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पंजाब यूनिवर्सिटी की पहली महिला छात्र संघ अध्यक्ष को पीएम मोदी नहीं हैं पसंद, बताई ये बड़ी वजह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 08 Sep 2018 06:15 PM IST
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पंजाब यूनिवर्सिटी की पहली महिला प्रेसिडेंट चुनी गईं कनुप्रिया जीत के बाद शुक्रवार को ‘अमर उजाला संवाद’ कार्यक्रम में पहुंचीं। इस दौरान उन्होंने चुनाव लड़ने की तैयारी, पीयू पॉलिटिक्स, एसएफएस, देश के बदले हालात और पीयू प्रशासन व काउंसिल के बीच तालमेल बैठाने संबंधी कई सवालों के जवाब पूरी बेबाकी से दिए। उनके हर जवाब में सादगी, परिपक्वता और एक अलग तरह का तेवर नजर आया।
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चुनाव लड़ने का मन कब बना?
चुनाव तो एसएफएस को लड़ना था। हमारा हर फैसला छात्रों के डिस्कशन पर ही केंद्रित था। कैंडिडेट डिसाइड करने के लिए एक मीटिंग हुई। उसमें सभी ने अपनी बात रखी। सबकुछ डिस्कशन से तय हुआ। चुनाव से पहले हमने हर क्लासरूम को कवर किया। वहां जाकर हर छात्र से उनकी राय पूछी। आखिर वो कैसा नुमाइंदा चाहते हैं। उसी आधार पर कैंडिडेट चुना गया। खास बात है कि सबकुछ अचानक तय हुआ।
फैमिली का क्या रिएक्शन था?
बहुत ही पॉजिटिव। जब मम्मी-पापा को बताया तो उन्होंने कहा लड़ोगे, मगर उसके लिए बहुत स्टेमिना चाहिए होगा। बस फिर क्या था, मम्मी-पापा की हां चाहिए थी। स्टेमिना तो अपने आप आ जाता है। यदि घर वालों की सहमति नहीं मिलती, फिर भी चुनाव लड़ना था क्योंकि सर्टिफिकेट आ चुके थे। पूरी तैयारी थी। फैमिली तैयार नहीं होती तो एक मायूसी सी बनी रहती, मगर मेरी फैमिली ने पूरा सपोर्ट दिया। इस बात की ज्यादा खुशी है।
आपके चुनाव में डफली का क्या रोल रहा?
सबसे ज्यादा लोगों को हमारी डफली ही चुभी है। डफली ही सवाल पूछ रही थी। हर प्रोटेस्ट में उसने सवाल पूछा है। असली जीत डफली की हुई है। (एसएफएस ने अपने चुनाव प्रचार में डफली का विशेष तौर पर इस्तेमाल किया। जो पूरे चुनाव में चर्चा का केंद्र रही।)
चुनाव तो एसएफएस को लड़ना था। हमारा हर फैसला छात्रों के डिस्कशन पर ही केंद्रित था। कैंडिडेट डिसाइड करने के लिए एक मीटिंग हुई। उसमें सभी ने अपनी बात रखी। सबकुछ डिस्कशन से तय हुआ। चुनाव से पहले हमने हर क्लासरूम को कवर किया। वहां जाकर हर छात्र से उनकी राय पूछी। आखिर वो कैसा नुमाइंदा चाहते हैं। उसी आधार पर कैंडिडेट चुना गया। खास बात है कि सबकुछ अचानक तय हुआ।
फैमिली का क्या रिएक्शन था?
बहुत ही पॉजिटिव। जब मम्मी-पापा को बताया तो उन्होंने कहा लड़ोगे, मगर उसके लिए बहुत स्टेमिना चाहिए होगा। बस फिर क्या था, मम्मी-पापा की हां चाहिए थी। स्टेमिना तो अपने आप आ जाता है। यदि घर वालों की सहमति नहीं मिलती, फिर भी चुनाव लड़ना था क्योंकि सर्टिफिकेट आ चुके थे। पूरी तैयारी थी। फैमिली तैयार नहीं होती तो एक मायूसी सी बनी रहती, मगर मेरी फैमिली ने पूरा सपोर्ट दिया। इस बात की ज्यादा खुशी है।
आपके चुनाव में डफली का क्या रोल रहा?
सबसे ज्यादा लोगों को हमारी डफली ही चुभी है। डफली ही सवाल पूछ रही थी। हर प्रोटेस्ट में उसने सवाल पूछा है। असली जीत डफली की हुई है। (एसएफएस ने अपने चुनाव प्रचार में डफली का विशेष तौर पर इस्तेमाल किया। जो पूरे चुनाव में चर्चा का केंद्र रही।)
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प्रेसिडेंटशिप और पढ़ाई के बीच तालमेल कैसे बैठाएंगी?
