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दूसरा पहलू: खंडित झंडों को सहेज रहे सपूत, तिरंगे की शान बढ़ाने की मुहिम

नवीन सिंह पटेल Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Tue, 17 Feb 2026 07:47 AM IST
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सार

देश के सैकड़ों सपूत फटे-पुराने राष्ट्रध्वज को सहेजकर उसे किसी की नजर में नहीं आने दे रहे। वे खंडित झंडे जिम्मेदार अफसरों को सौंपते हैं, ताकि उनका शहीद के मानिंद ससम्मान निस्तारण संभव हो सके।

tiranga samman abhiyan disposal damaged national flag Indian Flag Code rules 2002
तिरंगे का ससम्मान निस्तारण - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर फहराए गए हजारों तिरंगे तेज हवा या बारिश में खराब होने के बाद कहां गए? यह जगह-जगह नहीं दिख रहे, तो इसका कारण यह है कि देश के सैकड़ों सपूत फटे-पुराने राष्ट्रध्वज को सहेजकर उसे किसी की नजर में नहीं आने दे रहे। वे खंडित झंडे जिम्मेदार अफसरों को सौंपते हैं, ताकि उनका शहीद के मानिंद ससम्मान निस्तारण संभव हो सके। ‘तिरंगा सम्मान संकल्प’ और ‘मेरा झंडा-मेरी शान’ ऐसे ही दो अभियान हैं।
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सोनीपत के सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम गौतम ने तिरंगे के सम्मान का संकल्प 15 जून, 2021 को एक ऑटो रिक्शे में खंडित तिरंगा देखकर लिया। उन्होंने ऐसे कई झंडे इकट्ठा किए। उन्हें तह (फोल्ड) करना यूट्यूब से सीखा। ‘तिरंगा सम्मान संकल्प’ से जुड़े दिल्ली-हरियाणा के 250 से अधिक देशभक्त अब तक 11,000 पुराने झंडे सोनीपत नगर निगम को सौंप चुके हैं। इनमें से 8,000 झंडों का दो माह पूर्व ससम्मान निस्तारण भी कराया गया। रैलियों और सामाजिक आयोजनों में राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल से क्षुब्ध प्रेम गौतम कहते हैं कि कार्यक्रम होने तक तो खूब झंडे लहराते हैं, फिर जहां-तहां डाल दिए जाते हैं। 90 फीसदी लोगों को पता भी नहीं है कि इन्हें कहां रखें या किसे दें। विडंबना ही है कि जिले में तैनात नोडल अधिकारी भी झंडे के सम्मानपूर्वक निस्तारण के बारे में कभी कुछ नहीं बताते।  
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चार साल से ‘मेरा झंडा-मेरी शान’ अभियान चला रहे रोहतक के सामाजिक कार्यकर्ता सुंदर जेटली बताते हैं कि आजादी के अमृत महोत्सव के तहत प्रधानमंत्री के आह्वान पर लोगों ने घर-घर तिरंगा फहराया। खाली भवनों, पेड़ों या खंभों में बांधे गए झंडे बारिश और तेज हवाओं से क्षतिग्रस्त हो गए। इनकी किसी ने चिंता नहीं की। कई झंडे झाड़ियों, खाली प्लॉट और टॉयलेट के पास मिले। साथियों संग गली-गली अभियान चलाया। टीम अभी तक 7,100 झंडे रोहतक नगर निगम को सौंप चुकी है। वह बताते हैं कि हम जीर्ण-शीर्ण झंडों की फोटो भी नहीं खींचते, ताकि अपमानजनक हाल में मिले प्यारे तिरंगे पर किसी की नजर न पड़े।

यों आम लोगों के लिए झंडा फहराना कभी आम न था, लेकिन 26 जनवरी, 2002 को भारतीय ध्वज संहिता लागू होने के बाद कोई भी चौबीसों घंटे तिरंगा फहरा सकता है। शर्त बस एक है कि ध्वज पर कोई अक्षर, नारा या लोगो न हो। इसकी शान में गुस्ताखी पर राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत तीन साल की सजा, जुर्माना या दोनों संभव है। यह सख्ती बेहद जरूरी भी है, क्योंकि राष्ट्रध्वज के गौरव में ही हर हिंदुस्तानी की बुलंदी संरक्षित है।
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