संघर्षों में फंसा ईरान: कौन पकड़ेंगा ट्रंप की नाक? अमेरिका मध्य एशिया में अपने सपने पूरे करने की ताक में
वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो के बहाने ट्रंप को दुनियाभर के नेताओं पर दबाव बनाने का एक जरिया मिल गया है। ट्रंप का अगला रुख तय करेगा कि दुनिया बहुध्रुवीय बनेगी या अमेरिका की ‘मोनोपोली’ चलेगी।
विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से अगली सुबह कौन सी चौंकाने वाली खबर आएगी? यह किसी को नहीं पता। ईरान में हिंसक प्रदर्शन लगातार खतरनाक मोड़ पर पहुंच रहा है। उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने आईआरजीसी को आगे करके खुद को भूमिगत कर लिया है। खामेनेई के ‘क्लीन बोल्ड’ होते ही मध्य एशिया में अमेरिका का सपना साकार हो सकता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि फिर अमेरिका की नाक कौन पकड़ेगा?
अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर जिस तरह से मध्य एशिया में पैंतरेबाजी की है, उससे रूस और चीन के बहुध्रुवीय दुनिया के सपने को बड़ा झटका लगा है। सीरिया में बशर अल असद की सरकार के हाथ से सत्ता जाना इसमें बड़ा झटका था। अब अमेरिका के इस अभियान में ईरान एक बड़ा पड़ाव है। भारतीय विदेश मंत्रालय की भी इस घटनाक्रम पर बारीकी से नजर है।
एक पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि दुनिया में उथल-पुथल का दौर नई करवट ले रहा है। अभी अस्थिरता का जोखिम कम नहीं हुआ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ‘अनप्रिडेक्टेबल’ बने हुए हैं। वह घरेलू राजनीति में घिरते जा रहे हैं। इसके साथ-साथ वैश्विक राजनीति में तेजी से अस्थिरता बढ़ाने के लिए भी जिम्मेदार हैं। सूत्र का कहना है कि 2026 अमेरिका के राष्ट्रपति के लिए बहुत अहम है।
मादुरो की गिरफ्तारी से समझिए
अमेरिका के विशेष सैन्य दस्ते ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को गिरफ्तार कर लिया। पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि यह जिस तरीके से और जैसे हुआ है, अपने आप में एक रिकॉर्ड है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मादुरो के विरुद्ध कार्रवाई की अनुमति देकर तमाम वैश्विक नेताओं की सीधे नाक पकड़ ली। इसके बाद वेनेजुएला से जाने वाले एक के बाद एक तेल टैंकर को अमेरिकी नौसेना द्वारा अपनी गिरफ्त में लेना भी चीन, रूस, यूरोपीय देशों को बड़ा संदेश देने जैसा है। वह डेनमार्क को लेकर बयान दे रहे हैं। ‘ग्रीन लैंड’पर अमेरिका का सपना देखना किसी को पच नहीं रहा है। इस तरह के संकेत अस्थिरता पैदा करने वाले और अच्छे नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप के हर कदम पर चीन और रूस की प्रतिक्रिया बड़े सधे अंदाज में हो रही है।
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बहुध्रवीय विश्व क्या होगा?
यूरोप अमेरिका की हां में हां मिलाता था। नाटो संगठन अमेरिका की अगुआई में अपना दबदबा बनाता था। राष्ट्रपति ट्रंप अभी इस परंपरागत रणनीति से किनारा कस रहे हैं। वह अमेरिका के ऐसे राष्ट्रपति हैं, जो विस्तारवाद की नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में उन्होंने अपने देशवासियों को ‘ग्रेट अमेरिका’का सपना दिखाया था। तब अमेरिका के सामने आसन्न चुनौतियों को देखकर वैश्विक मामले के जानकारों को ट्रंप का यह लक्ष्य कम समझ में आया था। लेकिन टैरिफ वार के बाद जिस तरह से अमेरिका आगे बढ़ रहा है, वह सामरिक और कूटनीति के जानकारों को काफी हैरान कर रहा है।
दरअसल, भारत, रूस, चीन जैसे दुनिया के तमाम देश बहुध्रुवीय दुनिया के पक्षधर हैं। अमेरिका 90 के दशक के बाद से ‘मोनोपोली’के लिए जाना जाता है। उसकी इस मोनोपोली को सीरिया में रूस के बसर अल असद की सरकार के समर्थन में आक्रामक रुख ने चुनौती दे दी थी। इसके बाद चीन के साथ ‘ट्रेड वार’, दक्षिण चीन सागर में चीन का दावा, ईरान के साथ चीन और रूस के बढ़ते सहयोग ने अमेरिका के कान खड़े कर दिए। यूक्रेन के नाटो का सदस्य देश बनने की कोशिश और रूस के हमले में चीन के साथ उसके समीकरण, रूस-चीन-भारत की पहल से बने ‘ब्रिक्स संगठन’के प्रभावी होने की संभवना तथा अमेरिकी मुद्रा डॉलर को चुनौती ने अमेरिकी रणनीतिकारों को काफी चौकन्ना कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप सिके लिए अपने से पहले के राष्ट्रपति की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। ट्रंप अपनी नीतियों को इसका करेक्शन(सुधार) बताते हैं।
अब कौन पकड़ेगा ट्रंप की नाक?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी और ग्रीन लैंड का लक्ष्य बताकर रणनीतिक रूप से अपनी नाक काफी ऊंची कर ली है। ऐसे में एक जटिल सवाल खड़ा हो रहा है कि उनकी नाक अब कौन पकड़ेगा? ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को चीन और रूस से काफी उम्मीद है। रूस ने यूक्रेन पर हाल में अपनी हाइपरसोनिक मिसाइल से हमला किया है। यह हमला नहीं बल्कि संदेश है। इस तरह के संदेश 24 फरवरी 2022 को रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से ही दिए जा रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के सामने जितनी बड़ी चुनौती घरेलू समस्या और घरेलू राजनीति से निबटना है, उससे कहीं कम अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां नहीं है। चाहे वेने जुएला पर हमला हो, संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था को मजाक बनाना, विश्व स्वास्थ्य संगठन से कन्नी काटना, नाटो से दूरी बनाने जैसी पहल ने वैश्विक स्तर पर अमेरिका के कायम भरोसे को भी बड़ी चोट पहुंचाई है। अमेरिका में मंहगाई बेकाबू हो रही है और रोजगार के अवसर सिमटते जा रहे हैं। देखना है कि इन चुनौतियों से राष्ट्रपति कैसे पार पाते हैं। माना जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप के लिए 2026 सफलता अथवा विफलता के लिहाज से निर्णायक साबित हो सकता है।
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