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Bihar News : 29 साल पुराने रिश्वत कांड में दोषी करार, निगरानी कोर्ट ने तत्कालीन रेंजर को सुनाई सजा
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पटना
Published by: कृष्ण बल्लभ नारायण
Updated Fri, 30 Jan 2026 09:40 PM IST
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सार
Bihar : इंसान की जिंदगी में किया गया गुनाह तत्कालीन भले ही रुकता दिख जाए, लेकिन एक न एक दिन उसका भी हिसाब जरुर होता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। 29 साल पहले एक रेंजर 1,500 रुपये घूस लेते गिरफ्तार हुआ था, उसे आज सजा मिली है।
निगरानी पटना
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। पटना स्थित विशेष निगरानी अदालत ने वैशाली के तत्कालीन रेंजर सीता राम चौधरी को रिश्वतखोरी के मामले में दोषी करार देते हुए जेल भेज दिया है। वर्ष 2026 में भ्रष्टाचार के मामले में किसी लोक सेवक को सजा सुनाए जाने का यह राज्य का पहला मामला है।
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क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 1997 का है, जब सीता राम चौधरी वैशाली में रेंजर के पद पर तैनात थे। उन पर आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता मुन्ना बाबू के जलावन की लकड़ी से लदे एक ट्रक को जब्त किया था। जब्त ट्रक के ऑनर बुक और ड्राइवर के लाइसेंस को वापस करने के एवज में रेंजर ने रिश्वत की मांग की थी। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने जाल बिछाते हुए तत्कालीन रेंजर को 1,500 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। इस संबंध में निगरानी थाना कांड संख्या-42/97 (विशेष वाद सं-18/97) के टहटी मामला दर्ज किया गया था।
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कोर्ट का फैसला और जुर्माना
न्यायाधीश मो० रूस्तम की अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सीता राम चौधरी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया। अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए उन्हें एक वर्ष का सश्रम कारावास और दस हजार रुपए का आर्थिक दंड लगाया। साथ ही अर्थदंड की राशि जमा नहीं करने की स्थिति में दोषी को एक महीने की अतिरिक्त साधारण कैद काटनी होगी।
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प्रभावी पैरवी से मिली सफलता
इस मामले में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के तत्कालीन अनुसंधानकर्ता और पुलिस उपाधीक्षक विनोद कुमार चौधरी ने सटीक समय पर चार्जशीट दाखिल किया था। कोर्ट में बिहार सरकार की ओर से कनीय विशेष लोक अभियोजक आनन्दी सिंह ने प्रभावी ढंग से पक्ष रखा। उनकी दलीलों और ब्यूरो द्वारा पेश किए गए पुख्ता सबूतों के कारण आरोपी को सजा दिलाने में सफलता मिली। वर्ष 2026 में भ्रष्टाचार के किसी मामले में यह पहली सजा है।
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क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 1997 का है, जब सीता राम चौधरी वैशाली में रेंजर के पद पर तैनात थे। उन पर आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता मुन्ना बाबू के जलावन की लकड़ी से लदे एक ट्रक को जब्त किया था। जब्त ट्रक के ऑनर बुक और ड्राइवर के लाइसेंस को वापस करने के एवज में रेंजर ने रिश्वत की मांग की थी। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने जाल बिछाते हुए तत्कालीन रेंजर को 1,500 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। इस संबंध में निगरानी थाना कांड संख्या-42/97 (विशेष वाद सं-18/97) के टहटी मामला दर्ज किया गया था।
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कोर्ट का फैसला और जुर्माना
न्यायाधीश मो० रूस्तम की अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सीता राम चौधरी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया। अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए उन्हें एक वर्ष का सश्रम कारावास और दस हजार रुपए का आर्थिक दंड लगाया। साथ ही अर्थदंड की राशि जमा नहीं करने की स्थिति में दोषी को एक महीने की अतिरिक्त साधारण कैद काटनी होगी।
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प्रभावी पैरवी से मिली सफलता
इस मामले में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के तत्कालीन अनुसंधानकर्ता और पुलिस उपाधीक्षक विनोद कुमार चौधरी ने सटीक समय पर चार्जशीट दाखिल किया था। कोर्ट में बिहार सरकार की ओर से कनीय विशेष लोक अभियोजक आनन्दी सिंह ने प्रभावी ढंग से पक्ष रखा। उनकी दलीलों और ब्यूरो द्वारा पेश किए गए पुख्ता सबूतों के कारण आरोपी को सजा दिलाने में सफलता मिली। वर्ष 2026 में भ्रष्टाचार के किसी मामले में यह पहली सजा है।
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