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मध्य-पूर्व संघर्ष: भारत के समक्ष केवल नीतियों की नहीं, अपितु सोच की भी परीक्षा
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सार
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यह स्थिति लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन हर वैश्विक संकट इसे एक नई तीव्रता से सामने ले आता है। हॉर्मुज स्ट्रेट इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील बिंदु है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
- फोटो : ANI
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विस्तार
विगत 26 दिन से अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध में उलझे हुए हैं। एक झटके में दुनिया बदल गई है। हम उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां पुरानी ताकतों की पकड़ ढीली पड़ रही है। नए समीकरण बन रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया, बल्कि उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है।
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ऐसे समय में एक सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आता है, क्या भारत इस बदलती दुनिया के लिए तैयार है या अभी भी वह बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर रहने की आदत से बाहर नहीं निकल पाया है?
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भारत के सामने चुनौती दोहरी है, पहली- ऊर्जा सुरक्षा और दूसरी- सामरिक संतुलन बनाए रखना। क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ रही हैं। आपूर्ति शृंखलाएं अस्थिर हैं। युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐसे में भारत के समक्ष केवल नीतियों की नहीं, अपितु सोच की भी परीक्षा हो रही है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यह स्थिति लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन हर वैश्विक संकट इसे एक नई तीव्रता से सामने ले आता है। हॉर्मुज स्ट्रेट इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील बिंदु है।
इसके बाधित होने का असर केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहा है, यह सीधे रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगा है। भारत में रसोई गैस, पेट्रोल (पावर) और इंडस्ट्री के इस्तेमाल वाले डीजल की कीमतों में इजाफा हुआ है।
यहां एक गंभीर सवाल उभरता है, क्या भारत ने पिछले दशकों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पर्याप्त दीर्घकालिक तैयारी की है या हर संकट के समय हम अस्थायी समाधान खोजने में ही लगे रहते हैं?
दरअसल, तेल की कीमतों में उछाल केवल आर्थिक आंकड़ों का खेल नहीं है। यह महंगाई, मुद्रा और विकास दर, तीनों को प्रभावित करता है। इसका असर अंततः आम नागरिक पर ही पड़ता है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में वैकल्पिक ऊर्जा की दिशा में कदम जरूर बढ़ाए हैं, लेकिन अब यह सवाल अधिक प्रासंगिक हो गया है, क्या ये कदम पर्याप्त हैं? ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य का ईंधन बताया जा रहा है। इसमें संभावनाएं भी हैं और रणनीतिक लाभ भी है, लेकिन क्या हम इसे तेजी से जमीन पर उतार पा रहे हैं?
सौर ऊर्जा का विस्तार हो रहा है, लेकिन क्या यह इतना व्यापक है कि आयातित ऊर्जा पर निर्भरता को वास्तव में कम कर सके? छतों पर सोलर पैनल लगना एक अच्छी शुरुआत है, पर क्या यह एक व्यापक ऊर्जा क्रांति में बदल पाया है?
इथेनॉल मिश्रण ने नई दिशा दिखाई है, लेकिन यहां भी सवाल यही है, क्या यह प्रयास दीर्घकालिक समाधान बन पाएगा या केवल आंशिक राहत तक सीमित रहेगा? स्पष्ट है, ऊर्जा के क्षेत्र में आधे-अधूरे कदम अब पर्याप्त नहीं होंगे। यहां निर्णायक परिवर्तन की आवश्यकता है।
एक और बड़ा सवाल यह है कि युद्ध के बदलते चेहरे के चलते क्या हमारी तैयारी पर्याप्त है? रूस-यूक्रेन युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध में हम देख चुके हैं कि युद्ध की प्रकृति बदल गई है। अब बड़े हथियारों की जगह छोटे, सस्ते और अधिक प्रभावी साधनों ने ले ली है। ड्रोन इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण हैं।
कम लागत में बड़े नुकसान की क्षमता ने उन्हें युद्ध का निर्णायक हथियार बना दिया है। ऐसे में एक अहम सवाल सामने आता है, क्या भारत इस क्षेत्र में पर्याप्त तेजी से आगे बढ़ रहा है?
मिसाइल डिफेंस सिस्टम की आवश्यकता अब स्पष्ट है, लेकिन क्या हमारी मौजूदा व्यवस्था इतनी व्यापक है कि बड़े शहरों और रणनीतिक ठिकानों को पूरी तरह सुरक्षित कर सके? साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का क्षेत्र और भी जटिल है।
यहां लड़ाई दिखाई नहीं देती, लेकिन उसका असर गहरा होता है। क्या भारत इस अदृश्य युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार है? यह साफ होता जा रहा है कि केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति अब पर्याप्त नहीं है। युद्ध का मैदान बदल चुका है। उसके साथ रणनीति भी बदलनी होगी।
पश्चिम एशिया में भारत के हित केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय और आर्थिक भी हैं। लाखों भारतीय वहां काम करते हैं। उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत को इस स्थिति में संतुलन बनाए रखना होगा।
एक ओर उसके इजरायल के साथ मजबूत संबंध हैं, दूसरी ओर ईरान के साथ भी उसके महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं। यहां सवाल यह नहीं है कि भारत किसके साथ खड़ा है, बल्कि यह है कि वह अपने हितों की रक्षा किस प्रकार करता है।
क्या भारत इस संतुलन को लंबे समय तक बनाए रख पाएगा? कूटनीति अब केवल बयान देने का माध्यम नहीं रही, बल्कि रणनीतिक संतुलन साधने की कला बन चुकी है।
हर संकट अपने साथ एक अवसर भी लेकर आता है। भारत के लिए यह वही क्षण है। ऊर्जा, रक्षा और तकनीक, इन तीनों क्षेत्रों में निर्णायक बदलाव ही भारत को भविष्य के लिए तैयार कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए केवल नीतियां नहीं, बल्कि स्पष्ट दृष्टि और तेज क्रियान्वयन भी जरूरी है।
यह समय यह तय करेगा कि भारत परिस्थितियों के साथ बहता रहेगा या उन्हें अपने पक्ष में मोड़ने की क्षमता विकसित करेगा। सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या हम इस बदलती दुनिया को केवल देख रहे हैं या उसके अनुरूप खुद को बदल भी रहे हैं?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।