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छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहते हैं टीएस सिंहदेव: बोले- दीपक बैज हटे तो जिम्मेदारी निभाने को हूं तैयार
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर/अंबिकापुर
Published by: Lalit Kumar Singh
Updated Thu, 07 May 2026 07:53 PM IST
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सार
TS Singh Deo: छत्तीसगढ़ के सरगुजा रियासत के महाराजा और कांग्रेस के सीनियर लीडर टीएस सिंहदेव ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई है।
कांग्रेस के सीनियर लीडर टीएस सिंहदेव
- फोटो : Amar ujala digital
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विस्तार
TS Singh Deo: छत्तीसगढ़ के सरगुजा रियासत के महाराजा और कांग्रेस के सीनियर लीडर टीएस सिंहदेव ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा कि यदि वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज हटे और उन्हें मौका मिला, तो वो भी पीसीसी चीफ बनना चाहते हैं। पीसीसी चीफ की लिस्ट में एक नाम उनका भी रहेगा।
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चर्चा के दौरान उन्होंने संकेत दिए कि यदि पार्टी हाईकमान उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपती है, तो वे संगठन की कमान संभालने के लिए तैयार हैं। पीसीसी चीफ की लिस्ट में कम से कम 20 नाम जरूर होंगे और उन 20 नामों की लिस्ट में एक नाम उनका भी जरूर रहेगा। सिंहदेव ने कहा कि उनकी हमेशा कोशिश रहती है कि संगठन में सभी को साथ लेकर चला जाए और भेदभाव की स्थिति कम से कम रहे।
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उन्होंने कहा कि कांग्रेस को मजबूत करने के लिए प्रदेशभर में कार्यकर्ताओं और नेताओं से लगातार संपर्क बनाए रखना जरूरी है। प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री ने कहा कि पार्टी संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए संवाद और समन्वय सबसे अहम है।
'पूरी सक्रियता और समर्पण के साथ काम करेंगे'
सिंहदेव ने स्पष्ट किया कि यदि वर्तमान अध्यक्ष बैज के हटने के बाद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलती है, तो वे पूरी सक्रियता और समर्पण के साथ काम करेंगे। ऐसे में राजनीति के पंडितों की मानें, तो सिंहदेव का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब कांग्रेस संगठन में बदलाव और नई जिम्मेदारियों को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। सिंहदेव प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। सरगुजा संभाग में उनकी सियासी पकड़ मजबूत मानी जाती है।
जानें कौन हैं टीएस सिंहदेव?
छत्तीसगढ़ के पूर्व डिप्टी सीएम और कांग्रेस के सीनियर लीडर सिंहदेव सरगुजा राजघराने के 118वें और वर्तमान महाराजा हैं। वे सरगुजा महाराज के नाम से प्रदेशभर में विख्यात हैं। उनका पूरा नाम त्रिभुवनेश्वर शरण सिंहदेव हैं। राजशाही ठाठ-बाट होने के बावजूद वे बेहद सौम्य, सरल,सादा व्यक्तित्व और जमीन से जुड़े नेता हैं। उनसे एक बार जो भी मिलता है, उनका ही होकर रह जाता है। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी सिंहदेव पहली मुलाकात में ही लोगों पर अपनी गहरी छाप छोड़ देते हैं।
नेहरू और सिंहदेव का वो किस्सा
31 अक्टूबर 1952 को जन्मे टीएस सिंहदेव सरगुजा महाराज मदनेश्वर शरण सिंहदेव और राजमाता देवेंद्र कुमारी के बेटे हैं। उनके राजनीतिक सियासत की बात करें, तो बचपन से ही उन्हें राजनीति विरासत में मिली। उनके पिता अविभाजित मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्य सचिव थे। उनकी माता के मंत्री रहने का अनुभव भी उनके साथ जुड़ा हुआ है। सिंहदेव परिवार का गांधी परिवार से भी गहरा नाता है। एक बार देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू एक रैली के लिए इलाहाबाद आए थे, तब एक खुली छत वाली लाल स्पोर्ट कार फर्राटा भरती हुई उनके बगल से निकल गई। पंडित नेहरू अपनी रैली के लिए वैसी ही गाड़ी चाहते थे, लिहाजा अधिकारियों से उस गाड़ी का पता लगाकर मांगने को कहा गया तब मालूम चला कि वह गाड़ी उनके अभिन्न मित्र सरगुजा महाराज रामानुजशरण सिंहदेव के पोते टीएस सिंहदेव की है। इसके बाद टीएस सिंहदेव की गाड़ी मंगाई गई और शानदार रैली हुई।
नेहरू ने जब डिनर के लिए किया इंतजार
पंडित नेहरू ने उस रात डिनर में महाराज रामानुजशरण सिंहदेव के कार वाले पोते के न दिखने पर उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की, तो पता चला कि वह आमंत्रित ही नहीं हैं। तब नेहरू ने कहा कि टीएस सिंहदेव के आने तक वह इंतजार करेंगे। फिर क्या था, पूरा प्रशासनिक अमला उनका पता लगाते हुए सिनेमा हॉल पहुंच गया, जहां शो रुकवाकर अनाउंस कर टीएस सिंहदेव को ढूंढ़कर जवाहरलाल नेहरू के सामने लाया गया।
आजादी के आंदोलन में सरगुजा रियासत की अहम भूमिका
कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नैतिक, आर्थिक और राजनीतिक समर्थन और सहायता प्रदान की गई थी। 52 हाथियों का एक शानदार काफिला, जो चांदी के हौदों से सजा हुआ था, उनके पास भेजा गया था। कांग्रेस के साल 1939 के 52वें त्रिपुरी (जबलपुर) अधिवेशन में चाय-नाश्ता, भोजन, आवास, विश्राम, सोने की व्यवस्था, हलवाई, पंडाल, कुली-मजदूर, दवाइयां, इलाज, मनोरंजन, ठंडा-गर्म पानी आदि सुविधाओं के साथ सम्मानपूर्वक व्यवस्था की गई थी। सरगुजा के महाराज रामानुज शरण सिंहदेव ने अंग्रेजों के खिलाफ देसी रियासतों के कांग्रेस के साथ खड़े होने का संदेश दिया। अंग्रेजों से सीधे और साहसिक टक्कर लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई।