Russia: पुतिन को लेकर यूरोप और अमेरिका में क्यों है इतनी घबराहट? भारत दौरे पर दुनिया की निगाहें
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन गुरुवार को भारत के दो दिवसीय दौरे पर आएंगे। इस दौरान शुक्रवार को राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की शिखर वार्ता होगी। पुतिन की इस यात्रा पर अमेरिका और यूरोपीय देशों की नजर है।
विस्तार
गुरुवार को शाम तक राष्ट्रपति पुतिन भारत आ जाएंगे। हैदराबाद हाऊस द्विपीय वार्ता की मेज सजा चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चार साल बाद भारत आ रहे पुतिन की मेजबानी में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। माना जा रहा है कि दोनों देशों की वार्षिक बैठक इस रिश्ते को एक नया आयाम दे देगी। हालांकि पुतिन को लेकर यूरोप और अमेरिका में अब घबराहट बढ़ती जा रही है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि भारत रूस से दोस्ती चाहता है। अमेरिका को छोड़ना नहीं चाहता। दोनों के साथ संतुलन बनाकर हमारे रणनीतिकार भविष्य देख रहे हैं। एक तरह से यह सही भी है।
क्यों घबरा रहे हैं यूरोप और अमेरिका?
फरवरी 2022 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन देखते रह गए और रूस की सेना यूक्रेन में प्रवेश कर गई। रूस के इस प्रयास के बाद आग बबूला ब्रिटेन अपने नए अंदाज में आ गया। फ्रांस और जर्मनी को पुतिन की यह कार्रवाई ठीक नहीं लगी। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि नाटो देशों ने जिस तरह की पिच तैयार करनी शुरू की और अमेरिका(सीआईए और उसकी एजेंसियां) जिस तरह से रूस के खिलाफ तैयारी कर रही था, उसे लग रहा था कि रूस के राष्ट्रपति शायद अपना जीवन पूरा न कर पाएंगे। जानलेवा हमले का शिकार हो जाएं। विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार भी इस तरह की आशंका से इनकार नहीं करते, विदेश मामले के जानकारों का कहना है कि राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने रूस को काफी हद तक संकट से ऊबार लिया है। राष्ट्रपति पुतिन लगातार संदेश दे रहे हैं कि वह रूस के हितों के विरुद्ध अमेरिका अथवा किसी यूरोपीय देश की कोई परवाह नहीं करते। इसके सामानांतर वह भारत को रूस का विश्वसनीय सहयोगी देश मानते हैं।
अमेरिकी प्रतिबंध पर है भारत की निगाह
भारत की स्थिति इस समय थोड़ी संवेदनशील है। पुतिन की यात्रा पर अमेरिका की निगाह का पहरा है। राष्ट्रपति पुतिन को अमेरिका के निगाह की परवाह कम है, लेकिन भारत को अमेरिका द्वारा आर्थिक प्रतिबंध थोपे जाने की आशंका डराती है। इसलिए पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि तकनीकी हस्तांतरण, -पीपुल-टू-पीपुल रिलेशन, नार्थ-साऊथ कारिडोर(ट्रांसपोर्टेशन लिंकेज) में रूस को स्पेस देने, रूस में भारतीयों के निवेश की संभावना पर सार्थक चर्चा और सहमति के आसार अधिक हैं। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में हम कुछ नया करने की सोच रहे हैं। अमेरिका भी चाहता है। इसमें कुछ निजी क्षेत्र को इंट्री देना चाहते हैं। रूस भी इसको लेकर उत्सुक है। रूस की संसद ने भारत और रूस के बीच में रक्षा सैन्य समझौते को अपनी मंजूरी दे दी है। इसके अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे के हवाई अड्डे, बंदरगांह आदि का इस्तेमाल कर सकेंगे। लेकिन देखना होगा कि इसमें वार्ता की मेज पर भारत का रुख क्या रहता है। कृषि और उर्रवरक को लेकर दोनों देशों में सहमति बनने के पूरे आसार हैं। ऊर्जा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति संभव है। कुलमिलाकर यह कि भारत रूस के साथ संबंध मजबूत करेगा लेकिन आर्थिक प्रतिबंध लगने की संभावना वाली पहल से बचने का प्रयास करेगा।
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अमेरिका क्यों भारत को बना रहा है ‘पंचिंग बैग’?
इस सवाल का उत्तर देते हुए शशांक कहते हैं कि इसके जिम्मेदार हम कुछ हैं। पिछले कुछ समय में भारत ने अमेरिका केंद्रित नीति अपनाई। हमने दूसरे देशों को पीछे छोड़ना और अमेरिका से रिश्ते की रफ्तार बढ़ाकर खुद को उसका छोटा भाई बना लिया। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अभी भी अमेरिका के साथ रिश्तों की पैरोकारी कर रहे है। जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि अमेरिका के बहुत करीब जाने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि वह अपने लाभांश से समझौता नहीं करते, ऐंठकर ले लेते हैं। अमेरिका आदेश देने का आदी है। उसके आदेश कभी रेशनल नहीं होते। अब हम उसके आदेश देने की धौंस से थोड़ा-थोड़ा बाहर निकलना चाहते हैं। शशांक कहते हैं कि पहले संतुलित होकर चले होते तो आज यह स्थिति नहीं आती। अमेरिकान पर अधिक निर्भरता बढ़ाने के मामले में किसी का भी अच्छा अनुभव नहीं रहा है।
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