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Udham Singh Nagar News: पृथ्वी दिवस...... कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहा काशीपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
Updated Wed, 22 Apr 2026 12:55 AM IST
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काशीपुर। तराई पश्चिमी वन प्रभाग के काशीपुर रेंज में अब जंगल नाममात्र का बचा हुआ है। पहले इस रेंज में 20 फीसदी वन क्षेत्र था जो अब सिर्फ एक फीसदी ही रह गया है। तहसील क्षेत्र में 30 फीसदी से अधिक भूमि कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गई है।
कभी तराई को फसल उत्पादन में मिनी पंजाब कहा जाता था लेकिन राज्य गठन के बाद प्रॉपर्टी डीलरों की एक जमात खड़ी हो गई। लोग अन्य कारोबार छोड़ गांवों में सस्ते में कृषि भूमि खरीद कर मानकों को ताक में रखकर बना प्लॉटिंग की जा रही है। प्रॉपर्टी डीलर खरीदार को भूखंड बेच देते हैं, मकान खरीदार स्वयं बनाता है।
इन कॉलोनियों में संकरे रास्ते, सार्वजनिक स्थान, मंदिर, सीवर लाइन की कोई व्यवस्था नहीं होती। काशीपुर-कुंडेश्वरी मार्ग, काशीपुर-जसपुर मार्ग, काशीपुर-रामनगर मार्ग, काशीपुर-अलीगंज मार्ग, काशीपुर-दढ़ियाल मार्ग पर करीब साठ प्रतिशत भूमि प्लॉटिंग के लिए भूमि बिक चुकी है। नियमानुसार नदी के तट से 200 मीटर दूर तक निर्माण नहीं हो सकता है, लेकिन यहां ढेला नदी के किनारे कॉलोनियों कट गई हैं और मकान भी बन गए।
इन क्षेत्रों में फैला था काशीपुर रेंज का जंगल
काशीपुर रेंज के क्षेत्र में गोविंदपुर, चांदपुर, मानपुर, कचनालगाजी, गढ़ी इंद्रजीत, प्रतापपुर, जसपुर खुर्द, नीझड़ा, ढकिया गुलाबो, सरवरखेड़ा, बैलजुड़ी, कुंडेश्वरी, स्कॉर्ट फार्म, कुमाऊं और गढ़वाल ब्लॉक, शंकरपुरी, कुआंखेड़ा, मालवा फार्म, हिम्मतपुर आदि क्षेत्रों में जंगल फैला हुआ था। वन विभाग के पूर्व अधिकारी ने बताया कि पिछले 20 से 25 सालों में इन स्थानों पर जंगल तेजी से कटे और कॉलोनियां बसनी शुरू हो गई। हालात ऐसे हैं अब यहां पर जंगल का नामोनिशान नहीं बचा है।
गोविंदपुर में बचा है 10 हेक्टेयर जंगल
काशीपुर रेंज के गोविंदपुर क्षेत्र में ही अब केवल 10 हेक्टेयर जंगल बचा है। 10 हेक्टेयर जंगल की रखवाली करने में काशीपुर रेंज के वन कर्मी लगे रहते हैं। कुछ जंगल का हिस्सा ढेला नदी के किनारे ही बचा है। चांदपुर, मानपुर, फिरोजपुर के गांव जंगल से लगे हुए हैं, यहां आए दिन जंगली वन्यजीवों का आगमन रहता है।
कोट :-
काशीपुर रेंज के अंतर्गत गोविंदपुर में ही दस हेक्टेयर का जंगल बचा हुआ है। जंगल को तस्करों और वन्यजीवों को शिकारियों से बचाने के लिए वन कर्मियों की गश्त की जाती है। - देवेंद्र सिंह रजवार, वन क्षेत्राधिकारी काशीपुर
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पृथ्वी दिवस - 2 ..... पॉलीथिन से पटे कूड़ा प्वाइंट : मानव स्वास्थ्य और पशुधन के लिए बड़ा संकट
प्रतिबंधित पॉलीथिन का दुकानदार खुलेआम कर रहे प्रयोग
राजीव कुमार
काशीपुर। पॉलिथीन के ढेर न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि आमजन और विशेष रूप से बेजुबान जानवरों के लिए एक बहुत बड़ी और जानलेवा समस्या बन चुके हैं। शहरों और गांवों में खुले में फेंके गए पॉलिथीन के कारण पशु-पक्षी असमय मौत का शिकार हो रहे हैं, साथ ही यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।
पॉलिथीन दुकानों से सामान के साथ लोगों के घरों तक पहुंचती है। इसके बाद लोग इसमें कूड़ा और जूठन बांधकर कूड़े के ढेर में फेंक देते हैं। यह पॉलिथीन आवारा पशुओं का निवाला बनती हैं और जानवरों में बीमारियों का सबब बनती है। अक्सर सब्जी मंडियों में लगे कूड़े के ढेर में मवेशी चारा तलाशते नजर आ जाएंगे। मवेशी चारे के तलाश में पॉलीथिन को भी खा जाते हैं, जो उनकी जान पर बन आती है।
राजकीय पशु चिकित्सालय के डॉ. मुकेश चंद्र पांडे बताते हैं कि पेट के अंदर पॉलिथीन न गलने से मवेशियों का पेट लटक जाता है। पशु चारा खाना भी छोड़ देता है। पेट में पॉलिथीन होने से मवेशी जुगाली करना भी छोड़ देते हैं। इससे एंजाइम नहीं बन पाता है और गोबर करने में परेशानी होती है।
नहीं थम रहा पॉलिथीन का प्रयोग
प्रतिबंध के बाद भी शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिबंधित पॉलिथीन का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। दुकानदार बेधड़क पॉलिथीन का उपयोग कर रहे हैं। चैती मेले में मेला प्रशासन ने पॉलिथीन में सामान बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था बावजूद इसके मेले में इसका खुलेआम प्रयोग होता रहा और निगम प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। कुछ दुकानदार विकल्प के रूप में कागज का लिफाफा भी रखने लगे हैं।
जानवरों के लिए जानलेवा...
