Bihar: विधानसभा में गूंजा जल निकासी की समस्या, स्थायी समाधान की मांग हुई तेज, खेसारी लाल ने उठाया था मुद्दा
छपरा नगर निगम क्षेत्र में हर साल होने वाली जलजमाव की समस्या एक बार फिर विधानसभा में उठी। भारतीय जनता पार्टी की विधायक छोटी कुमारी ने स्थायी ड्रेनेज व्यवस्था और नालों की सफाई की मांग की।
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छपरा नगर निगम क्षेत्र और आसपास के इलाकों में हर वर्ष होने वाली जलजमाव की समस्या एक बार फिर विधानसभा में उठी है। बरसात के मौसम में शहर के कई प्रमुख और घनी आबादी वाले मोहल्ले जलमग्न हो जाते हैं, जिससे जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। वर्षों से यह समस्या चुनावी वादों और प्रशासनिक दावों का हिस्सा रही है, लेकिन अब तक इसका स्थायी समाधान नहीं निकल सका है।
शहर के बिनटोलिया रोड, प्रभूनाथ नगर, शांति नगर, टाड़ी, दरियाव टोला, उमा नगर और शक्ति नगर जैसे इलाकों में हर साल बारिश के दौरान सड़कों पर घुटनों तक पानी भर जाता है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने और नालों की नियमित सफाई के अभाव में हालात और गंभीर हो जाते हैं। कई स्थानों पर स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि लोगों का घरों से निकलना तक मुश्किल हो जाता है। बुजुर्गों, मरीजों और स्कूली बच्चों को भारी परेशानी झेलनी पड़ती है, जबकि आपात स्थिति में एंबुलेंस तक प्रभावित क्षेत्रों में नहीं पहुंच पाती।
विधानसभा चुनाव के दौरान इस मुद्दे को विभिन्न प्रत्याशियों ने प्रमुखता से उठाया था। अब भाजपा की छपरा सदर विधायक छोटी कुमारी ने सदन के शून्यकाल में यह मामला उठाते हुए कहा कि अपेक्षाकृत विकसित माने जाने वाले इलाकों में भी जलजमाव की स्थिति चिंताजनक है। बरसात के समय सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं और कुछ स्थानों पर लोगों को नाव का सहारा लेना पड़ता है।
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विधायक ने विशेष रूप से सदर प्रखंड के करीना सदा क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां हर वर्ष ऐसी स्थिति बनती है, जिससे स्थानीय लोगों का जनजीवन ठप हो जाता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि बारिश से पहले नालों की व्यापक स्तर पर सफाई कराई जाए, पंपिंग स्टेशन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और एक प्रभावी व दीर्घकालिक ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया जाए।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि हर साल जल निकासी को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सुधार नजर नहीं आता। चुनाव के दौरान सभी राजनीतिक दल समस्या के समाधान का आश्वासन देते हैं, परंतु चुनाव के बाद स्थिति जस की तस बनी रहती है। अब देखना यह है कि सदन में उठी यह आवाज प्रशासन को सक्रिय करती है या फिर यह गंभीर समस्या एक बार फिर फाइलों में सिमटकर रह जाती है।