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जिजीविषा: तकनीक से पूर्ण आध्यात्मिकता के युग में नई पीढ़ी का आत्म-निर्माण
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सार
भारत में तीर्थ-यात्राओं और आध्यात्मिक स्थलों पर युवाओं की बढ़ती उपस्थिति भी इसी परिवर्तन का संकेत है। यह केवल धार्मिक पुनरुत्थान नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति से संवाद करने की इच्छा है। युवा परंपरा को अस्वीकार नहीं कर रहे, बल्कि उसे अपने प्रश्नों के साथ पुनः पढ़ रहे हैं।
परंपरा से चयन तक
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
एक ओर परंपरागत धार्मिक संस्थाओं में युवाओं की उपस्थिति को लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर वही युवा अपने कमरों में बैठकर मंत्र सुन रहे हैं, ध्यान कर रहे हैं, ज्योतिषीय विश्लेषण देख रहे हैं, गीता के श्लोकों पर आधारित वीडियो साझा कर रहे हैं और अपने अनुभवों को डायरी में लिखते हुए किसी गहरी आंतरिक यात्रा पर निकल चुके हैं। यह परिवर्तन शोर के साथ नहीं आया, बल्कि लगभग अदृश्य रूप से हमारे समय की चेतना में प्रवेश कर गया है। यह दृश्य विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है, परंतु वास्तव में यह एक नई आध्यात्मिक संरचना का जन्म है जिसमें आस्था विरासत के रूप में प्राप्त नहीं होती, बल्कि व्यक्तिगत चयन के रूप में निर्मित होती है।
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विश्व स्तर पर किए गए कई सर्वेक्षण यह संकेत देते हैं कि युवाओं की एक बड़ी संख्या स्वयं को ‘धार्मिक’ संस्था से बंधा हुआ नहीं मानती, परंतु वह आध्यात्मिक अभ्यासों से दूर भी नहीं है। शोध संस्थाओं के अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि बड़ी संख्या में युवा स्वयं को “आध्यात्मिक” तो मानते हैं, पर “धार्मिक” शब्द से दूरी बनाए रखते हैं। भारत में भी ध्यान-संगीत, मंत्र-जप, योग, प्राणायाम, ज्योतिष और आध्यात्मिक प्रवचनों से जुड़े डिजिटल मंचों पर सबसे अधिक सक्रिय आयु वर्ग अठारह से तीस वर्ष के बीच का है। ध्यान और मानसिक शांति से जुड़े अनुप्रयोगों के उपयोग में युवाओं की भागीदारी सबसे अधिक पाई गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आस्था समाप्त हो रही है; बल्कि आस्था अपने स्वरूप को बदल रही है और व्यक्तिगत अनुभव के केंद्र में आ रही है।
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इस परिवर्तन को समझने के लिए हमें पहचान के संकट की उस पृष्ठभूमि को देखना होगा जिसमें आज की युवा पीढ़ी बड़ी हुई है। पहले पहचान अपेक्षाकृत स्थिर होती थी – व्यक्ति का पेशा, निवास-स्थान, सामाजिक भूमिका और धार्मिक संबंध लंबे समय तक एक ही ढांचे में रहते थे। आज स्थिति बिल्कुल भिन्न है। एक ही व्यक्ति के अनेक डिजिटल रूप हैं, करियर बार-बार बदल सकता है, संबंधों की परिभाषाएँ परिवर्तित हो रही हैं और सामाजिक संरचनाएँ तरल हो चुकी हैं। इस निरंतर परिवर्तन ने स्वतंत्रता तो दी है, परंतु साथ ही एक गहरी आंतरिक अस्थिरता भी उत्पन्न की है। ऐसे समय में परंपरागत धार्मिक संरचनाएँ, जो निश्चित उत्तर देती थीं, कई युवाओं को पर्याप्त नहीं लगतीं, क्योंकि वे प्रश्न पूछने और व्यक्तिगत अनुभव के लिए उतनी जगह नहीं छोड़तीं।
यहीं चुनी हुई आध्यात्मिकता सामने आती है, जिसमें व्यक्ति अपने लिए आध्यात्मिक मार्ग का चयन करता है। वह प्रार्थना करता है, पर अनिवार्यतः किसी संस्था के निर्देशानुसार नहीं। वह ध्यान करता है, पर केवल मोक्ष की अंतिम प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और आत्म-समझ के लिए। वह ज्योतिष में रुचि लेता है, पर उसे अंधविश्वास के रूप में नहीं, बल्कि आत्म-विश्लेषण की प्रतीकात्मक भाषा के रूप में ग्रहण करता है। इस प्रकार आध्यात्मिकता उसके लिए किसी बाहरी अनुशासन का पालन नहीं, बल्कि स्वयं को निर्मित करने की प्रक्रिया बन जाती है।
