Micro EV: 800 अरब डॉलर का बाजार और हिस्सेदारी सिर्फ 1.3%, क्यों फ्लॉप हो रही हैं छोटी इलेक्ट्रिक कारें?
Micro Electric Cars: भीड़भाड़ वाले शहरों के लिए बनी माइक्रो इलेक्ट्रिक कारें कागज पर भले ही एक बेहतरीन समाधान लगती हों लेकिन हकीकत में ग्राहक इन्हें अपनाने से हिचक रहे हैं। वैश्विक ईवी बाजार में इन छोटी कारों की हिस्सेदारी बेहद कम बनी हुई है, क्योंकि उपभोक्ता या तो सस्ते दोपहिया वाहन चुन रहे हैं या फिर ज्यादा जगह और आराम वाली एसयूवी की ओर झुक रहे हैं।
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भीड़भाड़ वाले शहरों के लिए कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रिक कारें (माइक्रो ईवी) बहुत काम की लगती हैं फिर भी लोग इन्हें ज्यादा पसंद नहीं कर रहे हैं। पिछले साल पूरी दुनिया में करीब 800 अरब डॉलर की इलेक्ट्रिक कारें बिकीं लेकिन उनमें इन नन्ही कारों का हिस्सा केवल 11 अरब डॉलर ही रहा। यानी, कुल मार्केट में इन छोटी कारों की हिस्सेदारी मात्र 1.37% है। आसान शब्दों में कहें तो इलेक्ट्रिक गाड़ियों के हर 100 रुपये के कारोबार में इन नन्ही कारों का हिस्सा डेढ़ रुपये से भी कम है।
इस साल भी माइक्रो ईवी के बिकने की उम्मीद कम
ये कारें लगभग 8 फीट लंबी होती हैं और 100 की रफ्तार तक दौड़ सकती हैं जिन्हें खास तौर पर शहर की भागदौड़ के लिए बनाया गया है। लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल भी इनकी बिक्री बढ़ने की उम्मीद नहीं है। साल 2024 में मार्केट में मौजूद 785 इलेक्ट्रिक मॉडल्स में से सिर्फ 78 ही ऐसी छोटी कारें थीं। इनकी कम बिक्री की सबसे बड़ी वजह यह है कि ये न तो पूरी तरह स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। जिन लोगों को पैसे बचाने होते हैं वे स्कूटर खरीद लेते हैं और जिन्हें आराम और लंबी दूरी तय करनी है वे बड़ी एसयूवी चुन लेते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि लोग ऐसी गाड़ी तो चाहते हैं जो स्कूटर से सुरक्षित हो और बड़ी कार से सस्ती लेकिन फिलहाल ये छोटी कारें इन दोनों के बीच में कहीं फंस कर रह गई हैं।
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चीन के लोगों की भी पहली पसंद बनती जा रही एसयूवी
छोटी कारों के मामले में चीन सबसे आगे रहा है। वहां की वुलिंग मिनी ईवी (Wuling Mini EV) इतनी हिट हुई थी कि पिछले साल अक्तूबर में इसने बिक्री के मामले में टेस्ला जैसी बड़ी कार को भी पीछे छोड़ दिया था। लेकिन इस कामयाबी की उड़ान ज्यादा समय के लिए नहीं रहेगी क्योंकि अब चीन के लोग भी अमीर हो रहे हैं और वे छोटी कार के बजाय बड़ी एसयूवी खरीदना पसंद कर रहे हैं। भारत का हाल भी कुछ ऐसा ही है। यहां एमजी कंपनी की छोटी कार 'कोमेट' के मुकाबले उनकी बड़ी और महंगी 'विंडसर एसयूवी' चार गुना ज्यादा बिक रही है। सीधा सा मतलब यह है कि ग्राहक अब छोटी गाड़ी के बजाय ऐसी गाड़ी चाहते हैं जिसमें ज्यादा जगह और अच्छे फीचर्स हों।
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कंपनियां टैक्सी के रूप में इस्तेमाल करना चाहती हैं माइक्रो ईवी
भले ही ये छोटी कारें कम बिक रही हैं लेकिन बड़ी कंपनियां अभी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
टेस्ला: एलन मस्क अपनी दो सीटों वाली 'साइबरकैब' लेकर आ रहे हैं। इसे वो आम लोगों को बेचने के बजाय बिना ड्राइवर वाली 'रोबोटैक्सी' (किराये पर चलने वाली टैक्सी) के रूप में चलाना चाहते हैं।
अन्य बड़ी कंपनियां: होंडा, टोयोटा और ह्यूंदै जैसी कंपनियां भी हार नहीं मान रही हैं और जल्द ही अपने नए छोटे मॉडल बाजार में लाने की तैयारी कर रही हैं।
आसान नियमों की वजह से माइक्रो ईवी बनाना सरल
बड़ी कंपनियों के लिए ये छोटी कारें बनाना काफी आसान है क्योंकि इनमें छोटी बैटरी लगती है और सरकार के नियम भी उतने कड़े नहीं होते। लेकिन जो छोटी कंपनियां (स्टार्टअप्स) सिर्फ यही कारें बना रही हैं, उनकी हालत खराब है। कई कंपनियां तो बंद भी हो चुकी हैं और जो बची हैं वे अब टिके रहने के लिए निवेशकों से मदद मांग रही हैं।