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US ने एशिया से क्यों हटाया अपना आखिरी विमानवाहक पोत?: चीन उठा सकता है फायदा, विशेषज्ञों ने किया बड़ा दावा
Sat, 15 Aug 2026 07:43 PM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, वॉशिंगटन
पीटीआई, वॉशिंगटन
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 15 Aug 2026 07:43 PM IST
सार
ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान का असर अब प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक तैनाती पर भी दिखाई दे रहा है। यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन के क्षेत्र से हटने के बाद पश्चिमी प्रशांत में कुछ समय के लिए अमेरिकी विमानवाहक पोत की मौजूदगी कम हो सकती है। विश्लेषकों के मुताबिक, इससे चीन को क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
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प्रशांत क्षेत्र से हटेगा USS जॉर्ज वॉशिंगटन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ईरान के खिलाफ युद्ध अमेरिकी विमानवाहक पोतों की क्षमता पर दबाव बढ़ा रहा है। वहीं, चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के प्रमुख युद्धपोतों में से एक की मौजूदगी भी खत्म हो रही है।
यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन प्रशांत क्षेत्र से रवाना हो रहा है। इसके मध्य पूर्व में यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह लेने की उम्मीद है। लंबे समय से समुद्र में तैनात लिंकन पर मानसिक स्वास्थ्य और आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं। ईरान के खिलाफ अभियानों में सहयोग के लिए लिंकन की समुद्र में तैनाती को मई में वापस लौटने की मूल समयसीमा से आगे बढ़ाया गया है।
ईरान संघर्ष ने कैसे बनाया अमेरिका पर दबाव?
प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी विमानवाहक पोत की यह कमी कुछ समय के लिए ही रह सकती है। अगर नौसेना अगले कुछ महीनों में एक और विमानवाहक पोत तैनात करती है तो स्थिति बदल सकती है। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि इससे पता चलता है कि ईरान के साथ जारी अभियानों से अमेरिकी नौसैनिकों पर कितना दबाव पड़ रहा है। साथ ही ट्रंप प्रशासन एशिया-प्रशांत क्षेत्र से और पीछे हटकर पश्चिमी गोलार्ध पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
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सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के दक्षिण-पूर्व एशिया कार्यक्रम के निदेशक ग्रेग पोलिंग ने कहा, "प्रशासन कहता है कि पश्चिमी गोलार्ध के बाद प्रशांत क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।" उन्होंने कहा कि इसके बजाय अमेरिका मध्य पूर्व से पीछे हटने के अपने पहले के लक्ष्य के "बिल्कुल विपरीत" कर रहा है। पोलिंग ने कहा कि प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी रिपब्लिकन प्रशासन की अनिश्चितता को लेकर चिंतित हैं, जबकि बीजिंग "अमेरिका के ध्यान भटकने और उसके सहयोगियों तथा साझेदारों की निराशा से काफी खुश है।"
चीन उठा सकता है अमेरिकी विमानवाहक पोत की गैरमौजूदगी का फायदा
बीजिंग क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को चीन के बढ़ते प्रभाव के लिए खतरा और ताइवान पर कब्जे की उसकी महत्वाकांक्षा में बाधा मानता है। चीन स्वशासित ताइवान पर अपना दावा करता है। वहीं, अमेरिका का कहना है कि प्रशांत क्षेत्र आर्थिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि उसे खोया नहीं जा सकता।
हडसन इंस्टीट्यूट के रक्षा विश्लेषक और पूर्व नौसेना पनडुब्बी अधिकारी ब्रायन क्लार्क ने कहा कि किसी अमेरिकी विमानवाहक पोत के क्षेत्र छोड़ने के कारण किसी को चीन के ताइवान पर हमला करने की उम्मीद नहीं है। लेकिन इसकी गैरमौजूदगी चीन को अपनी ताकत दिखाने का एक और मौका देती है।
क्या पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका नहीं रहा सबसे बड़ी ताकत?