जब बीएससी की पढ़ाई शुरू की थी, तभी से एसएफएस से जुड़ी हुई हूं। संगठन से जुड़ने के बाद से एग्जाम, सेमेस्टर, टेस्ट और लैब सबकुछ मैनेज किया है। संगठन की वजह से व्यवस्थित हो गई हूं इसलिए आसानी से मैनेज कर लूंगी। और संगठन में आप अकेले नहीं हैं। बहुत लोग हैं। मुझे अपने सब्जेक्ट से भी बहुत लगाव है। दोनों के बीच अच्छी तरह से तालमेल बैठाऊंगी।
स्टूडेंट काउंसिल में अलग-अलग विचारधारा के लोग हैं, एक साथ कैसे लेकर चलेंगी?
एक चीज तो तय है कि इस बार जो भी मेंबर चुनकर आए हैं, वे सभी पॉजिटिव सोच के साथ आए हैं। सभी एक चेंज लाना चाहते हैं। छात्रों की एक्टिव भागीदारी चाहते हैं और यही एसएफएस का मुद्दा भी है। एसएफएस छात्रों को साथ में लेकर सभी पदाधिकारियों के साथ सामंजस्य बैठाएगी। अब यहां घेराबंदी वाली पॉलिटिक्स नहीं चलेगी। बीजेपी-कांग्रेस वालों के संगठन ही एकजुट नहीं हैं तो वे छात्रों को एकजुट कैसे करेंगे। ओपिनियन अलग-अलग हो सकती हैं, मगर हम बिना एकजुटता के कोई काम नहीं कर सकते।
जब बीएससी की पढ़ाई शुरू की थी, तभी से एसएफएस से जुड़ी हुई हूं। संगठन से जुड़ने के बाद से एग्जाम, सेमेस्टर, टेस्ट और लैब सबकुछ मैनेज किया है। संगठन की वजह से व्यवस्थित हो गई हूं इसलिए आसानी से मैनेज कर लूंगी। और संगठन में आप अकेले नहीं हैं। बहुत लोग हैं। मुझे अपने सब्जेक्ट से भी बहुत लगाव है। दोनों के बीच अच्छी तरह से तालमेल बैठाऊंगी।
स्टूडेंट काउंसिल में अलग-अलग विचारधारा के लोग हैं, एक साथ कैसे लेकर चलेंगी?
एक चीज तो तय है कि इस बार जो भी मेंबर चुनकर आए हैं, वे सभी पॉजिटिव सोच के साथ आए हैं। सभी एक चेंज लाना चाहते हैं। छात्रों की एक्टिव भागीदारी चाहते हैं और यही एसएफएस का मुद्दा भी है। एसएफएस छात्रों को साथ में लेकर सभी पदाधिकारियों के साथ सामंजस्य बैठाएगी। अब यहां घेराबंदी वाली पॉलिटिक्स नहीं चलेगी। बीजेपी-कांग्रेस वालों के संगठन ही एकजुट नहीं हैं तो वे छात्रों को एकजुट कैसे करेंगे। ओपिनियन अलग-अलग हो सकती हैं, मगर हम बिना एकजुटता के कोई काम नहीं कर सकते।
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अब पीयू में किस तरह की राजनीति देखने को मिलेगी?
पीयू में अब मुद्दों की राजनीति ही होगी। इसके अलावा देशव्यापी मुद्दों पर भी यूनिवर्सिटी में बहस होगी। पहले बोल दिया जाता था कि इस तरह की बातें यहां क्यों कर रहे। जब तक मुद्दों पर हेल्दी बहस नहीं होगी, तब तक न तो यूनिवर्सिटी का विकास होगा और न ही देश का।
जेएनयू हो या बीएचयू, हर जगह छात्रों की आवाज दबाई गई, अब विरोध को दबा दिया जाता, इसे कैसे देखती हैं?
इस सरकार में तो कुछ ज्यादा होने लगा है। अब देश को बांटने की राजनीति हो रही है मगर मैं एक बात कहना चाहती हूं कि पीयू में इस तरह के एजेंडे लाने की कोशिश की गई, कार्यक्रमों को बंद करवाने की कोशिश की, गुंडे बुलवाए गए, मगर हर बार छात्रों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। पीयू में किसी की भी चलने नहीं दी गई। सिर्फ छात्रों की ही चली है। एसएफएस सेमिनार कर मॉब लिचिंग और अन्य मुद्दों के बारे में छात्रों को जागरूक करेगी।
प्रधानमंत्री मोदी के बारे में क्या राय है?