- भोजन की तलाश में सड़कों और कूड़ेदानों में फेंके गए खाने के पैकेट के साथ पशु प्लास्टिक की थैलियां भी खा जाते हैं।
- प्लास्टिक खाने से जानवरों के पेट में गांठ बन जाती है जिससे पाचन क्रिया बंद हो जाती है गोबर करने में परेशानी होती है।
- खच्चर व घोड़े कैल्शियम व फॉस्फोरिक की पूर्ति के लिए सीमेंट के खाली कट्टे व गत्ता खा जाते हैं। इससे उनको पेट दर्द, लोटपोट करना, पेट में बार-बार लात मारते हैं।
मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव...
पॉलिथीन के ढेर में पानी भरा होने से मच्छर पनपते हैं जिससे मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियां फैलती हैं।
- जब प्लास्टिक को जलाया जाता है, तो उससे कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और डायोक्सिन जैसी विषैली गैसें निकलती हैं जो सांस और त्वचा की गंभीर बीमारियों का कारण बनती हैं।
- प्लास्टिक धीरे-धीरे टूट कर माइक्रो प्लास्टिक में बदल जाता है, जो पानी और भोजन के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर जाती है। यह बीमारियों को न्यौता देती है।
पर्यावरण और जल निकासी में दिक्कत...
- पॉलीथिन के कारण नालियां और सीवर जाम हो जाते हैं, जिससे जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है।
- प्लास्टिक नॉन-बायोडिग्रेडेबल है, जो मिट्टी में मिलकर उसकी उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर देता है।
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कभी तराई को फसल उत्पादन में मिनी पंजाब कहा जाता था लेकिन राज्य गठन के बाद प्रॉपर्टी डीलरों की एक जमात खड़ी हो गई। लोग अन्य कारोबार छोड़ गांवों में सस्ते में कृषि भूमि खरीद कर मानकों को ताक में रखकर बना प्लॉटिंग की जा रही है। प्रॉपर्टी डीलर खरीदार को भूखंड बेच देते हैं, मकान खरीदार स्वयं बनाता है।
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इन कॉलोनियों में संकरे रास्ते, सार्वजनिक स्थान, मंदिर, सीवर लाइन की कोई व्यवस्था नहीं होती। काशीपुर-कुंडेश्वरी मार्ग, काशीपुर-जसपुर मार्ग, काशीपुर-रामनगर मार्ग, काशीपुर-अलीगंज मार्ग, काशीपुर-दढ़ियाल मार्ग पर करीब साठ प्रतिशत भूमि प्लॉटिंग के लिए भूमि बिक चुकी है। नियमानुसार नदी के तट से 200 मीटर दूर तक निर्माण नहीं हो सकता है, लेकिन यहां ढेला नदी के किनारे कॉलोनियों कट गई हैं और मकान भी बन गए।
इन क्षेत्रों में फैला था काशीपुर रेंज का जंगल
काशीपुर रेंज के क्षेत्र में गोविंदपुर, चांदपुर, मानपुर, कचनालगाजी, गढ़ी इंद्रजीत, प्रतापपुर, जसपुर खुर्द, नीझड़ा, ढकिया गुलाबो, सरवरखेड़ा, बैलजुड़ी, कुंडेश्वरी, स्कॉर्ट फार्म, कुमाऊं और गढ़वाल ब्लॉक, शंकरपुरी, कुआंखेड़ा, मालवा फार्म, हिम्मतपुर आदि क्षेत्रों में जंगल फैला हुआ था। वन विभाग के पूर्व अधिकारी ने बताया कि पिछले 20 से 25 सालों में इन स्थानों पर जंगल तेजी से कटे और कॉलोनियां बसनी शुरू हो गई। हालात ऐसे हैं अब यहां पर जंगल का नामोनिशान नहीं बचा है।
गोविंदपुर में बचा है 10 हेक्टेयर जंगल
काशीपुर रेंज के गोविंदपुर क्षेत्र में ही अब केवल 10 हेक्टेयर जंगल बचा है। 10 हेक्टेयर जंगल की रखवाली करने में काशीपुर रेंज के वन कर्मी लगे रहते हैं। कुछ जंगल का हिस्सा ढेला नदी के किनारे ही बचा है। चांदपुर, मानपुर, फिरोजपुर के गांव जंगल से लगे हुए हैं, यहां आए दिन जंगली वन्यजीवों का आगमन रहता है।
कोट :-
काशीपुर रेंज के अंतर्गत गोविंदपुर में ही दस हेक्टेयर का जंगल बचा हुआ है। जंगल को तस्करों और वन्यजीवों को शिकारियों से बचाने के लिए वन कर्मियों की गश्त की जाती है। - देवेंद्र सिंह रजवार, वन क्षेत्राधिकारी काशीपुर
