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सैनिकों और कर्मचारियों को पश्चिम एशिया से क्यों वापस बुला रहे ट्रंप?
वीडियो डेस्क अमर उजाला डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Thu, 12 Jun 2025 12:36 PM IST
अमेरिका ने पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) से अपने गैर-जरूरी स्टाफ, अतिरिक्त सैनिकों और उनके परिजनों को निकालने का बड़ा फैसला लिया है। यह फैसला ऐसे समय पर लिया गया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर तनातनी अपने चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कदम को सुरक्षा कारणों से जरूरी बताया है। उन्होंने साफ कहा है कि “पश्चिम एशिया एक खतरनाक जगह हो सकती है और हमने एहतियातन अपने लोगों को बाहर निकालने का नोटिस दिया है।”
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका विशेष रूप से इराक स्थित अपने दूतावास से कर्मचारियों को हटाने की तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही बहरीन और कुवैत में तैनात सैनिकों के परिवारों को भी अमेरिका लौटने का आदेश दिया गया है। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इसे एक “पूर्व एहतियाती” कदम बताया है और कहा कि “हमारे लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है।”
वर्तमान में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर बातचीत लगातार विफल हो रही है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान गुपचुप तरीके से परमाणु हथियार विकसित कर रहा है, जबकि ईरान इस आरोप से इनकार करता आया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं देगा।
ट्रंप ने कहा, “हम बहुत साफ हैं, ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते। अगर समझौता नहीं होता तो विकल्प खुले हैं।” इस बयान से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई तक का रास्ता अपना सकता है।
इस बीच, ईरान ने भी अमेरिका को चेतावनी दी है। ईरानी रक्षा मंत्री ने कहा है कि अगर संघर्ष शुरू हुआ, तो अमेरिका को पश्चिम एशिया छोड़ना पड़ेगा और उनके सैन्य ठिकाने मिसाइलों की जद में होंगे।
अमेरिकी विदेश विभाग ने बहरीन और कुवैत में तैनात सैनिकों के परिवारों को स्वैच्छिक वापसी की अनुमति दे दी है। वहीं, इराक में अमेरिकी दूतावास से “संयमित प्रस्थान” की योजना बनाई गई है। इराक में फिलहाल करीब 2,500 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, और वहां तेहरान समर्थित कई सशस्त्र गुट भी सक्रिय हैं, जो अमेरिका के लिए चुनौती बन सकते हैं।
एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि बहरीन में मौजूद अतिरिक्त कर्मचारियों को विशेष रूप से प्राथमिकता दी जा रही है। इराक, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जो मुख्य रूप से तेल उत्पादन और समुद्री सुरक्षा के लिए अहम माने जाते हैं।
ब्रिटेन की समुद्री एजेंसी ने भी चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां तेज होने वाली हैं, जिससे समुद्री मार्गों पर जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ सकता है। खासतौर पर ओमान की खाड़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी जैसे जलमार्गों से गुजरने वाले जहाजों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। ये सभी क्षेत्र ईरान की सीमा के निकट हैं।
वहीं दूसरी ओर, इस्राइल और ईरान के बीच भी तनाव गहराता जा रहा है। ऐसी खबरें थीं कि इस्राइल ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करने की योजना बना रहा है। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत की और उन्हें संयम बरतने की सलाह दी।
ट्रंप ने नेतन्याहू से कहा कि किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई स्थिति को और बिगाड़ सकती है। इस संवाद से स्पष्ट है कि अमेरिका क्षेत्रीय युद्ध से बचना चाहता है, लेकिन किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार भी है।
अमेरिकी विदेश विभाग और पेंटागन अब मिलकर इराक, बहरीन, कुवैत और इरबिल (इराकी कुर्दिस्तान) में स्थित अमेरिकी दूतावासों से कर्मचारियों को निकालने की प्रक्रिया को तेजी से अंजाम दे रहे हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार, इसे अनौपचारिक रूप से ‘ऑपरेशन एग्जिट’ कहा जा रहा है। यह फैसला अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की हालिया रिपोर्ट के बाद लिया गया है, जिसमें क्षेत्र में अमेरिकी हितों पर संभावित खतरे की चेतावनी दी गई थी।
फिलहाल अमेरिका यह साफ कर चुका है कि वह किसी संघर्ष से पहले अपने नागरिकों और सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। लेकिन ईरान पर दवाब बनाए रखने की नीति में कोई ढील नहीं दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर परमाणु वार्ता विफल होती है और इस्राइल या अमेरिका किसी सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ते हैं, तो पूरा पश्चिम एशिया युद्ध की चपेट में आ सकता है।
इस पूरी स्थिति में अगला कदम क्या होगा, यह अब वाशिंगटन और तेहरान की रणनीति पर निर्भर करेगा। लेकिन एक बात तय है — तनाव तेजी से बढ़ रहा है और अमेरिका अब खुलकर इसे एक “संभावित खतरे की स्थिति” मान चुका है।
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