मोदी जी मुझे पसंद नहीं हैं, क्योंकि उनकी नीति समाज को बांटने वाली है। वह सबका एक समान विकास नहीं करवा रहे। सबको साथ लेकर नहीं चलते।
पीयू में अब मुद्दों की राजनीति ही होगी। इसके अलावा देशव्यापी मुद्दों पर भी यूनिवर्सिटी में बहस होगी। पहले बोल दिया जाता था कि इस तरह की बातें यहां क्यों कर रहे। जब तक मुद्दों पर हेल्दी बहस नहीं होगी, तब तक न तो यूनिवर्सिटी का विकास होगा और न ही देश का।
जेएनयू हो या बीएचयू, हर जगह छात्रों की आवाज दबाई गई, अब विरोध को दबा दिया जाता, इसे कैसे देखती हैं?
इस सरकार में तो कुछ ज्यादा होने लगा है। अब देश को बांटने की राजनीति हो रही है मगर मैं एक बात कहना चाहती हूं कि पीयू में इस तरह के एजेंडे लाने की कोशिश की गई, कार्यक्रमों को बंद करवाने की कोशिश की, गुंडे बुलवाए गए, मगर हर बार छात्रों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। पीयू में किसी की भी चलने नहीं दी गई। सिर्फ छात्रों की ही चली है। एसएफएस सेमिनार कर मॉब लिचिंग और अन्य मुद्दों के बारे में छात्रों को जागरूक करेगी।
प्रधानमंत्री मोदी के बारे में क्या राय है?
मोदी जी मुझे पसंद नहीं हैं, क्योंकि उनकी नीति समाज को बांटने वाली है। वह सबका एक समान विकास नहीं करवा रहे। सबको साथ लेकर नहीं चलते।
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आपको क्या लगता है कि इसके पीछे कौन लोग हैं?
सिर्फ एक ही विचारधारा के लोग हैं। जो दूसरों को स्पेस नहीं देना चाहते। सिर्फ अपने सेक्शन को स्पेस दे रहे हैं। आप उनसे सवाल नहीं पूछ सकते। वे सिर्फ बोलना चाहते हैं, दूसरों की सुनना नहीं चाहते। मॉब लिचिंग हो या रेपिस्ट के हक में रैली निकालने वाले लोग। इन सबके पीछे आरएसएस पर ही आरोप लगते आए हैं।
इलेक्टोरल पॉलिटिक्स पर आप विश्वास नहीं करते, फिर भी चुनाव लड़ा?
लोकसभा व विधानसभा चुनाव जीतने पर पावर मिलती है, जबकि छात्रसंघ चुनाव में ऐसा नहीं होता है। जिस तरह से ट्रेड यूनियन के चुनाव होते हैं, ठीक उसी तरह के छात्रसंघ के चुनाव होते हैं। हम लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। हमारा काम विद्यार्थियों के मुद्दे उठाना और उसका समाधान कराना है। हमारा यह भी मकसद है कि सभी को ओपेन डेमोक्रेटिक स्पेस मिले।
आपको भी एंटी नेशनल कहा जा सकता है?
अब ऐसा नहीं है। पहले एंटी नेशनल कहकर लोगों को चुप करा दिया जाता था, मगर अब ऐसा नहीं है। अब यदि इस पर चर्चा करो तो स्टूडेंट हंसते हैं। वे अब समझने लगे हैं। जो छात्रों में बदलाव आ रहा है, अब उसे सोसाइटी में लाना होगा। इसके लिए भी एसएफएस काम करेगी।
सिर्फ एक ही विचारधारा के लोग हैं। जो दूसरों को स्पेस नहीं देना चाहते। सिर्फ अपने सेक्शन को स्पेस दे रहे हैं। आप उनसे सवाल नहीं पूछ सकते। वे सिर्फ बोलना चाहते हैं, दूसरों की सुनना नहीं चाहते। मॉब लिचिंग हो या रेपिस्ट के हक में रैली निकालने वाले लोग। इन सबके पीछे आरएसएस पर ही आरोप लगते आए हैं।
इलेक्टोरल पॉलिटिक्स पर आप विश्वास नहीं करते, फिर भी चुनाव लड़ा?
लोकसभा व विधानसभा चुनाव जीतने पर पावर मिलती है, जबकि छात्रसंघ चुनाव में ऐसा नहीं होता है। जिस तरह से ट्रेड यूनियन के चुनाव होते हैं, ठीक उसी तरह के छात्रसंघ के चुनाव होते हैं। हम लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। हमारा काम विद्यार्थियों के मुद्दे उठाना और उसका समाधान कराना है। हमारा यह भी मकसद है कि सभी को ओपेन डेमोक्रेटिक स्पेस मिले।
आपको भी एंटी नेशनल कहा जा सकता है?
अब ऐसा नहीं है। पहले एंटी नेशनल कहकर लोगों को चुप करा दिया जाता था, मगर अब ऐसा नहीं है। अब यदि इस पर चर्चा करो तो स्टूडेंट हंसते हैं। वे अब समझने लगे हैं। जो छात्रों में बदलाव आ रहा है, अब उसे सोसाइटी में लाना होगा। इसके लिए भी एसएफएस काम करेगी।