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Bihar: संविधान के किस नियम पर डिप्टी सीएम विजय चौधरी ने जताई आपत्ति? उपराष्ट्रपति के सामने रख दी ये मांग
Sat, 11 Jul 2026 11:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गया
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Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 11 Jul 2026 11:45 AM IST
सार
गया के बिपार्ड में आयोजित प्रबोधन कार्यक्रम में बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने संविधान के अनुच्छेद 104 और 193 में निर्धारित 500 रुपये प्रतिदिन के आर्थिक दंड के प्रावधान की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर सवाल उठाया।
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गयाजी के बिपार्ड में कार्यक्रम को संबोधित करते उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
गयाजी में आयोजित प्रबोधन कार्यक्रम के दौरान बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने संविधान के अनुच्छेद 104 और 193 में निर्धारित 500 रुपये प्रतिदिन के आर्थिक दंड के प्रावधान की मौजूदा समय में प्रासंगिकता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ऐसे संवैधानिक प्रावधानों पर गंभीर विमर्श की जरूरत है, ताकि उनकी उपयोगिता और प्रभावशीलता का समयानुकूल आकलन किया जा सके।
बदलते समय के साथ प्रावधानों पर चर्चा जरूरी
विजय कुमार चौधरी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 104 और 193 के तहत यदि कोई व्यक्ति निर्धारित परिस्थितियों में सदन में बैठता है या मतदान करता है तो उसके लिए प्रतिदिन 500 रुपये के आर्थिक दंड का प्रावधान है। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्तमान समय में यह राशि कितनी प्रभावी और व्यावहारिक रह गई है। उनका कहना था कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और समय-समय पर उसके विभिन्न प्रावधानों पर गंभीर अध्ययन और वैचारिक चर्चा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है।
विधायकों से किया गहन अध्ययन का आह्वान
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें संविधान, सदन की कार्यप्रणाली और संसदीय परंपराओं का भी निरंतर अध्ययन करना चाहिए। इससे न केवल उनकी विधायी समझ मजबूत होगी बल्कि सदन में होने वाली बहसें भी अधिक तथ्यपरक, प्रभावी और सार्थक बनेंगी।
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बिहार विधानसभा की परंपरा का किया उल्लेख
विजय कुमार चौधरी ने कहा कि बिहार की विधायिका हमेशा संवैधानिक विषयों पर गंभीर और सकारात्मक विमर्श की पक्षधर रही है। यहां के जनप्रतिनिधियों ने अपने ज्ञान का दायरा सीमित नहीं रखा और समय-समय पर संवैधानिक एवं संसदीय विषयों पर अध्ययन की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाया है। इसी परंपरा को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
ये भी पढ़ें- राज्य में 20 IAS-BAS अफसरों का तबादला; सम्राट चौधरी सरकार ने किन्हें-कहां भेजा अब?
लोकतंत्र को मजबूत करने का संदेश
विजय कुमार चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि संविधान की गहरी समझ और संसदीय मूल्यों के पालन से सुनिश्चित होती है। उन्होंने विधायकों से आग्रह किया कि वे संवैधानिक विषयों पर लगातार अध्ययन करें, नए दृष्टिकोण विकसित करें और बदलते समय के अनुरूप लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं। उनके इस बयान को संवैधानिक प्रावधानों की वर्तमान प्रासंगिकता पर नए विमर्श की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
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बदलते समय के साथ प्रावधानों पर चर्चा जरूरी
विजय कुमार चौधरी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 104 और 193 के तहत यदि कोई व्यक्ति निर्धारित परिस्थितियों में सदन में बैठता है या मतदान करता है तो उसके लिए प्रतिदिन 500 रुपये के आर्थिक दंड का प्रावधान है। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्तमान समय में यह राशि कितनी प्रभावी और व्यावहारिक रह गई है। उनका कहना था कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और समय-समय पर उसके विभिन्न प्रावधानों पर गंभीर अध्ययन और वैचारिक चर्चा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है।
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विधायकों से किया गहन अध्ययन का आह्वान
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें संविधान, सदन की कार्यप्रणाली और संसदीय परंपराओं का भी निरंतर अध्ययन करना चाहिए। इससे न केवल उनकी विधायी समझ मजबूत होगी बल्कि सदन में होने वाली बहसें भी अधिक तथ्यपरक, प्रभावी और सार्थक बनेंगी।
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बिहार विधानसभा की परंपरा का किया उल्लेख
विजय कुमार चौधरी ने कहा कि बिहार की विधायिका हमेशा संवैधानिक विषयों पर गंभीर और सकारात्मक विमर्श की पक्षधर रही है। यहां के जनप्रतिनिधियों ने अपने ज्ञान का दायरा सीमित नहीं रखा और समय-समय पर संवैधानिक एवं संसदीय विषयों पर अध्ययन की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाया है। इसी परंपरा को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
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लोकतंत्र को मजबूत करने का संदेश
विजय कुमार चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि संविधान की गहरी समझ और संसदीय मूल्यों के पालन से सुनिश्चित होती है। उन्होंने विधायकों से आग्रह किया कि वे संवैधानिक विषयों पर लगातार अध्ययन करें, नए दृष्टिकोण विकसित करें और बदलते समय के अनुरूप लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं। उनके इस बयान को संवैधानिक प्रावधानों की वर्तमान प्रासंगिकता पर नए विमर्श की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।