Gig Workers: 10 मिनट डिलीवरी का दावा खत्म, लेकिन दबाव अभी भी बरकरार; गिग वर्कर्स बोले- जमीनी हकीकत नहीं बदली
क्विक कॉमर्स कंपनियों द्वारा 10 मिनट डिलीवरी का दावा हटाने के बावजूद गिग वर्कर्स कहते हैं कि जमीनी हालात नहीं बदले। कम भुगतान और इंसेंटिव दबाव अब भी बरकरार है।
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क्विक कॉमर्स कंपनियों द्वारा ग्राहकों के लिए 10 मिनट में डिलीवरी के वादे को हटाने की कथित घोषणा का असर गिग वर्कर्स की जिंदगी पर फिलहाल बहुत कम दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय राजधानी में काम कर रहे डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि कमाई अब भी ज्यादा डिलीवरी करने पर ही निर्भर है, इसलिए तेज काम करने का दबाव जस का तस बना हुआ है। बीते साल क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर गिग वर्कर्स ने हड़ताल कर यह मुद्दा उठाया था कि उनसे असुरक्षित तरीके से काम कराया जा रहा है, जबकि दुर्घटना की स्थिति में न तो पुख्ता सुरक्षा है और न ही स्थायी आय की गारंटी।
न्यूनतम वेतन तय नहीं, इंसेंटिव पर निर्भर
डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि न्यूनतम वेतन तय नहीं है और प्रति डिलीवरी भुगतान बेहद कम है। ऐसे में उन्हें प्लेटफॉर्म द्वारा दिए जाने वाले इंसेंटिव पर निर्भर रहना पड़ता है, जो न तो स्थायी होते हैं और न ही पारदर्शी। कई एजेंट्स ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर अपनी बात रखी।
इंसेंटिव सिस्टम ही तेज डिलीवरी के लिए करता है मजबूर
एक डिलीवरी पार्टनर ने बताया कि रोज 35 से 40 डिलीवरी करने के बाद ही ₹1,200-1,500 की कमाई हो पाती है। उन्होंने कहा करीब 15 घंटे काम करने के बाद ₹1,500–1,600 मिलते हैं। ज्यादा डिलीवरी और इंसेंटिव के चक्कर में हमें गलत साइड से गाड़ी चलानी पड़ती है, जान जोखिम में डालनी पड़ती है। हालांकि कंपनियां यह कहती हैं कि किसी तय समय सीमा में डिलीवरी की बाध्यता नहीं है, लेकिन गिग वर्कर्स का कहना है कि इंसेंटिव सिस्टम ही उन्हें तेज डिलीवरी के लिए मजबूर करता है।
एक 25 वर्षीय एजेंट के मुताबिक हमारी रेटिंग और इंसेंटिव इस बात से जुड़े हैं कि हमने कितनी जल्दी और कितनी ज्यादा डिलीवरी की। एक अन्य डिलीवरी पार्टनर ने बताया कि ₹440 का इंसेंटिव पाने के लिए उसे ₹875 की डिलीवरी करनी पड़ती है, जिसके लिए लगभग 40 ऑर्डर पूरे करने होते हैं। दिन और समय के अनुसार प्रति डिलीवरी भुगतान ₹15 से ₹25 तक रहता है।
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मांग, मौसम और त्योहारों पर निर्भर करता है इंसेंटिव
गिग वर्कर्स ने यह भी बताया कि इंसेंटिव स्ट्रक्चर दिन में दो से तीन बार बदल जाता है, जो मांग, मौसम और त्योहारों पर निर्भर करता है। एक डिलीवरी एजेंट ने कहा अगर मैंने तीन घंटे लॉगिन किया और उस दिन ऑर्डर कम आए, तो मुझे कोई इंसेंटिव नहीं मिलता। कोई तय वेतन नहीं है। कुछ इंसेंटिव काम के घंटों से भी जुड़े होते हैं। एक अन्य डिलीवरी पार्टनर ने बताया कि उसे करीब 15 घंटे काम करने पर ही अतिरिक्त भुगतान मिलता है।
अभी तक कोई औपचारिक जानकारी नहीं मिली
- डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि उन्हें 10 मिनट डिलीवरी ब्रांडिंग हटाने को लेकर कोई औपचारिक जानकारी नहीं दी गई है।
- एक एजेंट ने कहा अगर ऐसा होता भी है, तो हमारे लिए बहुत कम बदलेगा।
- अच्छा है कि हमारी आवाज सुनी जा रही है, लेकिन यह काफी नहीं है।
- एक अन्य डिलीवरी पार्टनर ने कहा कि संघर्ष अभी शुरू हुआ है। सरकार सुन रही है, यह अच्छी बात है। लेकिन जब तक सुरक्षित और तय भुगतान व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक हमारी लड़ाई खत्म नहीं होगी।
- अमेजन इंडिया वर्कर्स यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार ने इस कदम का स्वागत किया, लेकिन कहा कि इससे बिजनेस मॉडल नहीं बदलता। उन्होंने कहा अब भी न तो न्यूनतम वेतन है, न बीमा और न ही सुरक्षा। ऊंची रेटिंग और इंसेंटिव के लालच में वर्कर्स 10–12 घंटे काम करने को मजबूर हैं।
क्विक कॉमर्स पर सरकार की सख्ती
सोमवार (13 जनवरी) को केंद्र सरकार ने '10 मिनट की डिलीवरी' की अनिवार्य समय सीमा को समाप्त करने का निर्देश दिया है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया के हस्तक्षेप के बाद, ब्लिंकिट, जेप्टो, जोमैटो और स्विगी जैसे प्रमुख एग्रीगेटर्स ने इस दबावपूर्ण डेडलाइन को हटाने पर सहमति व्यक्त की है। यह कदम सीधे तौर पर लाखों 'गिग वर्कर्स' की सुरक्षा और उनके कामकाजी हालातों को बेहतर बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।