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क्या है हेक्सागॉन अलायंस: भारत को क्यों इसका हिस्सा बनाना चाहता है इस्राइल, पश्चिम एशिया के लिए क्या है मकसद?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 25 Feb 2026 02:13 PM IST
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सार

इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी इसका जिक्र किया था और कहा था कि इस्राइल अपने सहयोगी देशों के साथ एक बड़ा नेटवर्क बनाना चाहता है, खासकर पश्चिम एशिया में या इसके आसपास। उन्होंने कहा कि इसका मकसद क्षेत्र में कट्टरपंथी दुश्मनों के खिलाफ साझा तौर पर खड़ा होना रहेगा। 

India Israel Relations Hexagon Alliance proposal by PM Benjamin Netanyahu know agenda and Target Radical Islam
इस्राइल का हेक्सागॉन ऑफ अलायंस बनाने का प्रस्ताव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को अपने दो दिवसीय दौरे पर इस्राइल पहुंचेंगे। यहां पीएम न सिर्फ इस्राइली संसद- नेसेट को संबोधित कर सकते हैं, बल्कि अपने समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू से कई अहम समझौतों पर बात कर उन पर मुहर भी लगा सकते हैं। 
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बीते कुछ दिनों से भारत-इस्राइल के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग को लेकर चर्चाएं बढ़ी हैं। इनमें एक मुद्दा- 'हेक्सागॉन ऑफ अलायंस' (षटकोण गठबंधन) का भी है। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी इसका जिक्र किया था और कहा था कि इस्राइल अपने सहयोगी देशों के साथ एक बड़ा नेटवर्क बनाना चाहता है, खासकर पश्चिम एशिया में या इसके आसपास। उन्होंने कहा कि इसका मकसद क्षेत्र में कट्टरपंथी दुश्मनों के खिलाफ साझा तौर पर खड़ा होना रहेगा। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह अलायंस क्या है? नेतन्याहू इसे लेकर क्या चाहते हैं? और इस गठबंधन का क्या मकसद हो सकता है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- क्या है हेक्सागॉन ऑफ अलायंस?

हेक्सागॉन ऑफ अलायंस इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की ओर से पेश किया गया रणनीतिक ढांचा है, जिसमें छह देशों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया है। द टाइम्स ऑफ इस्राइल की रिपोर्ट के मुताबिक, यह गठबंधन पश्चिम एशिया और उसके आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक, राजनयिक और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के इरादे से प्रस्तावित किया गया है।

ये भी पढ़ें: भारत-इस्राइल के रिश्तों का इतिहास: नेहरू ने किया जिस देश के बनने का विरोध, कैसे बना वो भारत का अभिन्न मित्र?

किस मकसद से बनाया जा रहा हेक्सागॉन ऑफ अलायंस?

इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के मुताबिक, हेक्सागॉन ऑफ अलायंस का मकसद ईरान के नेतृत्व वाली 'कट्टरपंथी शिया धुरी' और एक 'उभरती हुए कट्टरपंथी सुन्नी धुरी' जैसे विरोधियों का सामूहिक रूप से मुकाबला करना होगा। नेतन्याहू ने कहा कि यह गठबंधन उन देशों का एक समूह होगा, जो क्षेत्र में पैदा हो रही सच्चाई और चुनौतियों को आंख से आंख मिलाकर जवाब दे सकते हैं। 

कैसे काम करेगा यह गठबंधन?

यह गठबंधन मुख्य रूप से तीन आधार पर केंद्रित होगा आर्थिक सहयोग, राजनयिक तालमेल और सुरक्षा समन्वय। न्यूज एजेंसी  पीटीआई के मुताबिक, इसे भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) के दृष्टिकोण की तरह का ही देखा जा रहा है, जो कि कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है।

कट्टरंपथ की धुरियों से नेतन्याहू का किस ओर इशारा?

इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दो कट्टरपंथी धुरियों (radical axes) पर भी बात की। इनमें से एक को उन्होंने शिया धुरी और दूसरी उभरती सुन्नी धुरी बताते हुए इन्हें सुरक्षा के लिए खतरा करार दिया। कतर के न्यूज पोर्टल- अल-जजीरा ने इन दोनों धुरियों की जानकारी साझा की है। 

नेतन्याहू का मानना है कि हेक्सागॉन ऑफ अलायंस इन दोनों कट्टरपंथी धुरियों के खिलाफ एक रणनीतिक जवाबी क्षमता के रूप में काम करेगा, जिसमें भारत, ग्रीस, साइप्रस और अन्य अरब व अफ्रीकी राष्ट्र शामिल होकर क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करेंगे।

हेक्सागॉन ऑफ अलायंस में भारत की भूमिका पर क्या बोले नेतन्याहू?

इस्राइली प्रधानमंत्री की तरफ से इस पूरी घोषणा की खास बात यह रही कि हेक्सागॉन ऑफ अलायंस के साथ उन्होंने भारत के साथ रिश्तों का बार-बार जिक्र किया। इस दौरान नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ करीबी दोस्ती की बात कही और भारत को वैश्विक शक्ति बताते हुए गठबंधन को अहम कहा। नेतन्याहू ने कहा कि भारत-इस्राइल की जो मौजूदा धुरी है, वही कट्टरपंथी दुश्मनों से निपटने के लिए हेक्सागॉन ऑफ अलायंस का हिस्सा बनेगी। 

तो क्या इस गठबंधन का हिस्सा बन सकता है भारत?

माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्राइल दौरे पर बेंजामिन नेतन्याहू इस हेक्सागॉन ऑफ अलायंस के गठन को लेकर बात कर सकते हैं। हालांकि, इस गठबंधन से जुड़ी खबरें सामने आने के बाद से ही भारत ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। विश्लेषकों की मानें तो भारत इस प्रस्ताव को लेकर सावधानी से कदम उठाएगा। 

किंग्स कॉलेज लंदन में सुरक्षा अध्ययन के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रियास क्रिग का मानना है कि नेतन्याहू अपने इस विचार को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। क्रिग के मुताबिक, यह गठबंधन भारत को पश्चिम एशिया की उन दरारों में खींच सकता है, जिन्हें वह आमतौर पर वैचारिक के बजाय व्यावहारिक रूप से अपने साथ रखना पसंद करता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की रुचि रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापार में है, न कि इस्राइल की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं में शामिल होने में। 

प्रोफेसर क्रिग ने कहा कि इस्राइल के दो कट्टरपंथी धुरियों के खिलाफ गठबंधन बनाने से दोनों धुरी खतरे भांपकर साथ आ सकती हैं। यह शिया और सुन्नी धुरी आमतौर पर आपस में ही ताकत की जंग में शामिल रही है, लेकिन इस्राइल का कदम उन्हें एक कर सकता है।  

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इस्राइल से आने वाले विदेश मामलों के विशेषज्ञ ओरी गोल्डबर्ग ने इस पूरी पहल को नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति से जोड़ते हुए इसे एक फैंटेसी दुनिया करार दिया है। उनका तर्क है कि इस्राइल की वर्तमान आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब होती छवि के कारण कोई भी देश इस तरह के औपचारिक गठबंधन में शामिल होने से बचेगा।

कुछ अन्य विश्लेषकों के मुताबिक, भारत आमतौर पर दुनियाभर में अपने व्यावहारिक रिश्तों के लिए जाना जाता है। जहां ईरान के साथ भारत अपने सभ्यतागत और ऊर्जा संबंधों को अहमियत देता रहा है, वहीं चाबहार बंदरगाह के मुद्दे पर भी ईरान-भारत का सहयोग जारी रहा है। इसके अलावा भारत के बीते वर्षों में खाड़ी देशों से भी संबंध गहरे हुए हैं। सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन और अन्य देशों से समय-समय पर भारत की दोस्ती जाहिर हुई है।

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