आध्यात्मिकता यहाँ मोक्ष का दूरस्थ लक्ष्य नहीं
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक शोध यह बताते हैं कि नई पीढ़ी में चिंता, अकेलेपन और पहचान-संबंधी अस्थिरता का स्तर बढ़ा है। ऐसे में श्वास-प्रक्रियाएँ, मंत्र-संगीत, ध्यान, जर्नलिंग और मौन का अभ्यास केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह गए हैं, बल्कि मानसिक संतुलन के साधन बन गए हैं। आध्यात्मिकता यहाँ मोक्ष का दूरस्थ लक्ष्य नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में स्थिरता का उपकरण है।
डिजिटल माध्यमों ने इस परिवर्तन को तीव्र गति दी है। पहले आध्यात्मिक ज्ञान गुरु-परंपरा या किसी विशेष संस्था के माध्यम से प्राप्त होता था, आज वही ज्ञान विभिन्न माध्यमों के द्वारा सभी के लिए उपलब्ध है। एक युवा अद्वैत वेदांत पर प्रवचन सुन सकता है, बौद्ध ध्यान की विधि सीख सकता है, और साथ ही किसी संत की कथा भी सुन सकता है। ज्ञान का यह लोकतंत्रीकरण परंपरा की एकाधिकारवादी संरचना को बदल रहा है। अब व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक पहचान को प्राप्त नहीं करता, बल्कि उसे निर्मित करता है।
भारत में तीर्थ-यात्राओं और आध्यात्मिक स्थलों पर युवाओं की बढ़ती उपस्थिति भी इसी परिवर्तन का संकेत है। यह केवल धार्मिक पुनरुत्थान नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति से संवाद करने की इच्छा है। युवा परंपरा को अस्वीकार नहीं कर रहे, बल्कि उसे अपने प्रश्नों के साथ पुनः पढ़ रहे हैं। उनके लिए गीता केवल युद्धभूमि का संवाद नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को समझने का मनोवैज्ञानिक ग्रंथ है।
समझना है कि यह प्रवृत्ति क्यों उत्पन्न हुई
इस प्रवृत्ति का सामुदायिक पक्ष भी उभर रहा है। कीर्तन-मंडलियां, ध्यान-समूह, आध्यात्मिक चर्चा-वृत्त और ऑनलाइन सत्संग ऐसे नए सामूहिक स्थल बन गए हैं जहाँ बिना कठोर धार्मिक पहचान के भी लोग एक साथ आ सकते हैं। यह समुदाय विश्वास से अधिक अनुभव पर आधारित है। निश्चय ही इस परिवर्तन के साथ कुछ प्रश्न भी जुड़े हैं। क्या व्यक्तिगत आध्यात्मिकता अपना महत्त्व खो देगी? क्या यह बाज़ार का हिस्सा बन जाएगी? क्या परंपरा से दूरी उसे अस्थिर बना देगी? ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं, परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह समझना है कि यह प्रवृत्ति क्यों उत्पन्न हुई है। यह विद्रोह नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की आवश्यकता है जिसे अपने भीतर एक स्थिर केंद्र की खोज है।
नई पीढ़ी के लिए आध्यात्मिकता अब केवल ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग नहीं, बल्कि स्वयं तक पहुंचने का मार्ग है। यह उसे एक ऐसी भाषा देती है जिसमें वह अपने भय, अपने प्रश्न, अपनी असुरक्षाएँ और अपने अर्थ की खोज को व्यक्त कर सके। वह धर्म से दूर नहीं जा रही, बल्कि उसे भीतर स्थापित कर रही है। संभवतः हमारे समय का सबसे बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन यही है कि आस्था अब केवल मानने का विषय नहीं रही, बल्कि बनने की प्रक्रिया बन गई है, और यह प्रक्रिया प्रत्येक व्यक्ति के भीतर, उसके अपने चयन, उसके अपने अनुभव और उसकी अपनी चेतना के माध्यम से आकार ले रही है।
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