Exclusive News: अब गन्ने, पाॅपुलर और यूकेलिप्टिस के बगास से बनेगा अल्कोहल
जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि के वैज्ञानिकों ने गन्ना, पॉपुलर और यूकेलिप्टिस के बगास से 90 प्रतिशत तक बायो एथेनॉल उत्पादन की उन्नत तकनीक विकसित की है।
विस्तार
पंतनगर जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विवि के रसायन वैज्ञानिकों ने गन्ने, पॉपुलर और यूकेलिप्टिस के बगास से अल्कोहल (बायो एथेनाल) बनाने की ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें 90 प्रतिशत तक अल्कोहल प्राप्त होगा। जबकि अभी तक शक्कर से मात्र 10 से 12 प्रतिशत ही अल्कोहल से प्राप्त होती थी। विवि इस तकनीक का पेटेंट हासिल करने के बाद इसे एक औद्योगिक प्रतिष्ठान को यह तकनीक हस्तांतरित कर रहा है। जिससे आने वाले समय में अल्कोहल के लिए चीन पर निर्भरता में कमी आएगी।
देश में अल्कोहल मुख्यतः गन्ने से बनाया जाता है। खपत के सापेक्ष आपूर्ति बहुत कम होने से इसे चीन से आयात किया जाता है। विवि के सीबीएसएच काॅलेज में रसायन विज्ञान के प्राध्यापक डाॅ. एमजीएच जैदी और डाॅ. समीना महताब के निर्देशन में शोधार्थी मो. अजीज ने 12 वर्ष तक अध्ययन करने के बाद ऐसी तकनीक ईजाद की है। अब गन्ना, पाॅपुलर और यूकेलिप्टिस पेड़ से भी अल्कोहल बनाया जा सकेगा। हाल ही में इसकी साइंटिफिक रिपोर्ट नेचर द्वारा जनरल में प्रकाशित हुई है।
डाॅ. समीना ने बताया कि देश में वर्ष 2021 में इन पेड़ों से 230 करोड़ मीट्रिक टन बायोमास निकला था जो वर्ष 2023 में बढ़कर 750 मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है। इसका उपयोग मुख्यतः ईंधन, चारा और इमारती सामान बनाने में किया जाता है। जबकि इस बायोमास में 70-90 प्रतिशत तक शर्करा बहुलक (सेल्युलोज) पाए जाते हैं जो बायो एथेनाॅल (अल्कोहल) के औद्योगिक उत्पादन में बहुत उपयुक्त है।
देश में बायो एथेनाॅल उत्पादन के लिए खाने वाली शर्करा ही उपयोग की जा ती है जबकि चीन और ताइवान ने बहुत पहले इन पौधों के बायोमास से अल्कोहल बनाने की तकनीक ईजाद कर ली थी लेकिन उसने अब तक उसे किसी से साझा नहीं किया है। सभी देश बायो एथेनाॅल बनाने में किण्वन तकनीक का उपयोग करते हैं। संवाद
यह है नई तकनीक
बायो एथेनाल बायोलाॅजिकल रिसोर्सेज से ड्राइव किया हुआ एक उत्पाद है। बायोलाॅजिकल रिसोर्सेज अधिकतर शुगर या गन्ने, पाॅपुलर व यूकलिप्टिस के बगास में पाए जाते हैं। इन्हीं पौधों के बगास से सेल्युलोज फाइबर निकालकर अल्कोहल बनाने की तकनीक विकसित की गई है। इसमें पहले बायोमास के रूप में पौधों की बगास से सेल्युलोज को आइसोलेट किया गया। उसके बाद इसे इन्क्युवेट कर फर्मल्टेबल शुगर बनाई गई। शुगर को हाइड्रोलाइज कर उसमें एंजाइम डाला। इसके बाद कार्बन डाइऑक्साइड को लिक्विड बनाकर डाला। लिक्विड कार्बन डाई ऑक्साइड बायोमास और सेल्युलोज को स्वेल कर देती है और एंजाइम उसके अंदर इनफोर्स हो जाता है। जबकि पुरानी तकनीक में कार्बोहाइड्रेट बायोमास सर्फेस की ऊपरी सतह को शुगर में तब्दील करता है और अंदर का हिस्सा ऐसे ही छूट जाता है।
पुरानी तकनीक में शुगर से ऐसे बनता था अल्कोहल
किण्वन तकनीक में पहले बायोमास से सेल्युलोज निकाला जाता है फिर सेल्युलोज का एंजाइम के साथ किण्वन करते हैं और वेपुरेशन के बाद शुगर बनती है। जिसे आइसोलेट करने के बाद पुनः एंजाइम के साथ किण्वन करने पर अल्कोहल प्राप्त होता है, जो मात्र 10 से 12 प्रतिशत ही होता है। जबकि बायोमास कोे शुगर बनाने के लिए प्रयोग करें, तो एंजाइम को बायोमास के पल्प के अंदर री-इनफोर्स करना चाहिए। जिसमें समस्या आती है कि बायोमास को री-इनफोर्स करने के लिए किसी ऑर्गेनिक साल्वेंट की आवश्यकता होगी।
हम लोगों ने करीब 12 वर्ष की मेहनत में गन्ना, पाॅपुलर व यूकेलिप्टिस आदि के बगास से अल्कोहल बनाने की तकनीक ईजाद की है। चीन भी इन्हीं से अल्कोहल बना रहा है और दुनिया को सस्ती दर पर बेच रहा है। भारत में शक्कर से मात्र 10-12 प्रतिशत अल्कोहल बनने के कारण करीब छह गुना महंगा है। इस तकनीक से अल्कोहल बनाने पर भारत की चीन पर निर्भरता कम होगी। - डाॅ. एमजीएच जैदी, प्राध्यापक रसायन विज्ञान, पंतनगर विवि

कमेंट
कमेंट X