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Bihar News: नक्सलियों की बारूदी गंध की जगह अमरूदी सुगंध कहां फैली? बिहार में बदलाव की ग्राउंड रिपोर्ट

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरंगाबाद Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 19 Feb 2026 04:24 PM IST
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सार

Bihar News: औरंगाबाद जिले के देव प्रखंड में नक्सल उन्मूलन के बाद हालात पूरी तरह बदल गए हैं। कभी बम धमाकों और गोलियों की आवाज से दहला रहने वाला यह इलाका अब शांति और विकास की राह पर है। 

ground report of change in life of extreme naxal effected durgi aurangabad bihar
अमरूद की बागवानी
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विस्तार

एक समय जिस इलाके की फिजाओं में बारूद की गंध घुली रहती थी। रात ही नहीं, दिन के उजाले में भी बम धमाकों और गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी। सरकारी स्कूल भवनों को विस्फोट से उड़ा दिया जाता था, सड़कों को काट दिया जाता था और खुलेआम जन अदालतें लगती थीं। इलाके के लोग डरे-सहमे रहते थे। आम आदमी तो क्या, पुलिस भी यहां आने से परहेज करती थी। हालांकि अब समय बदल चुका है। इलाके में शांति और अमन-चैन कायम है। लोगों के मन से डर समाप्त हो गया है। बारूदी गंध की जगह अब खेतों और बागानों की खुशबू फैल रही है। यह बदलाव बिहार के अति नक्सल प्रभावित रहे औरंगाबाद जिले के सुदूरवर्ती देव प्रखंड में देखने को मिल रहा है, जहां नक्सल उन्मूलन के बाद हालात पूरी तरह बदल गए हैं।

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अमन-चैन का जायजा
अमन-चैन की स्थिति का आकलन करने के लिए अमर उजाला की टीम जिला मुख्यालय से करीब 40-45 किलोमीटर दूर उस इलाके में पहुंची, जहां पहाड़ के इस पार बिहार और उस पार झारखंड की सीमा लगती है। दुलारे पंचायत के दुर्गी और आसपास के गांवों में पहुंचने पर टीम ने पाया कि पहाड़ की तलहटी के मैदानी क्षेत्र की जो बंजर जमीन कभी नक्सली गतिविधियों का केंद्र थी, वहां अब खेती की हरियाली लहलहा रही है। स्थानीय लोगों ने बताया कि पहले नक्सली किसानों को अरहर की खेती करने के लिए मजबूर करते थे, ताकि लंबे पौधों की आड़ लेकर वे पुलिस से छिप सकें। दूसरी ओर, पुलिस नक्सल विरोधी अभियान के दौरान किसानों पर अरहर की खेती नहीं करने का दबाव बनाती थी। इस तरह किसान नक्सलियों और पुलिस के बीच पिसने को मजबूर थे।
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अब शांति और विकास का माहौल
टीम ने पाया कि अब इलाके में नक्सलियों का नामोनिशान तक नहीं है। सर्वत्र शांति और सुकून का माहौल है। लोग बेखौफ होकर अपने काम में जुटे हैं। नक्सलियों द्वारा उड़ाए गए स्कूल भवन दोबारा बना दिए गए हैं। काटी गई सड़कों की जगह अब पहाड़ों की तलहटी तक पक्की सड़कें बन चुकी हैं। आवागमन सुगम हो गया है। परंपरागत खेती के साथ अब किसान वैकल्पिक और उन्नत खेती की ओर भी अग्रसर हैं।

600 एकड़ में बारहमासी अमरूद की बागवानी
दुर्गी और आसपास के गांवों में लगभग 600 एकड़ बंजर जमीन पर बारहमासी अमरूद की बागवानी की जा रही है। बागों में पके अमरूद की तुड़ाई चल रही है। तुड़ाई के बाद फलों की पैकिंग कर उन्हें पटना, रांची, वाराणसी और कोलकाता के बाजारों में भेजा जा रहा है।

200 एकड़ से 60-70 लाख रुपये वार्षिक आमदनी
अमरूद की बागवानी कर रहे किसानों का कहना है कि 200 एकड़ क्षेत्र में अमरूद की खेती से उन्हें प्रतिवर्ष 60 से 70 लाख रुपये की आय हो रही है। इस आमदनी से वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में शिक्षा दिला रहे हैं। उनके जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार आया है और वे आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

कृषि मजदूरों को भी मिला रोजगार
पहले जहां स्थानीय कृषि मजदूर जंगलों से लकड़ी काटकर जीवन-यापन करते थे और वन विभाग की कार्रवाई का सामना करते थे, वहीं अब लगभग 500-600 मजदूर अमरूद के बागों में निराई-गुड़ाई, सिंचाई, देखभाल, तुड़ाई और पैकिंग का काम कर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। उन्हें स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार मिल रहा है।

पंचायत स्तर पर पहल और प्रशिक्षण
किसानों ने बताया कि नक्सल उन्मूलन के बाद जब उन्होंने पारंपरिक खेती से हटकर बागवानी की दिशा में कदम बढ़ाया, तो दुलारे पंचायत के मुखिया एवं पैक्स अध्यक्ष विजेंद्र यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयास से खेतों की मिट्टी की जांच कराई गई। विशेषज्ञों ने भूमि को अमरूद की खेती के लिए उपयुक्त बताया। इसके बाद कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से किसानों को प्रशिक्षण दिलाया गया। कृषि विभाग से अनुदान पर ड्रिप इरिगेशन सिस्टम भी उपलब्ध कराया गया, जिससे उत्पादन बेहतर हुआ और किसानों को अच्छा मुनाफा मिलने लगा।

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अन्य फसलों की ओर भी बढ़ते कदम
मुखिया विजेंद्र यादव ने बताया कि अमरूद के साथ-साथ अब पपीता, एप्पल बेरी (बेर) और टमाटर की खेती भी शुरू हो चुकी है। फिलहाल इन फसलों का रकबा कम है, लेकिन आने वाले समय में इसे बढ़ाने की योजना है। किसानों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ बाजार उपलब्ध कराने की भी पहल की जा रही है, ताकि उत्पादन बढ़ने पर विपणन में कोई परेशानी न हो। नक्सल प्रभावित रहे इस इलाके की यह बदली तस्वीर बताती है कि शांति, सरकारी सहयोग और स्थानीय पहल से विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है।

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