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Chinese Company Enters the Iran War: How Is AI Tracking US Military Activities?
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ईरान युद्ध में चीनी कंपनी की एंट्री, AI कैसे ट्रैक कर रही अमेरिकी सेना की गतिविधियां?
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: Adarsh Jha Updated Mon, 06 Apr 2026 02:14 PM IST
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तेजी से बदलती दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अब सिर्फ तकनीक का हिस्सा नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला बड़ा हथियार बनती जा रही है। बीते कुछ वर्षों में AI ने स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार और सुरक्षा जैसे लगभग हर क्षेत्र में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है, लेकिन अब इसका सबसे बड़ा और संवेदनशील इस्तेमाल युद्ध के मैदान में दिखाई देने लगा है। पारंपरिक तौर पर युद्ध सैनिकों, हथियारों, जमीनी रणनीतियों और खुफिया एजेंसियों पर निर्भर होते थे, जहां जानकारी जुटाने और फैसले लेने में समय लगता था। लेकिन AI के आने के बाद यही प्रक्रिया तेज, सटीक और व्यापक हो गई है।
आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि डेटा और एल्गोरिद्म के जरिए भी लड़े जा रहे हैं। चीन जैसे देश इस नई तकनीक का इस्तेमाल कर न सिर्फ अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहे हैं, बल्कि दूसरे देशों के संघर्षों से भी रणनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूद वक्त की बात करें तो खासकर ईरान-इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े मौजूदा तनाव के बीच, चीनी कंपनियों द्वारा AI और ओपन-सोर्स डेटा के जरिए अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की निगरानी करने के दावे इस बदलते युद्ध परिदृश्य की एक बड़ी मिसाल बनकर सामने आए हैं।
जानकार मानते हैं कि AI ने युद्ध की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ दिया है। अब कोई भी देश सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना, तकनीक के जरिए दूसरे देशों के संघर्षों से जानकारी जुटाकर अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ा सकता है। इससे न सिर्फ युद्ध के तरीके बदल रहे हैं, बल्कि यह भी तय हो रहा है कि भविष्य में जीत केवल हथियारों से नहीं, बल्कि डेटा और तकनीकी बढ़त से तय होगी। अब अगर आप सोच रहे हैं की आखिर AI के बारे में मैं इतनी बात क्यों कर रहा हूं तो चलिए आपको बताते हैं की कैसे चीन AI के जरिए ईरान संघर्ष में अमेरिकी सेना की गतिविधियों को एआई से ट्रैक कर रहा है। और साथ में ये भी जानेंगे की ये खतरा कितना गंभीर? आइए लगाते हैं दूरबीन और जानते हैं दूर की खबर को पास से।
नमस्कार, मैं हूं आदर्श झा और आप देख रहें हैं अमर उजाला।
दरअसल, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच तकनीक ने युद्ध के स्वरूप को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की निजी कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और ओपन-सोर्स डेटा की मदद से अमेरिकी सैन्य गतिविधियों पर नजर रखने का दावा कर रही हैं। The Washington Post की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि ये कंपनियां ऐसे उन्नत इंटेलिजेंस टूल्स तैयार कर रही हैं, जो अमेरिकी सेना की गतिविधियों को ट्रैक और विश्लेषण कर सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन की कई प्राइवेट टेक कंपनियां पश्चिम एशिया में अमेरिकी सेना की तैनाती और मूवमेंट का विश्लेषण करने के लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा का इस्तेमाल कर रही हैं। इसमें सैटेलाइट इमेजरी, फ्लाइट ट्रैकिंग सिस्टम और शिपिंग डेटा जैसे स्रोत शामिल हैं। इन सभी सूचनाओं को एआई के जरिए प्रोसेस कर सेना की गतिविधियों का विस्तृत आकलन किया जा रहा है।
बताया गया है कि ईरान से जुड़े हालिया संघर्ष के शुरू होने के बाद से इस तरह की गतिविधियों में तेजी आई है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे पोस्ट सामने आए हैं, जिनमें अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर की लोकेशन, एयरबेस की गतिविधियां और सैन्य मूवमेंट से जुड़ी अहम जानकारी साझा की जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह एक तेजी से उभरता हुआ “इंटेलिजेंस मार्केटप्लेस” है, जहां निजी कंपनियां भी अब रणनीतिक जानकारी जुटाने और बेचने की दौड़ में शामिल हो गई हैं।
हालांकि, चीन ने आधिकारिक तौर पर खुद को इस पूरे संघर्ष से दूर बताया है, लेकिन रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया है कि इन कंपनियों में से कुछ के चीन के सैन्य ढांचे से संबंध हो सकते हैं। यह पहल चीन की “सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन” रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत निजी क्षेत्र की तकनीकी क्षमताओं को रक्षा क्षेत्र से जोड़ा जा रहा है।
खतरे को लेकर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की तकनीक अमेरिका के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है, जबकि कुछ इसे अभी शुरुआती स्तर का खतरा मानते हैं। American Enterprise Institute के फेलो Ryan Fedasiuk के अनुसार, चीन में जियोस्पेशियल एनालिसिस कंपनियों के बढ़ने से उसकी रक्षा क्षमता मजबूत होगी और संकट की स्थिति में वह अमेरिकी सेना का बेहतर मुकाबला कर सकेगा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ कंपनियां दावा कर रही हैं कि वे एआई की मदद से पश्चिमी और चीनी डेटा स्रोतों को मिलाकर रियल टाइम में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को ट्रैक कर सकती हैं। एक अन्य कंपनी ने यह दावा किया है कि वह एयरक्राफ्ट कम्युनिकेशन का विश्लेषण कर बड़े पैमाने पर सैन्य मूवमेंट की निगरानी करने में सक्षम है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव आधुनिक युद्ध की दिशा को पूरी तरह बदल सकता है। पहले जहां इस तरह की संवेदनशील जानकारी केवल सरकारों और खुफिया एजेंसियों तक सीमित रहती थी, वहीं अब ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) और एआई के मेल से यह जानकारी आम लोगों और निजी कंपनियों तक भी पहुंच रही है।
जैसे-जैसे कमर्शियल टेक्नोलॉजी अधिक शक्तिशाली होती जा रही है, सिविलियन और मिलिट्री इंटेलिजेंस के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं। इससे सैन्य ऑपरेशनों की गोपनीयता बनाए रखना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। यह स्थिति भविष्य के युद्धों में एक नई चुनौती के रूप में सामने आ सकती है, जहां डेटा और तकनीक हथियारों से भी अधिक अहम भूमिका निभाएंगे।
कुल मिलाकर, एआई और ओपन-सोर्स डेटा का यह बढ़ता उपयोग न केवल युद्ध के तरीकों को बदल रहा है, बल्कि वैश्विक सुरक्षा संतुलन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि देश इस नई तकनीकी चुनौती से कैसे निपटते हैं और अपने सैन्य रहस्यों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करते हैं।
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