Bihar: चुनाव में हार के नौ माह बाद कांग्रेस में मंथन के गर्भ से क्या निकला? क्या हो रही जांच, किसे पड़ी डांट?
Congress Party : इंदिरा भवन में जो सार्वजनिक रूप से हुआ, उसके बारे में सभी को पता है। लेकिन, कुछ बातें अलग से भी हुईं। यह बता रहा है कि कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त को भूली नहीं। नौ महीने के मंथन का परिणाम बाहर आएगा?
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बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में चुने गए 19 कांग्रेसी विधायकों में से दो ने 2024 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का दामन थाम लिया था। इसके बाद 2025 का बिहार चुनाव आने वाला था तो कांग्रेस के नंबर वन नेता राहुल गांधी जमीन से लेकर बाइक और यहां तक कि तालाब में भी उतर गए, लेकिन उनकी मेहनत को दरकिनार करते हुए राष्ट्रीय जनता दल ने महागठबंधन के सबसे बड़े राष्ट्रीय दल के लिए 243 में से महज 61 सीटें लड़ने के लिए छोड़ीं। इन 61 सीटों में से छह पर जीत मिली और पांच पर जमानत जब्त हो गई। बाकी पर भी बुरी हार ही हुई। बिहार चुनाव में मिली करारी हार के नौ महीने हो चुके हैं, लेकिन कांग्रेस स्थिर नहीं है। नौ महीने में उसके मंथन के गर्भ से क्या निकलेगा, यह कुछ समय बाद सामने आएगा। फिलहाल यह अहम खबर है कि कुछ दिनों पहले दिल्ली के इंदिरा भवन में कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बिहार प्रदेश कांग्रेस प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष को ठीकठाक सुनाई है। मजम्मत की है।
राहुल गांधी की मेहनत बर्बाद जाने पर कड़ी समीक्षा
पिछले साल राहुल गांधी ने बिहार में जितनी मेहनत की थी, उतनी उससे पहले कभी नहीं की थी। वह बिहार चुनाव को लेकर सबसे पहले सक्रिय हुए थे। फरवरी से ही चुनावी तैयारी शुरू कर दी थी। राहुल गांधी ने पिछले साल जब बिहार की जमीन पर पांव जमाने उतरे थे, तभी प्रदेश प्रभारी के रूप में दक्षिण से कृष्णा अल्लावरु को लाया था और फिर राज्य की कमान तत्कालीन विधायक राजेश राम को दी गई थी। तब कांग्रेस ने यह बदलाव इस नजरिए से किए थे कि उसके नैसर्गिक वोटर- यानी अगड़ा और अल्पसंख्यक उसके काम नहीं आ रहे हैं। इस बदलाव के साथ ही राहुल गांधी ने कन्हैया कुमार को भी बिहार में लगाया। कृष्णा अल्लावरु, राजेश राम और कन्हैया कुमार की तिकड़ी सक्रिय हुई, हालांकि बाद में कथित तौर पर राजद की आपत्ति पर कन्हैया कुमार किनारे कर दिए गए। राहुल गांधी खुद राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव के साथ बाइक से बिहार की सड़कों पर घूमते दिखे। अपनी बहन प्रियंका गांधी को भी लेकर आए। लेकिन, इतना कुछ होने के बावजूद परिणाम बेहद बुरा रहा। इसके बाद ही कांग्रेस ने कड़ी समीक्षा के संकेत दिए थे, हालांकि फलाफल नौ महीने बाद भी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
इंदिरा भवन में वेणुगोपाल ने क्या दिए संकेत?
क्या है प्रदेश प्रभारी और अध्यक्ष पर आरोप
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस पर जो भी आरोप लगे, कांग्रेसियों ने ही लगाए। पहला आरोप था कि प्रदेश प्रभारी के रूप में दक्षिण के जिस नेता को लाया गया, वह बिहार की राजनीति को इतनी जल्दी नहीं समझ सकते हैं। दूसरा आरोप यह था कि प्रदेश कांग्रेस की कमान किसी मजबूत नेता को नहीं दी गई। एक की समझ और दूसरे की मजबूती की परीक्षा का पहला समय तब आया, जब सीटों का बंटवारा होना था। राजद ने लोकसभा चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व को जैसे छकाया, ठीक उसी तरह विधानसभा चुनाव के समय भी हुआ।
सभी 243 सीटों के लिए प्रत्याशियों से ऑनलाइन आवेदन मंगा चुकी कांग्रेस को 100 सीटों पर कम-से-कम प्रत्याशी उतारना था। इसका दम भी भरा जा रहा था, लेकिन राजद ने छोड़ी ही 61 सीटें। वह भी अपनी मजबूती जांचने के बाद। जिस तरह पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह पर लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव के सामने घुटने टेकने का आरोप लगा था, उसी तरह कृष्णा अल्लावरु और राजेश राम पर तेजस्वी यादव के सामने घुटने टेकने का आरोप लगा। लेकिन, बात यहीं नहीं रुकी।
जैसे-जैसे 61 प्रत्याशियों की सूची जारी हुई, कांग्रेस के अंदर गतिरोध जमीन पर आ उतरा। अब तक करीबियों को टिकट देने का आरोप लगता था, इस बार कांग्रेस में भी टिकट बेचने का आरोप लगा। दिल्ली में कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद निर्दलीय सांसद बने राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव भी इस प्रकरण में कई तरह से सामने आए। और, जब चुनाव परिणाम महज छह सीटों पर जीत के रूप में सामने आया तो राजद की तरह कांग्रेस में भी कलह सड़क पर आ गया। सड़क से होते हुए आलाकमान तक बात पहुंचाई गई। यह बात भी कि जो अपनी सीट नहीं बचा सके, उन्हें टिकट बांटने की जिम्मेदारी दी गई थी।
अब आगे क्या हो सकता है?