एआई के युग में फ्रीलांसिंग का भविष्य: क्या AI पत्रकारों की जगह ले लेगा या बनेगा उनका सबसे बड़ा मददगार?
एआई आने के बाद पत्रकारिता और फ्रीलांसिंग के भविष्य पर कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी सिलसिले में आइए जानते हैं कैसे तकनीक और इंसान के इस टकराव में खबरों की साख और लेखकों की पहचान दांव पर लगी है।
विस्तार
पत्रकारिता हमेशा से भरोसे का पेशा रही है। पाठक यह मानकर खबर पढ़ता है कि जो शब्द उसके सामने हैं, उनके पीछे कोई इंसान है। जिसने रिपोर्टिंग की, सवाल पूछे, तथ्य जांचे और फर अपनी समझ से कहानी को लिखा है। हालांकि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से फैलते इस्तेमाल ने इस भरोसे की बुनियाद को हिलाना अब शुरू कर दिया है। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एआई पत्रकारों की मदद कर रहा है या नहीं बल्कि यह भी है कि क्या भविष्य में यह तय कर पाना संभव होगा कि खबर लिखने वाला इंसान है या मशीन।
हाल के महीनों में सामने आए कुछ मामलों ने इस तरह की बहस को चर्चा के केंद्र में लाने का काम किया है। बड़े अंग्रेजी मीडिया संस्थानों में छपे लेखों के पीछे ऐसे फ्रीलांस पत्रकार निकले हैं, जो असल में अस्तित्व ही नहीं रखते थे। नाम, प्रोफाइल, बाइलाइन सब कुछ था, सिवाय उस इंसान के। इसको लेकर जब संपादकों को शक हुआ और उन्होंने इसकी जांच की, तो पता चला कि पिच से लेकर पूरा आर्टिकल एआई की मदद से तैयार किया गया था। इसके बाद उन लेखों को हटाया गया। हालांकि, तब तक एक बड़ा सवाल खड़ा हो चुका था कि अगर कोई भी एआई की मदद से नकली पहचान बनाकर पत्रकार बन सकता है, तो फ्रीलांस सिस्टम कैसे बचेगा?
फ्रीलांस पत्रकारिता का पूरा ढांचा आपसी भरोसे पर टिका है। संपादक यह मानकर चलता है कि सामने वाला व्यक्ति वही है जो वह दावा कर रहा है और स्टोरी उसी ने खुद की है। वहीं जनरेटिव एआई आने के बाद यह प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। अब कोई भी कुछ मिनटों में शानदार भाषा वाली पिच लिख सकता है, खुद को किसी विषय का विशेषज्ञ बता सकता है और प्रोफेशनल सी दिखने वाली प्रोफाइल के साथ ईमेल भेज सकता है। नतीजा यह है कि संपादकों के इनबॉक्स में अब असली और नकली के बीच फर्क करना पहले के मुकाबले काफी ज्यादा कठिन हो गया है।
हालांकि, इसका दूसरा पहलू आपको जरूर समझना चाहिए। कई फ्रीलांस पत्रकारों के लिए एआई एक दुश्मन नहीं, बल्कि सहायक बनकर उभर रहा है। बहुत से लेखक एआई का इस्तेमाल अपनी रिसर्च को व्यवस्थित करने, आइडिया स्ट्रक्चर करने, इंटरव्यू का ट्रांसक्रिप्शन तैयार करने और शुरुआती ड्राफ्ट बनाने के लिए कर रहे हैं। इससे उनके समय की काफी बचत हो रही है और वे रिपोर्टिंग के गहरे हिस्सों, विश्लेषण और कहानी कहने पर ज्यादा ध्यान दे पा रहे हैं। कुछ पत्रकारों का कहना है कि एआई की मदद से उनकी पिच ज्यादा सटीक और आकर्षक हुई हैं, जिससे उन्हें काम मिलने की संभावना भी बढ़ी है।
वहीं इसका दूसरा पहलू भी है। काम जब तेज होता है तो उम्मीदें भी बढ़ती हैं। कई फ्रीलांसर बताते हैं कि अब उनसे कम समय में स्टोरी मांगी जाती है, यही नहीं कई मामलों में बजट भी घटा दिया गया है। यह मान लिया जाता है कि जब एआई है, तो काम में इतना वक्त क्यों लगे? एआई के साथ सबसे बड़ा जोखिम सत्यापन का है। जनरेटिव एआई कभी-कभी ऐसे तथ्य, आंकड़े या उद्धरण गढ़ देता है, जो सुनने में विश्वसनीय लगते हैं लेकिन होते नहीं। इस कारण जो पत्रकार एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें हर जानकारी की दोबारा जांच करनी पड़ती है। कई बार यह जांच-पड़ताल इतना समय ले लेती है कि एआई से मदद लेने के बाद एक अच्छी स्टोरी तैयार करने में पहले जितना ही समय लग जाता है। पत्रकार मानते हैं कि बिना वेरिफिकेशन के एआई पर भरोसा करना पेशे के लिए खतरनाक हो सकता है, क्योंकि एक भी बड़ी गलती पाठकों का भरोसा तोड़ सकती है।
संपादकों के सामने चुनौतियां और भी जटिल हैं। उन्हें अब सिर्फ अच्छी स्टोरी नहीं बल्कि भरोसेमंद लेखक भी ढूंढना होता है। कुछ संस्थानों ने नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं, जैसे लेखकों से ड्राफ्ट का वर्जन का हिस्ट्री मांगना या यह दिखाने को कहना कि उन्होंने रिपोर्टिंग कैसे की। यह कदम फर्जी एआई जनरेटेड कंटेंट को पकड़ने में मदद कर सकता है, लेकिन इसका एक साइड इफेक्ट भी है। नए और युवा पत्रकारों के लिए इंडस्ट्री में प्रवेश और कठिन हो सकता है, क्योंकि उनके पास पहले से बने नेटवर्क या पुराने बाइलाइन नहीं होती हैं।
एआई का असर सिर्फ लेखकों तक सीमित नहीं है। इलस्ट्रेटर और फोटोग्राफर जैसे क्रिएटिव प्रोफेशनल्स पर इसका असर और भी गहरा है। कई क्लाइंट अब सीधे एआई जनरेटेड इमेज का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे इंसानी कलाकारों के प्रोजेक्ट कम हो रहे हैं। कुछ मामलों में कलाकारों से कहा जा रहा है कि वे एआई जैसी शैली में काम करें, जिसके चलते उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित हो रही है।
अब सवाल है कि क्या एआई पत्रकारों की जगह ले लेगा? ज्यादातर फ्रीलांसर्स का मानना है कि ऐसा पूरी तरह संभव नहीं है। एआई लिख सकता है, लेकिन वह रिपोर्टिंग नहीं कर सकता। वह सवाल नहीं पूछता, जमीन पर जाकर हालात नहीं देखता और नैतिक फैसले नहीं लेता। असल चुनौती यह तय करने की है कि एआई को कहां तक इस्तेमाल किया जाए और कहां इंसानी दखल अनिवार्य रहे।
इस कारण यह कहना स्पष्ट होगा कि फ्रीलांस पत्रकारिता खत्म नहीं हो रही, बल्कि बदल रही है। एआई ने काम करने के तरीके को तेज और आसान बनाया है, लेकिन साथ ही भरोसे, पहचान और पेशेवर नैतिकता के नए सवाल भी खड़े किए हैं। भविष्य की पत्रकारिता शायद इंसान और मशीन के सहयोग से बनेगी, जहां एआई एक टूल होगा, लेकिन जिम्मेदारी, सत्य और संवेदनशीलता की कमान इंसान के हाथ में ही रहेगी।
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