिस्सा केवल शाकीय पौधों का है। इसके अलावा, बचे हुए हिस्से में नौ फीसदी छोटे झाड़ीदार पौधे और शेष तीन फीसदी में अन्य विशिष्ट वानस्पतिक प्रजातियां शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इन शाकीय पौधों में पाए जाने वाले एक्टिव फाइटोकेमिकल्स ही इन्हें औषधीय रूप से इतना प्रभावशाली और गुणकारी बनाते हैं।

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विदेशी प्रजातियों का स्थानीयकरण और रामबाण इलाज

शोध का एक मुख्य आंकड़ा यह भी है कि इस बेल्ट में पाई जाने वाली लगभग 50 से अधिक प्रजातियां मूल रूप से विदेशी हैं, जो समय के साथ यहां के पर्यावरण में रच-बस गई हैं। स्थानीय वैद्य और थारू समुदाय के लोग इन पौधों का अद्भुत इस्तेमाल कर रहे हैं। अध्ययन के अनुसार एजरेटम कोनीजाइड्स (गंधेली) का उपयोग घाव सुखाने में, एक्लिप्टा एल्बा (भृंगराज) का उपयोग बांझपन के इलाज में और लौनिया प्रोकम्बेंस (दूधिया कटीला) का उपयोग बवासीर को ठीक करने में किया जा रहा है।

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आधुनिक फार्माकोलॉजी में उपयोग की मांग

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि थारू जनजाति का यह बहुमूल्य औषधीय ज्ञान केवल मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर हो रहा है। लिखित रिकॉर्ड न होने और तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण यह धरोहर खत्म होने की कगार पर है। शोधकर्ता शीतल शर्मा का कहना है कि यदि इन आंकड़ों और फाइटोकेमिकल्स का आधुनिक फार्माकोलॉजी में उपयोग कर समय रहते व्यवस्थित प्रलेखन नहीं किया गया तो चिकित्सा जगत एक बड़े अवसर से हाथ धो बैठेगा।

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