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RJD Party : तेजस्वी यादव कार्यकारी अध्यक्ष क्यों बनाए गए? अब लालू यादव की पार्टी बची या नहीं, क्या बदला जानिए

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सार

Tejashwi Yadav : लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी यादव को राजद का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। क्या अब राजद को लालू यादव की पार्टी कहना उचित होगा? अब लालू के पास क्या बचा और परिवार के बाकी सदस्यों की ताकत कितनी बची? जानें, सबकुछ।

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लालू प्रसाद यादव के एक फैसले का परिवार और पार्टी पर पड़ेगा क्या-क्या असर, यह सवाल सभी के मन में। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार
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रोहिणी आचार्य ने पिता को सियासत का शिखर-पुरुष, उनकी पारी को गौरवशाली और ताजा निर्णय को उनकी गौरवशाली पारी का पटाक्षेप लिखा। इसके साथ ही भाई तेजस्वी यादव को शहजादा तो कहा, लेकिन कठपुतली भी। इसका मतलब समझना बहुत मुश्किल नहीं। राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में तेजस्वी यादव की ताजपोशी के समय बड़ी बहन मीसा भारती भले साथ-साथ थीं, लेकिन इस परिवार की सबसे चर्चित बेटी रोहिणी आचार्य ने अपनी बातों से बहुत कुछ समझा दिया। समझा दिया कि परिवार में तो सबकुछ ठीक नहीं है। तेजस्वी यादव की शक्ति बढ़ी थी तो तेज प्रताप यादव किनारे हो गए थे। रोहिणी उसके बाद किनारे हुईं। अब परिवार में अगला नंबर किसका, यह भविष्य बताएगा। फिलहाल, राष्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव कितना बचे, यह बड़ा सवाल है। समझते हैं हर स्थिति-परिस्थिति।

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राष्ट्रीय कार्यकारिणी सिर्फ इसके लिए ही
राजद में कोई सत्ता संघर्ष नहीं चल रहा था। चल रहा था लालू प्रसाद यादव के परिवार में। इसलिए, राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एक ही मुद्दा था। कुछ घंटे के लिए लालू प्रसाद यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी, बड़ी बेटी मीसा भारती और छोटे बेटे तेजस्वी यादव के साथ राष्ट्रीय कार्यकारणी में आए और यह फैसला सुनाने के कुछ ही देर बाद बैठक समाप्त हो गई। मतलब साफ है कि यह बैठक ही तेजस्वी यादव की ताजपोशी के लिए थी। तेजस्वी यादव सबसे छोटे होकर इस फैसले के साथ ही सबसे बड़े हो गए हैं। बतौर विधान परिषद् सदस्य राबड़ी देवी और बतौर पार्टी सांसद मीसा भारती इस बैठक में रहीं। 
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पहले भी कार्यकारी अध्यक्ष बना चुके लालू
जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल लालू प्रसाद यादव ने बनाया था। तब से राजद की पहचान लालू यादव की पार्टी के रूप में रही। जब चारा घोटाले में लालू प्रसाद जेल जा रहे थे तो उन्होंने पत्नी राबड़ी देवी को अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी और करीबी रंजन प्रसाद यादव को पार्टी की। रंजन यादव को इसी तरह कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था। उस समय चूंकि लालू प्रसाद जेल में थे तो कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में रंजन यादव बहुत शक्तिशाली थे। बात यहां तक आ गई थी कि राजद में परिवारवाद की पहली प्रतीक बनीं राबड़ी देवी को हटाकर नया मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी तक हो गई थी। रंजन यादव ने विधायक दल की बैठक बुलाई तो यह मान लिया गया कि वह सीएम की कुर्सी भी हासिल कर लेंगे। तत्काल लालू ने कार्यकारी अध्यक्ष की कुर्सी खत्म की और सारे अधिकार खुद में समाहित कर लिए। इस तरह से बिहार की राजनीति में अचानक रंजन यादव अर्श से फर्श पर धड़ाम हो गए। 

लालू की पार्टी बची या नहीं, यह जानना चाहिए
रंजन यादव प्रकरण की चर्चा यहां उदाहरण के लिए भी जरूरी है। लालू प्रसाद यादव ने उस समय जेल में रहते हुए भी राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते कार्यकारी अध्यक्ष को दिए सारे अधिकार एक झटके में वापस ले लिए थे।इस हिसाब से कहें तो राजद अब भी लालू की पार्टी है और तेजस्वी यादव को कार्य करने के लिए सारी शक्तियां दी गई हैं। कार्यकारी का यही मतलब होता भी है। लेकिन, चाणक्य इंस्टीट्यू ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- "इस राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के उद्देश्य को देखें तो यह मैसेज देना ही था कि अब राजद में तेजस्वी युग पूरी तरह आ गया है। लालू प्रसाद यादव ने पिछले साल राष्ट्रीय अध्यक्ष पुन: निर्वाचित होने के बाद ही तेजस्वी यादव को आम तौर पर सारे अधिकार सौंप दिए थे। पार्टी सिम्बल जैसे कुछ अंतिम शक्तियां बची थीं, वह भी एक तरह से आज तेजस्वी यादव को दे दी गई। आज अगर खुद की जगह लालू यादव ने तेजस्वी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया होता तो एक प्रतिशत भी संभावना वापसी की नहीं होती। फिलहाल वह संभावना बची है।"

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