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Pithoragarh News: हैप्पी बर्थ-डे पिथौरागढ़... 66 साल में विकास भी देखा और पलायन भी

संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़ Updated Mon, 23 Feb 2026 11:49 PM IST
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Happy Birthday Pithoragarh... In 66 years, we have seen both development and migration.
 पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय का दृश्य। संवाद
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पिथौरागढ़। सीमांत पिथौरागढ़ जिले की स्थापना का आज 66वां जन्मदिन है। इन 66 वर्षों में जनपद ने कई उतार-चढ़ाव देखे और आज विकास की ओर अग्रसर है। हालांकि जिले के कई गांवों में पलायन और रोजगार की समस्या विकट हो चुकी है।
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वर्ष 1960 में चीन के साथ बढ़ते सीमा विवाद और सामरिक सुरक्षा की जरूरतों के कारण 24 फरवरी को उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ तीन सीमांत जिले बनाए गए। गुफा मानव काल से ही इस सीमांत जिले में बसासतें रहीं हैं। अंग्रेजों ने 1816 में सिगौली संधि के बाद यहां मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के लिए रास्ते और पुल बनाए। साथ ही भूमि की राजस्व प्रणाली में सुधार किया। देश में पंचवर्षीय योजना शुरू होने से सीमांत जिले को आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए विशेष सुविधाएं मिलीं।
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जिले की स्थापना के बाद सीमांत क्षेत्र में बिजली, पानी, सड़क आदि सुविधाएं जुटाई गईं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से सत्ता पर काबिज सरकारों ने विकास को आगे बढ़ाने का कार्य किया। वर्तमान में जिले में एक नगर निगम, चार नगरपालिका और एक नगर पंचायत अस्तित्व में हैं। अधिकांश गांवों तक सड़क सुविधा का विस्तार हो गया है।
कभी भौगोलिक दृष्टि से बेहद दुर्गम समझे जाने वाले आदि कैलाश, ओम पर्वत के साथ ही पंचाचूली दर्शन की राह वर्तमान में सड़क सुविधा बेहतर होने से काफी आसान हो गई है। चीन सीमा लिपुलेख तक सड़क बनाने का कार्य तेजी से चल रहा है। उच्च हिमालयी गांवों में सड़क और बिजली की सुविधा पहुंचाई जा रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए बेस और मेडिकल कॉलेज का निर्माण किया जा रहा है।
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पौराणिक है कैलाश मानसरोवर यात्रा पथ
त्रेता युग के समय से ही पिथौरागढ़ कैलाश मानसरोवर यात्रा का पथ है। अयोध्या के राजा श्रीराम के वंशज मांधाता ने सबसे पहले भगवान भोलेनाथ के पावन स्थल कैलाश को खोजा था। तभी से मानसरोवर की यात्रा शुरू हुई थी।
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पलायन से 66 गांव हो गए जनशून्य
सीमांत जिले में पलायन सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है जिसे रोकने में सिस्टम पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले दो दशक में जिले में 66 गांव गैर आबाद घोषित किए गए हैं। इन गांवों के सभी ग्रामीण पलायन कर चुके हैं जो अब गांव भी नहीं आते हैं। इन गांवों के वीरान और खंडहर हो चुके घर और बाखलियां पलायन का दर्द बयां कर रही हैं। मूलभूत सुविधाओं का कुछ हद तक विस्तार तो हुआ लेकिन इनके गांव पहुंचने तक देर हो गई।
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पलायन रोकने के लिए करनी होगी पहल : कसनियाल
वरिष्ठ पत्रकार बीडी कसनियाल कहते हैं कि सरकारों ने सामरिक दृष्टि से सीमांत जिले का विकास किया। गांवों में रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं होने से पलायन वर्तमान में गंभीर समस्या बन गया है। उनका कहना है कि सीमांत का अवस्थापना विस्तार ग्रामीण रोजगार के अनुरूप किया जाना चाहिए।
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