सरकार से सवाल: बुलेट ट्रेन दौड़ाने का शौक, पर कोपा के बच्चों की जान बचाने वाला पुल क्यों नहीं? ये है हकीकत
बुलेट ट्रेन और स्मार्ट क्लासों वाले राज्य में गदरपुर के बच्चे शिक्षा के लिए रोजाना जान जोखिम में डालते हैं। यहां न तो पुल है और न ही कोई नाविक, मासूम बच्चे खुद साइकिलें छोटी नाव पर लादकर उफनते डैम को पार करते हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जिस राज्य में बुलेट ट्रेन का सपना साकार हो गया और स्कूलों में कक्षाएं स्मार्ट हो गईं। उसी राज्य के एक छोटे से गांव गदरपुर के कोपा से शिक्षा के लिए संघर्ष करने की तस्वीर सामने आई है। बच्चे जब नाव चलाकर खुद डैम पार करते हैं तो भविष्य का कल दिखाई देने लगता है।
गदरपुर विधानसभा के कोपा ग्राम सभा के अंतर्गत आने वाला डामअंदर क्षेत्र तराई की बसासत के बाद से चुनौतियों और सुविधाओं के अभाव के बीच जूझ रहा है। यहां के लोग अपने जीवन को चलाने के लिए रोजाना संघर्ष के साथ डैम को नौका से पार कर आते-जाते हैं। बात सिर्फ यहां रोजगार और कामगारों की नहीं है। असली संघर्ष वह मासूम कर रहे हैं जो भारत का अगला भविष्य बन सकते हैं। यहां स्कूली बच्चों को शिक्षा हासिल करने के लिए रोजाना जान जोखिम में डालकर डैम पार करनी पड़ती है। यहां न तो कोई पुल है और न ही बच्चों को सुरक्षित पार कराने के लिए कोई नाविक तैनात है। बस एक मिट्टी की टूटी सड़क है जिसे पार करना किसी खाई से गुजरना जैसा है। मजबूरी में मासूम बच्चे खुद ही नाव की पतवार संभालकर डैम पार करते हैं। हर सुबह बच्चे अपनी साइकिलों और स्कूल बैग के साथ नदी किनारे पहुंचते हैं। साइकिलों को छोटी नाव पर लादने के बाद वे आपस में मिलकर पतवार चलाते हैं और उफनते पानी के बीच दूसरे किनारे तक पहुंचते हैं। जरा-सी चूक या संतुलन बिगड़ने पर बड़ा हादसा होने की आशंका बनी रहती है। इसके बावजूद बच्चों की पढ़ाई का जुनून उन्हें हर दिन इस जोखिम भरे सफर के लिए मजबूर करता है।
चार महीने संघर्ष और चुनौतियों भरे
गांव में कोई राजकीय इंटर कॉलेज नहीं होने से गांव के बच्चे पास के शहरी क्षेत्र या दूसरे गांव के इंटर कॉलेज में पढ़ने जाते हैं। हैरानी की बात है कि हर साल बरसात के चार महीने 40 से 50 बच्चों को खतरे के जीवन नाव से डैम पार करके स्कूल से घर और आवास से स्कूल जाना पड़ता है। वह खुद ही नाविक बनकर पढ़ाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
गांव में दो स्कूल... दो शिक्षक के भरोसे
गांव के पूर्व ग्राम प्रधान मनोज देवराड़ी ने बताया कि गांव में एक जूनियर और एक प्राइमरी स्कूल है, जो सिर्फ दो शिक्षकों के भरोसे चल रहा है। बरसात के समय स्कूल में भी जलभराव की समस्या आ जाती है और स्कूल जाने में परेशानी भी बढ़ जाती है। सरकारी शिक्षक जब खुद नहीं आ पाते तो वह प्राइवेट टीचर को रख लेते हैं और वह ही बच्चों को पढ़ाते हैं।
बच्चों के लिए माता-पिता का भी पलायन
गांव में बुनियादी सुविधा न होने के कारण माता-पिता को पलायन का रास्ता अपनाना पड़ता है और कई परिवार बरसात के चार महीने अपने मूल निवास को छोड़ कर शहर में बच्चों की पढ़ाई के लिए चले जाते हैं और जब बरसात का समय पूरा हो जाता है तो वह वापस आ जाते है, लेकिन इस वजह से उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है।
तीन हजार की आबादी, बरसात में टूट जाती सड़क
कोपा के डामअंदर क्षेत्र में चार गांव कोपा मुनस्यारी, बसंता, कटपुलिया, सेवलचौड़, कोपा नया प्लॉट आते हैं। जिनमें तीन हजार की आबादी निवास करती है। यहां शहर को जाने वाली एक मात्र ही सड़क है लेकिन बरसात के समय वह सड़क पानी में ही बह जाती और टूट जाने के कारण उससे निकलना लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है।
पांच गांव के लोग इस समस्या से प्रभावित हैं और पिछले 15 वर्षों से जनप्रतिनिधियों और स्थानीय विधायक को अपनी मूतभूत समस्या से अवगत करा रहे हैं, लेकिन आज तक किसी ने भी इस समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया। इसके अलावा बीमार लोगों को अस्पताल तक ले जाने पर छह घंटे का समय लग जाता है। जिसके कारण कई बार बुजुर्गों की मौत भी हो चुकी है और कई गर्भवती महिलाएं बीच में बच्चे को जन्म दे देती हैं। मनोज देवराड़ी, पूर्व ग्राम प्रधान, कोपा।
गांव में हाईस्कूल के लिए कई बार प्रस्ताव भेज दिया गया है लेकिन शासन स्तर से अभी तक कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। अगर आदेश मिल जाता है तो समस्या का हल निकल जाएगा। - सावेद आलम, वीईओ