क्लार्क ने कहा, "वे इसका इस्तेमाल फिलीपींस, जापान, इंडोनेशिया और अन्य देशों को यह दिखाने की कोशिश के तौर पर कर रहे हैं कि पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अब सबसे बड़ी ताकत नहीं है। वे चाहेंगे कि क्षेत्र के देश यह मान लें कि चीन बड़ी ताकत है और अमेरिका अब उनकी सुरक्षा की गारंटी देने में सक्षम नहीं है।"
चीन ने इस सप्ताह इंडोनेशिया के साथ नौसैनिक अभ्यास किया है। हाल में उसने जापान और फिलीपींस के प्रति भी आक्रामक रुख के संकेत दिए हैं। दोनों ही अमेरिका के प्रमुख सहयोगी हैं और बीजिंग के साथ उनके क्षेत्रीय विवाद हैं। चीन ने इस महीने दक्षिण चीन सागर में स्कारबोरो शोल के पास सैन्य अभ्यास किया। इस क्षेत्र पर चीन और फिलीपींस दोनों अपना दावा करते हैं। पिछले महीने चीन के एक गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक ने जापान के सबसे दक्षिणी द्वीप ओकिनोटोरी के पास लाइव-फायर अभ्यास किया था।
विशेषज्ञों ने किया बड़ा दावा
अमेरिकी विशेष अभियान कमान के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली क्षेत्रीय सहयोगियों को वॉशिंगटन की प्रतिबद्धता को लेकर भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने गुरुवार को मनीला में फिलीपींस के अधिकारियों से मुलाकात की और कहा कि दोनों देशों के गठबंधन को मजबूत करने के लिए अमेरिकी विशेष अभियान बल संयुक्त अभ्यास बढ़ाने के लिए तैयार हैं। उनके जापान जाने की भी उम्मीद है।
चीन पर अमेरिकी नीति पर ध्यान देने वाले काटो इंस्टीट्यूट के नीति विश्लेषक इवान सैंकी ने कहा कि विमानवाहक पोत अमेरिका के सहयोगियों को मनोवैज्ञानिक भरोसा देते हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में इन पोतों की गैरमौजूदगी "इस सामान्य भावना को बढ़ाती है कि अमेरिका मध्य पूर्व की घटनाओं से विचलित है।"
क्यों बढ़ा अमेरिकी विमानवाहक पोतों पर दबाव?
हडसन इंस्टीट्यूट के क्लार्क ने कहा कि अमेरिकी विमानवाहक पोतों पर दबाव ईरान युद्ध के लिए पर्याप्त तैयारी और योजना की कमी के कारण है। उन्होंने कहा, "अगर हम इस तरह के संघर्ष के लिए जुटने वाले थे और हमें अंदाजा था कि यह इतना लंबा चल सकता है, तो हम विमानवाहक पोतों के कार्यक्रम में बदलाव कर सकते थे, ताकि अधिक पोत उपलब्ध रहते।"
क्लार्क के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पास 11 विमानवाहक पोत हैं और आमतौर पर एक समय में दो या तीन तैनात किए जाते हैं। हालांकि, यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट के सैन डिएगो से मध्य पूर्व के लिए रवाना होने पर जल्द ही चार पोत तैनात किए जा सकते हैं। इससे वॉशिंगटन के प्रशांत क्षेत्र में लौटने का रास्ता खुल सकता है।
हालांकि, इन विशाल युद्धपोतों को रखरखाव की जरूरत होगी। इससे देश के केवल दो विमानवाहक पोतों के रखरखाव वाले शिपयार्ड पर दबाव बढ़ सकता है। क्लार्क ने कहा, "अगले कुछ वर्षों में हमें रखरखाव का वह लंबित काम पूरा करना होगा। पिछले वर्षों की तुलना में हमारे पास विमानवाहक पोतों की मौजूदगी कम हो सकती है, क्योंकि पोत शिपयार्ड में जाने के लिए कतार में होंगे।"
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यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन प्रशांत क्षेत्र से रवाना हो रहा है। इसके मध्य पूर्व में यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह लेने की उम्मीद है। लंबे समय से समुद्र में तैनात लिंकन पर मानसिक स्वास्थ्य और आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं। ईरान के खिलाफ अभियानों में सहयोग के लिए लिंकन की समुद्र में तैनाती को मई में वापस लौटने की मूल समयसीमा से आगे बढ़ाया गया है।
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ईरान संघर्ष ने कैसे बनाया अमेरिका पर दबाव?
प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी विमानवाहक पोत की यह कमी कुछ समय के लिए ही रह सकती है। अगर नौसेना अगले कुछ महीनों में एक और विमानवाहक पोत तैनात करती है तो स्थिति बदल सकती है। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि इससे पता चलता है कि ईरान के साथ जारी अभियानों से अमेरिकी नौसैनिकों पर कितना दबाव पड़ रहा है। साथ ही ट्रंप प्रशासन एशिया-प्रशांत क्षेत्र से और पीछे हटकर पश्चिमी गोलार्ध पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
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सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के दक्षिण-पूर्व एशिया कार्यक्रम के निदेशक ग्रेग पोलिंग ने कहा, "प्रशासन कहता है कि पश्चिमी गोलार्ध के बाद प्रशांत क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।" उन्होंने कहा कि इसके बजाय अमेरिका मध्य पूर्व से पीछे हटने के अपने पहले के लक्ष्य के "बिल्कुल विपरीत" कर रहा है। पोलिंग ने कहा कि प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी रिपब्लिकन प्रशासन की अनिश्चितता को लेकर चिंतित हैं, जबकि बीजिंग "अमेरिका के ध्यान भटकने और उसके सहयोगियों तथा साझेदारों की निराशा से काफी खुश है।"
चीन उठा सकता है अमेरिकी विमानवाहक पोत की गैरमौजूदगी का फायदा
बीजिंग क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को चीन के बढ़ते प्रभाव के लिए खतरा और ताइवान पर कब्जे की उसकी महत्वाकांक्षा में बाधा मानता है। चीन स्वशासित ताइवान पर अपना दावा करता है। वहीं, अमेरिका का कहना है कि प्रशांत क्षेत्र आर्थिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि उसे खोया नहीं जा सकता।
हडसन इंस्टीट्यूट के रक्षा विश्लेषक और पूर्व नौसेना पनडुब्बी अधिकारी ब्रायन क्लार्क ने कहा कि किसी अमेरिकी विमानवाहक पोत के क्षेत्र छोड़ने के कारण किसी को चीन के ताइवान पर हमला करने की उम्मीद नहीं है। लेकिन इसकी गैरमौजूदगी चीन को अपनी ताकत दिखाने का एक और मौका देती है।
क्या पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका नहीं रहा सबसे बड़ी ताकत?
