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Bihar News: माता अंबिका भवानी मंदिर, जहां श्रद्धालु हाथ डालकर मन्नत मांगते हैं; गंगा खुद होती हैं विराजमान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा
Published by: Ashutosh Pratap Singh
Updated Fri, 27 Mar 2026 09:41 AM IST
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सार
सारण जिले के गंगा और सरयू नदी तट पर स्थित माता अंबिका भवानी मंदिर, जिसे आम बोलचाल में आमी वाली माई कहा जाता है, सतयुग से जुड़ा एक प्रमुख शक्तिपीठ है। मंदिर में माता की पूजा मिट्टी की पिंडी के रूप में होती है और मूर्ति नहीं है।
सारण का आमी वाली माई मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सारण जिले के गंगा और सरयू नदी तट पर स्थित माता अंबिका भवानी मंदिर, जिसे आम बोलचाल में आमी वाली माई कहा जाता है, केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं है, बल्कि पौराणिक इतिहास और अटूट श्रद्धा का संगम भी है। यह मंदिर सतयुग से जुड़ा माना जाता है और देशभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
मंदिर का पौराणिक इतिहास
पौराणिक कथाओं और सारण गजेटियर के अनुसार, यह वही यज्ञ स्थल है जहाँ राजा दक्ष प्रजापति ने यज्ञ आयोजित किया था। इसी यज्ञ में माता सती ने भगवान शिव के अपमान से क्रोधित होकर आत्मदाह कर दिया था। जब भगवान शिव ने सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव किया, तो सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से शरीर के टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने। आमी वाली माई की खासियत यह है कि यहां सती के शरीर की भस्मयुक्त अस्थियां यज्ञ कुंड में बची रही। यही कारण है कि इसे बेहद प्रभावशाली सिद्ध-पीठ माना जाता है।
भक्तों की श्रद्धा और नवरात्रि का माहौल
मंदिर में शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान सुबह से देर शाम तक भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। सालभर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर के पुजारी जितेंद्र तिवारी उर्फ दिगंबर बाबा के अनुसार, यह मंदिर ऐसा है जहाँ गंगा मईया स्वयं माता के पांव पखारने के लिए आती हैं। मंदिर में एक गोलाकार गड्ढा है, जिसमें गंगा का पानी हमेशा भरा रहता है। श्रद्धालु यहां हाथ डालकर मन्नत मांगते हैं और उनकी मन्नत पूरी होती है।
ये भी पढ़ें: फर्जी बीएड अंकपत्र पर बनी शिक्षिका, निगरानी जांच में खुला बड़ा खेल, अब दर्ज हुआ केस
अद्भुत यज्ञ कुंड और मन्नत की मान्यता
मंदिर का यज्ञ कुंड कभी खाली नहीं होता। श्रद्धालु हाथ डालकर मन्नत मांगते हैं और कुंड से मिले प्रसाद को एक वस्त्र में छिपाकर रखते हैं। मन्नत पूरी होने पर प्रसाद को वापस कुंड में रख दिया जाता है। आमी गांव में स्थित अंबिका भवानी मंदिर में माता की पूजा मिट्टी की पिंडी के रूप में होती है। यहां किसी प्रकार की मूर्ति नहीं है। यही कारण है कि आसपास के गांवों में भी मूर्ति पूजा नहीं की जाती। इस पिंडी को स्वयंभू माना जाता है और सदियों से बिना क्षरण के सुरक्षित है। मिट्टी की पिंडी का यह प्रकार देश में बहुत कम स्थानों पर देखने को मिलता है। कामाख्या मंदिर इसकी प्रमुख मिसाल है, जहाँ प्राकृतिक स्वरूप में देवी की पूजा की जाती है। आमी वाली माई का मंदिर श्रद्धालुओं के विश्वास और आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
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मंदिर का पौराणिक इतिहास
पौराणिक कथाओं और सारण गजेटियर के अनुसार, यह वही यज्ञ स्थल है जहाँ राजा दक्ष प्रजापति ने यज्ञ आयोजित किया था। इसी यज्ञ में माता सती ने भगवान शिव के अपमान से क्रोधित होकर आत्मदाह कर दिया था। जब भगवान शिव ने सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव किया, तो सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से शरीर के टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने। आमी वाली माई की खासियत यह है कि यहां सती के शरीर की भस्मयुक्त अस्थियां यज्ञ कुंड में बची रही। यही कारण है कि इसे बेहद प्रभावशाली सिद्ध-पीठ माना जाता है।
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भक्तों की श्रद्धा और नवरात्रि का माहौल
मंदिर में शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान सुबह से देर शाम तक भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। सालभर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर के पुजारी जितेंद्र तिवारी उर्फ दिगंबर बाबा के अनुसार, यह मंदिर ऐसा है जहाँ गंगा मईया स्वयं माता के पांव पखारने के लिए आती हैं। मंदिर में एक गोलाकार गड्ढा है, जिसमें गंगा का पानी हमेशा भरा रहता है। श्रद्धालु यहां हाथ डालकर मन्नत मांगते हैं और उनकी मन्नत पूरी होती है।
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अद्भुत यज्ञ कुंड और मन्नत की मान्यता
मंदिर का यज्ञ कुंड कभी खाली नहीं होता। श्रद्धालु हाथ डालकर मन्नत मांगते हैं और कुंड से मिले प्रसाद को एक वस्त्र में छिपाकर रखते हैं। मन्नत पूरी होने पर प्रसाद को वापस कुंड में रख दिया जाता है। आमी गांव में स्थित अंबिका भवानी मंदिर में माता की पूजा मिट्टी की पिंडी के रूप में होती है। यहां किसी प्रकार की मूर्ति नहीं है। यही कारण है कि आसपास के गांवों में भी मूर्ति पूजा नहीं की जाती। इस पिंडी को स्वयंभू माना जाता है और सदियों से बिना क्षरण के सुरक्षित है। मिट्टी की पिंडी का यह प्रकार देश में बहुत कम स्थानों पर देखने को मिलता है। कामाख्या मंदिर इसकी प्रमुख मिसाल है, जहाँ प्राकृतिक स्वरूप में देवी की पूजा की जाती है। आमी वाली माई का मंदिर श्रद्धालुओं के विश्वास और आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।