Bihar: जो कभी बरसाते थे मौत, वही आज दे रहे शांति का संदेश; बोधगया का बुद्ध स्तूप बना विश्व के लिए अनोखी मिसाल
बिहार के बोधगया स्थित जय श्री महाबोधि विहार (श्रीलंका बौद्ध मंदिर) में स्थापित बुद्ध शांति स्तूप दुनिया के सबसे अनूठे शांति प्रतीकों में से एक माना जाता है। इस स्तूप का निर्माण श्रीलंका के 1976 से 2009 तक चले गृहयुद्ध में इस्तेमाल किए गए कारतूसों के खोखों को पिघलाकर किया गया है।
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करीब तीन दशक तक श्रीलंका को खून-खराबे और हिंसा की आग में झोंकने वाले गृहयुद्ध में दागे गए कारतूस आज विश्वशांति, करुणा और अहिंसा का संदेश दे रहे हैं। युद्ध में इस्तेमाल किए गए कारतूसों के खोखों को पिघलाकर तैयार किया गया अनूठा बुद्ध शांति स्तूप बिहार के बोधगया स्थित जय श्री महाबोधि विहार (श्रीलंका बौद्ध मंदिर) में स्थापित है। यह स्तूप युद्ध की विभीषिका को शांति के प्रतीक में बदलने की अद्भुत मिसाल बन चुका है और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों और शोधार्थियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
युद्ध की राख से निकला शांति और करुणा का प्रतीक
विश्व धरोहर महाबोधि मंदिर की पावन धरती पर स्थित जय श्री महाबोधि विहार (श्रीलंका बौद्ध मंदिर) में रखा गया बुद्ध शांति स्तूप हर आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। पहली नजर में यह एक सामान्य बौद्ध स्तूप जैसा दिखाई देता है, लेकिन इसके निर्माण की कहानी इसे दुनिया के सबसे अनूठे शांति प्रतीकों में शामिल करती है। यह स्तूप श्रीलंका के गृहयुद्ध में इस्तेमाल किए गए कारतूसों के खोखों को पिघलाकर तैयार किया गया है। जो कारतूस कभी विनाश और मौत का प्रतीक थे, वही आज भगवान बुद्ध के अहिंसा, करुणा और विश्वशांति के संदेश को आगे बढ़ा रहे हैं।
37 वर्षों तक चला खूनी गृहयुद्ध
श्रीलंका में वर्ष 1976 से 2009 तक लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) और श्रीलंकाई सेना के बीच लंबा गृहयुद्ध चला। करीब 37 वर्षों तक चले इस संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई और लाखों कारतूसों का इस्तेमाल हुआ। युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीलंका सरकार ने एक अनूठी पहल करते हुए युद्ध में इस्तेमाल किए गए कारतूसों के खोखों को एकत्र कराया। इन्हें पिघलाकर बुद्ध स्तूप का निर्माण कराया गया, ताकि हिंसा के प्रतीक रहे कारतूस भविष्य में शांति, करुणा और सह-अस्तित्व का संदेश दे सकें।
बोधगया में बना श्रद्धा और आकर्षण का केंद्र
यह विशेष बुद्ध शांति स्तूप वर्तमान में बोधगया स्थित जय श्री महाबोधि विहार (श्रीलंका बौद्ध मंदिर) में सुरक्षित रखा गया है। हर वर्ष यहां आने वाले हजारों विदेशी पर्यटक, बौद्ध श्रद्धालु और शोधार्थी इस अनूठे स्तूप को देखने पहुंचते हैं। श्रद्धालु इसे केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं मानते, बल्कि युद्ध से शांति की ओर मानवता की यात्रा का जीवंत उदाहरण भी बताते हैं। भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली बोधगया में इसकी स्थापना इस संदेश को और अधिक प्रभावशाली बनाती है।
बौद्ध भिक्षु ने सुनाई स्तूप बनने की कहानी
श्रीलंका बौद्ध मंदिर के बौद्ध भिक्षु वांगेस ने बताया कि एलटीटीई के साथ लंबे समय तक चले संघर्ष के बाद श्रीलंका में शांति स्थापित हुई। इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में युद्ध में इस्तेमाल किए गए कारतूसों के खोखों को एकत्र किया गया। बाद में इन्हें गलाकर यह बुद्ध शांति स्तूप तैयार किया गया। उन्होंने बताया कि इस स्मारक का उद्देश्य युद्ध की भयावहता को याद रखते हुए आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देना है कि हिंसा कभी भी स्थायी समाधान नहीं हो सकती। शांति, करुणा और संवाद ही मानवता का भविष्य हैं।
बोधगया से पूरी दुनिया को मिल रहा अहिंसा का संदेश
बोधगया, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, आज वहीं यह अनूठा बुद्ध शांति स्तूप पूरी दुनिया को विश्वशांति और अहिंसा का संदेश दे रहा है। जो कारतूस कभी युद्ध और मौत का कारण बने थे, वही आज मानवता, करुणा और सह-अस्तित्व के प्रतीक बन चुके हैं। युद्ध के हथियारों को शांति के स्मारक में बदलने का यह अनोखा प्रयोग न केवल श्रीलंका के इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि पूरी दुनिया को यह सीख भी देता है कि विनाश के अवशेषों से भी शांति, सद्भाव और नई उम्मीद की इबारत लिखी जा सकती है।