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दूसरा पहलू: स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की दीवारें
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सार
स्पाइरल ऑफ साइलेंस व एल्गोरिदम की दीवारें केवल हमारे फोन तक ही सीमित नहीं, बल्कि हमारे सोचने व बोलने पर भी प्रभाव डाल रही हैं।
सोशल मीडिया
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
डाटा रिपोर्टल के मुताबिक, 2025 तक सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में 5.24 अरब थी, जो वैश्विक आबादी का करीब 63 प्रतिशत है। वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की मानें, तो 34 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया का उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग मनोरंजन के लिए करते हैं। सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से ज्यादा डाटा का बाजार बन गया है। और इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकनॉमी। इसमें वही कंटेंट टिकता है, जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है। नतीजन, हर घंटे हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं, जिनमें गुणवत्ता से ज्यादा सतहीपन झलकता है। यहीं से शुरू होती है स्पाइरल ऑफ साइलेंस की डिजिटल त्रासदी।
जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था कि जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है, तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं। शुरुआत में माना गया था कि सोशल मीडिया आम आदमी की आवाज बनेगा, लेकिन आज दुनिया एक मंच पर तो आ गई, पर यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है। दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएं, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके होते हैं। इससेे हमारे सामने वही विचार व ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है, जहां उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फंस जाते हैं। इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है या उसे ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप, वे अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएं और केवल सहमति वाले विचार ले लेते हैं। एक शोध के अनुसार, जो लोग ऐसा करते हैं, वे असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं।
आज हम ऐसे दोराहे पर खड़े हैं, जहां तकनीक तो 2026 की है, लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। स्पाइरल ऑफ साइलेंस तथा एल्गोरिदम की बनाई दीवारें केवल हमारे फोन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही हैं। अंतत: यह जिम्मेदारी हम उपयोगकर्ताओं की है कि अगर हमें इस डिजिटल जेल और फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है, तो हमें मूकदर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना होगा, जहां संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो।
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जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था कि जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है, तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं। शुरुआत में माना गया था कि सोशल मीडिया आम आदमी की आवाज बनेगा, लेकिन आज दुनिया एक मंच पर तो आ गई, पर यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है। दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएं, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके होते हैं। इससेे हमारे सामने वही विचार व ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है, जहां उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फंस जाते हैं। इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है या उसे ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप, वे अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएं और केवल सहमति वाले विचार ले लेते हैं। एक शोध के अनुसार, जो लोग ऐसा करते हैं, वे असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं।
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आज हम ऐसे दोराहे पर खड़े हैं, जहां तकनीक तो 2026 की है, लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। स्पाइरल ऑफ साइलेंस तथा एल्गोरिदम की बनाई दीवारें केवल हमारे फोन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही हैं। अंतत: यह जिम्मेदारी हम उपयोगकर्ताओं की है कि अगर हमें इस डिजिटल जेल और फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है, तो हमें मूकदर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना होगा, जहां संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो।