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दूसरा पहलू: डेढ़ सौ साल पुराना नदरई पुल, ब्रिटिश वास्तुकला और डॉक्टर डेथ की क्रूर कहानी से दहल उठे लोग!

भूपेंद्र कुमार Published by: Shivam Garg Updated Thu, 26 Mar 2026 07:33 AM IST
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सार

उत्तर प्रदेश के कासगंज का नदरई पुल ब्रिटिश वास्तुकला का नायाब नमूना तो है ही, यहां कुछ ऐसा भी हुआ, जिससे सहम उठे लोग। डॉक्टर डेथ के नाम से कुख्यात सीरियल किलर देवेंद्र शर्मा ने लाशों को ठिकाने लगाने के लिए इसी पुल का सहारा लिया था। वह ऐसा इसलिए करता था, ताकि मगरमच्छ शवों को खा जाएं और किसी को कुछ पता न चल सके। स्थापना के सैकड़ों वर्षों बाद भी पुल शान से खड़ा है। इसमें कोई लीकेज या अन्य समस्या नहीं है।

150-Year-Old Naderai Bridge in Kasganj: British Architecture, Crocodiles, and Serial Killer Dr. Death
डेढ़ सौ साल पुराना पुल - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार

भला किसी पुल की भी कोई कहानी हो सकती है? ऐसा लगता तो नहीं, लेकिन आगरा-बरेली राजमार्ग पर कासगंज में नदरई पुल की दास्तां अनोखी ही है। यह पुल अतीत को वर्तमान से जोड़े हुए है। लगभग डेढ़ सदी के इतिहास को समेटे इस पुल को देखने आज भी देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। ब्रिटिश इंजीनियरिंग की अनोखी मिसाल इस पुल को आयरलैंड की कॉर्क यूनिवर्सिटी के तकनीकी सहयोग से ब्रिटिश अभियंता विलियम गुड ने बनाया था।

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इस विशाल पुल को बनाने में लोहे का इस्तेमाल नहीं हुआ है, बल्कि मेहराब की तकनीक इस्तेमाल की गई है। इस जलसेतु (एक्वाडक्ट) को बनाने में चार वर्ष लगे। जलसेतु का काम गुरुत्वाकर्षण के जरिये पानी को ऊंचाई से ढलान पर पहुंचाना होता है। यह पुल चर्चा में तब आया, जब डॉक्टर डेथ के नाम से कुख्यात देवेंद्र शर्मा को पुलिस ने मई, 2025 में गिरफ्तार किया। वर्ष 2002 से 2004 के बीच देवेंद्र पर 125 लोगों की किडनी निकालकर बेचने और उनकी हत्या करने का आरोप था। लाशों को ठिकाने लगाने के लिए डॉक्टर डेथ ने इसी पुल का सहारा लिया। बताया जाता है कि वह ऐसा इसलिए करता था, ताकि मगरमच्छ शवों को खा जाएं और किसी को कुछ पता न चले।
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पुल की सबसे खास बात है कि ऊपर हजारा (निचली गंगा) नहर और लगभग 100 फीट नीचे काली नदी बहती है। स्थानीय लोग इसे झाल या नदरई का पुल कहते हैं। पुल 15 मेहराबों पर टिका है, जो एक हजार फीट से अधिक फैली हुई हैं। पुल लगभग 20 मीटर चौड़ा है। इसे थामे रखने वाले स्तंभ (पिलर) ईंटों के बने हैं। तब कंक्रीट का इस्तेमाल नहीं होता था, पर बाद में कई जगह सीमेंट से मरम्मत की गई। उस समय ईंटों को जोड़े रखने के लिए चूने और गुड़, दाल के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता था। दिलचस्प बात यह है कि पुल आज भी शान से खड़ा है। इसमें कोई लीकेज या समस्या नहीं है। आमतौर पर किसी भी पुल को 100 साल बाद उपयोग के लिए बंद कर गिरा दिया जाता है, पर इसके साथ ऐसा नहीं है। पुल की मेहराबों के ऊपर कोठरी और बुर्जियां बनी हैं, जिनसे सीढ़ियों के जरिये नीचे काली नदी तक जाया जा सकता है, पर इनमें से ज्यादातर कूड़े व गंदगी के कारण बंद हैं। काली नदी भी सूख चुकी है।

पुल की वास्तुकला कमाल की है। इसके नीचे सुरंगों का पूरा जाल है। पर, अब इनका कोई उपयोग नहीं है। तो क्या यहां अब भी मगरमच्छ रहते हैं? स्थानीय ग्रामीण रमेश कहते हैं-हां बिल्कुल, वे खेतों तक में आ जाते हैं, कई बार मवेशियों और लोगों को पानी में खींच भी चुके हैं। सीरियल किलर डॉक्टर डेथ ने भी तो आखिर मगरमच्छों की वजह से ही इस जगह को चुना था। यह पुल बहते पानी के अलावा अंग्रेजों व डॉक्टर डेथ की क्रूरता का भी साक्षी है।

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