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जीवन धारा: व्यक्तित्व एक बहती हुई नदी की तरह है, जो भविष्य के सागर की ओर बढ़ने के लिए व्याकुल है

गॉर्डन अल्पोर्ट Published by: लव गौर Updated Thu, 19 Feb 2026 06:43 AM IST
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सार

व्यक्तित्व एक बहती हुई नदी की तरह है, जो भविष्य के सागर की ओर बढ़ने के लिए व्याकुल है। अस्तित्व का सार इस बात में नहीं छिपा है कि हम अतीत में क्या थे, बल्कि इसमें है कि हम भविष्य में क्या बनने की आकांक्षा रखते हैं।

Jeevan Dhara: Personality is like flowing river eager to move towards ocean of future
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार

मानवीय चेतना की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति अतीत की बेड़ियों को तोड़कर स्वयं के निरंतर नवनिर्माण में निहित है। हमारा व्यक्तित्व बीती हुई घटनाओं का कोई जड़ संग्रह नहीं है, जो हमें पीछे खींचती हैं। यह तो एक बहती हुई नदी की तरह है, जो भविष्य के सागर की ओर बढ़ने के लिए व्याकुल है। हमारे अस्तित्व का वास्तविक सार इस बात में नहीं छिपा है कि हम अतीत में क्या थे, बल्कि इसमें है कि हम आने वाले समय में क्या बनने की आकांक्षा रखते हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि वर्तमान की प्रेरणाएं अतीत की विवशताओं की मोहताज नहीं हैं, तो हर नया सवेरा हमें अपने जीवन का उद्देश्य पुनः परिभाषित करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है।
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स्वयं को फिर से गढ़ने की यह शक्ति हमारे भीतर के उस केंद्र से उपजती है, जिसे हम अपना ‘स्व’ कहते हैं। एक परिपक्व और विकसित व्यक्तित्व की पहचान यही है कि वह अपनी तात्कालिक और स्वार्थी जरूरतों से ऊपर उठकर अपना विस्तार करता है। इसका अर्थ यह है कि जब हम स्वयं को अपनी व्यक्तिगत उत्तरजीविता से बड़े किसी लक्ष्य, चाहे वह कला का सृजन हो, समाज की सेवा हो या किसी मानवीय मिशन के प्रति समर्पण, में झोंक देते हैं, तब हम जीवन की वास्तविक समृद्धि का स्वाद चख पाते हैं।
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हृदय का यह विस्तार हमारे आंतरिक मूल्यों और बाहरी जगत के बीच एक ऐसा अटूट सेतु बनाता है, जो जीवन को सार्थकता, परिपक्वता और गहराई प्रदान करता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण जीवन का वह एकीकृत दर्शन है, जो हमारे मूल्यों को एक सुसंगत ढांचे में पिरो देता है। यह दर्शन हमारे भीतर एक दिशा-सूचक यंत्र की तरह कार्य करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि हमारे निर्णय केवल परिस्थितियों या शारीरिक प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया मात्र न हों, बल्कि हमारे आंतरिक सत्य का प्रतिबिंब हों। एक संतुलित व्यक्तित्व वही है, जो स्वयं को गहरी अंतर्दृष्टि और एक स्वस्थ विनोद भाव के साथ देख सके। यह क्षमता हमें पंगु होने से बचाती है और हमें एक हल्के, पर अडिग मन के साथ अपने आदर्शों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

मानव स्वभाव की सबसे बड़ी विशेषता उसका विकास की ओर उन्मुख होना और असीमित संभावनाओं से भरा होना है। व्यक्तित्व विकास कभी न खत्म होने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है, जहां वास्तविक आनंद किसी मंजिल पर ठहर जाने में नहीं, बल्कि स्वयं के निरंतर परिष्कार और सुधार में पाया जाता है। अपनी विशिष्टता को सम्मान देकर और अपने चुने हुए मूल्यों पर अडिग रहकर, हम अपने जीवन को अखंडता की एक उत्कृष्ट कृति बना सकते हैं। इसी प्रकाश में, हर चुनौती हमारे लिए विकास का एक निमंत्रण बन जाती है और हर नया दिन वह कैनवास, जिस पर हम अपने सबसे प्रामाणिक स्वरूप को उकेर सकते हैं।

सूत्र: लक्ष्य के प्रति समर्पित रहें
जब आप अपने ‘स्व’ को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठाकर किसी महान लक्ष्य के प्रति समर्पित करते हैं, तो आपका चरित्र अपने आप निखरने लगता है। आत्मस्वीकार, अंतर्दृष्टि और विनम्रता ही आपको संतुलित बनाते हैं, जबकि करुणा, न्याय और जिज्ञासा आपके चरित्र को ऊंचाई प्रदान करते हैं।
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