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पृथ्वी दिवस - 2 ..... पॉलीथिन से पटे कूड़ा प्वाइंट : मानव स्वास्थ्य और पशुधन के लिए बड़ा संकट
प्रतिबंधित पॉलीथिन का दुकानदार खुलेआम कर रहे प्रयोग
राजीव कुमार
काशीपुर। पॉलिथीन के ढेर न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि आमजन और विशेष रूप से बेजुबान जानवरों के लिए एक बहुत बड़ी और जानलेवा समस्या बन चुके हैं। शहरों और गांवों में खुले में फेंके गए पॉलिथीन के कारण पशु-पक्षी असमय मौत का शिकार हो रहे हैं, साथ ही यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।
पॉलिथीन दुकानों से सामान के साथ लोगों के घरों तक पहुंचती है। इसके बाद लोग इसमें कूड़ा और जूठन बांधकर कूड़े के ढेर में फेंक देते हैं। यह पॉलिथीन आवारा पशुओं का निवाला बनती हैं और जानवरों में बीमारियों का सबब बनती है। अक्सर सब्जी मंडियों में लगे कूड़े के ढेर में मवेशी चारा तलाशते नजर आ जाएंगे। मवेशी चारे के तलाश में पॉलीथिन को भी खा जाते हैं, जो उनकी जान पर बन आती है।
राजकीय पशु चिकित्सालय के डॉ. मुकेश चंद्र पांडे बताते हैं कि पेट के अंदर पॉलिथीन न गलने से मवेशियों का पेट लटक जाता है। पशु चारा खाना भी छोड़ देता है। पेट में पॉलिथीन होने से मवेशी जुगाली करना भी छोड़ देते हैं। इससे एंजाइम नहीं बन पाता है और गोबर करने में परेशानी होती है।
नहीं थम रहा पॉलिथीन का प्रयोग
प्रतिबंध के बाद भी शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिबंधित पॉलिथीन का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। दुकानदार बेधड़क पॉलिथीन का उपयोग कर रहे हैं। चैती मेले में मेला प्रशासन ने पॉलिथीन में सामान बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था बावजूद इसके मेले में इसका खुलेआम प्रयोग होता रहा और निगम प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। कुछ दुकानदार विकल्प के रूप में कागज का लिफाफा भी रखने लगे हैं।
जानवरों के लिए जानलेवा...
- भोजन की तलाश में सड़कों और कूड़ेदानों में फेंके गए खाने के पैकेट के साथ पशु प्लास्टिक की थैलियां भी खा जाते हैं।
- प्लास्टिक खाने से जानवरों के पेट में गांठ बन जाती है जिससे पाचन क्रिया बंद हो जाती है गोबर करने में परेशानी होती है।
- खच्चर व घोड़े कैल्शियम व फॉस्फोरिक की पूर्ति के लिए सीमेंट के खाली कट्टे व गत्ता खा जाते हैं। इससे उनको पेट दर्द, लोटपोट करना, पेट में बार-बार लात मारते हैं।
मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव...
पॉलिथीन के ढेर में पानी भरा होने से मच्छर पनपते हैं जिससे मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियां फैलती हैं।
- जब प्लास्टिक को जलाया जाता है, तो उससे कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और डायोक्सिन जैसी विषैली गैसें निकलती हैं जो सांस और त्वचा की गंभीर बीमारियों का कारण बनती हैं।
- प्लास्टिक धीरे-धीरे टूट कर माइक्रो प्लास्टिक में बदल जाता है, जो पानी और भोजन के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर जाती है। यह बीमारियों को न्यौता देती है।
पर्यावरण और जल निकासी में दिक्कत...
- पॉलीथिन के कारण नालियां और सीवर जाम हो जाते हैं, जिससे जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है।
- प्लास्टिक नॉन-बायोडिग्रेडेबल है, जो मिट्टी में मिलकर उसकी उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर देता है।

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