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Highcourt: राज्य का कोई अंग खुद को सर्वोच्च नहीं मान सकता, 25 साल पहले हादसे में बच्चे की माैत पर दें मुआवजा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Wed, 25 Mar 2026 10:57 AM IST
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सार
मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने सेना के चालक के कथित कृत्य को ‘सॉवरेन फंक्शन’ मानते हुए मुआवजा याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को कानूनी रूप से अस्थिर बताया और कहा कि सड़क पर लापरवाही से वाहन चलाना किसी भी तरह से संप्रभु कार्य नहीं माना जा सकता।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तीन वर्षीय बच्चे की सेना के वाहन से हुई मौत के 25 साल पुराने मामले को पुनर्जीवित करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य के नाम पर नागरिकों के अधिकारों की बलि नहीं दी जा सकती। संविधान में सर्वोच्च सत्ता हम भारत के लोगों की है।
जस्टिस विरेंद्र अग्रवाल ने कहा कि वर्तमान संवैधानिक ढांचे में राज्य का कोई भी अंग स्वयं को सर्वोच्च नहीं मान सकता। संविधान की प्रस्तावना इसकी आत्मा है, जो स्पष्ट करती है कि संप्रभुता जनता में निहित है और राज्य का अस्तित्व नागरिकों के कल्याण के लिए है। ऐसे में नागरिकों के अधिकार, स्वतंत्रता और हित सर्वोपरि हैं और इन्हें दबाया नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की लापरवाही से किसी नागरिक की जान जाती है तो राज्य अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। अदालत ने कहा कि पारंपरिक सिद्धांत, जिसके तहत राज्य के कार्यों को न्यायिक समीक्षा से परे माना जाता था, अब भारत में लागू नहीं हो सकता, खासकर जब मामला लापरवाही या टॉर्ट (नागरिक हानि) से जुड़ा हो।
मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने सेना के चालक के कथित कृत्य को ‘सॉवरेन फंक्शन’ मानते हुए मुआवजा याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को कानूनी रूप से अस्थिर बताया और कहा कि सड़क पर लापरवाही से वाहन चलाना किसी भी तरह से संप्रभु कार्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने मामले को दोबारा ट्रिब्यूनल के पास भेजते हुए निर्देश दिया कि चालक की लापरवाही के मुद्दे पर नए सिरे से फैसला किया जाए और दो माह के भीतर मुआवजे की राशि तय की जाए। साथ ही कहा कि यदि लापरवाही साबित होती है तो केंद्र सरकार, वाहन के मालिक और चालक के नियोक्ता के रूप में मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी होगी।
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जस्टिस विरेंद्र अग्रवाल ने कहा कि वर्तमान संवैधानिक ढांचे में राज्य का कोई भी अंग स्वयं को सर्वोच्च नहीं मान सकता। संविधान की प्रस्तावना इसकी आत्मा है, जो स्पष्ट करती है कि संप्रभुता जनता में निहित है और राज्य का अस्तित्व नागरिकों के कल्याण के लिए है। ऐसे में नागरिकों के अधिकार, स्वतंत्रता और हित सर्वोपरि हैं और इन्हें दबाया नहीं जा सकता।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की लापरवाही से किसी नागरिक की जान जाती है तो राज्य अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। अदालत ने कहा कि पारंपरिक सिद्धांत, जिसके तहत राज्य के कार्यों को न्यायिक समीक्षा से परे माना जाता था, अब भारत में लागू नहीं हो सकता, खासकर जब मामला लापरवाही या टॉर्ट (नागरिक हानि) से जुड़ा हो।
मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने सेना के चालक के कथित कृत्य को ‘सॉवरेन फंक्शन’ मानते हुए मुआवजा याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को कानूनी रूप से अस्थिर बताया और कहा कि सड़क पर लापरवाही से वाहन चलाना किसी भी तरह से संप्रभु कार्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने मामले को दोबारा ट्रिब्यूनल के पास भेजते हुए निर्देश दिया कि चालक की लापरवाही के मुद्दे पर नए सिरे से फैसला किया जाए और दो माह के भीतर मुआवजे की राशि तय की जाए। साथ ही कहा कि यदि लापरवाही साबित होती है तो केंद्र सरकार, वाहन के मालिक और चालक के नियोक्ता के रूप में मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी होगी।