क्लार्क ने कहा, "वे इसका इस्तेमाल फिलीपींस, जापान, इंडोनेशिया और अन्य देशों को यह दिखाने की कोशिश के तौर पर कर रहे हैं कि पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अब सबसे बड़ी ताकत नहीं है। वे चाहेंगे कि क्षेत्र के देश यह मान लें कि चीन बड़ी ताकत है और अमेरिका अब उनकी सुरक्षा की गारंटी देने में सक्षम नहीं है।"
चीन ने इस सप्ताह इंडोनेशिया के साथ नौसैनिक अभ्यास किया है। हाल में उसने जापान और फिलीपींस के प्रति भी आक्रामक रुख के संकेत दिए हैं। दोनों ही अमेरिका के प्रमुख सहयोगी हैं और बीजिंग के साथ उनके क्षेत्रीय विवाद हैं। चीन ने इस महीने दक्षिण चीन सागर में स्कारबोरो शोल के पास सैन्य अभ्यास किया। इस क्षेत्र पर चीन और फिलीपींस दोनों अपना दावा करते हैं। पिछले महीने चीन के एक गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक ने जापान के सबसे दक्षिणी द्वीप ओकिनोटोरी के पास लाइव-फायर अभ्यास किया था।
विशेषज्ञों ने किया बड़ा दावा
अमेरिकी विशेष अभियान कमान के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली क्षेत्रीय सहयोगियों को वॉशिंगटन की प्रतिबद्धता को लेकर भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने गुरुवार को मनीला में फिलीपींस के अधिकारियों से मुलाकात की और कहा कि दोनों देशों के गठबंधन को मजबूत करने के लिए अमेरिकी विशेष अभियान बल संयुक्त अभ्यास बढ़ाने के लिए तैयार हैं। उनके जापान जाने की भी उम्मीद है।
चीन पर अमेरिकी नीति पर ध्यान देने वाले काटो इंस्टीट्यूट के नीति विश्लेषक इवान सैंकी ने कहा कि विमानवाहक पोत अमेरिका के सहयोगियों को मनोवैज्ञानिक भरोसा देते हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में इन पोतों की गैरमौजूदगी "इस सामान्य भावना को बढ़ाती है कि अमेरिका मध्य पूर्व की घटनाओं से विचलित है।"
क्यों बढ़ा अमेरिकी विमानवाहक पोतों पर दबाव?
हडसन इंस्टीट्यूट के क्लार्क ने कहा कि अमेरिकी विमानवाहक पोतों पर दबाव ईरान युद्ध के लिए पर्याप्त तैयारी और योजना की कमी के कारण है। उन्होंने कहा, "अगर हम इस तरह के संघर्ष के लिए जुटने वाले थे और हमें अंदाजा था कि यह इतना लंबा चल सकता है, तो हम विमानवाहक पोतों के कार्यक्रम में बदलाव कर सकते थे, ताकि अधिक पोत उपलब्ध रहते।"
क्लार्क के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पास 11 विमानवाहक पोत हैं और आमतौर पर एक समय में दो या तीन तैनात किए जाते हैं। हालांकि, यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट के सैन डिएगो से मध्य पूर्व के लिए रवाना होने पर जल्द ही चार पोत तैनात किए जा सकते हैं। इससे वॉशिंगटन के प्रशांत क्षेत्र में लौटने का रास्ता खुल सकता है।
हालांकि, इन विशाल युद्धपोतों को रखरखाव की जरूरत होगी। इससे देश के केवल दो विमानवाहक पोतों के रखरखाव वाले शिपयार्ड पर दबाव बढ़ सकता है। क्लार्क ने कहा, "अगले कुछ वर्षों में हमें रखरखाव का वह लंबित काम पूरा करना होगा। पिछले वर्षों की तुलना में हमारे पास विमानवाहक पोतों की मौजूदगी कम हो सकती है, क्योंकि पोत शिपयार्ड में जाने के लिए कतार में होंगे।"