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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: सुविधा का साधन या इंसानी सोच पर कब्जा?
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सार
एआई आखिर है क्या? यह कोई बुद्धिमान प्राणी नहीं, बल्कि डाटा और पैटर्न पर काम करने वाला एक गणितीय तंत्र है। यह संभावना के आधार पर जवाब देता है, सत्य की गारंटी नहीं देता, लेकिन आम उपयोगकर्ता इसे अक्सर अंतिम सत्य मान बैठता है। यही अंधविश्वास भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर उत्साह और चिंता, दोनों एक साथ दिखाई दे रहे हैं। एक ओर सरकार और उद्योग जगत इसे भविष्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मान रहे हैं तो दूसरी ओर देश की सर्वोच्च अदालत ने इसके अनियंत्रित उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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यही विरोधाभास आज की सबसे बड़ी बहस बन गया है, क्या एआई हमारी क्षमता बढ़ाने वाला उपकरण है या हमारी सोचने की ताकत को धीरे-धीरे खत्म करने वाला खतरा?
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं के मसौदे तैयार करने में एआई के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता जताई। अदालत के सामने ऐसे मामले आए, जहां वकीलों ने एआई से तैयार दलीलों में उन कानूनी मामलों का हवाला दिया, जो असल में अस्तित्व में नहीं थे।
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मशीन ने जो जानकारी दी, उसे बिना जांच के सच मान लिया गया। यह केवल तकनीकी गलती नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक बदलाव का संकेत है, जिसमें इंसान अपने विवेक की जगह मशीन पर भरोसा करने लगा है। यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
एआई आखिर है क्या? यह कोई बुद्धिमान प्राणी नहीं, बल्कि डाटा और पैटर्न पर काम करने वाला एक गणितीय तंत्र है। यह संभावना के आधार पर जवाब देता है, सत्य की गारंटी नहीं देता, लेकिन आम उपयोगकर्ता इसे अक्सर अंतिम सत्य मान बैठता है। यही अंधविश्वास भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।
वहीं, दिल्ली में आयोजित एआई समिट में दूसरी तस्वीर सामने आई। वहां एआई को स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि, शिक्षा और प्रशासन में क्रांति लाने वाला बताया गया। सच भी यही है कि तकनीक ने अनेक क्षेत्रों में चमत्कार किए हैं। मरीजों की बीमारी पहचानने से लेकर किसानों को मौसम की जानकारी देने तक, एआई ने कई जटिल काम आसान कर दिए हैं, लेकिन इसी उत्साह के बीच विशेषज्ञों ने एक चेतावनी भी दी, एआई केवल मजदूरों की नौकरी नहीं लेगा, बल्कि वकील, पत्रकार, शिक्षक, अकाउंटेंट जैसे पेशों को भी प्रभावित करेगा। जब मशीनें लिखने, विश्लेषण करने और निर्णय सुझाने लगेंगी, तब इंसान की भूमिका क्या रह जाएगी?
सबसे बड़ा खतरा रोजगार से भी बड़ा है, वह है 'सोच का क्षरण'। जब हर सवाल का जवाब एक क्लिक पर मिल जाता है तो दिमाग सवाल पूछना बंद कर देता है। धीरे-धीरे व्यक्ति सोचने के बजाय खोजने और कॉपी करने की आदत विकसित कर लेता है। यही प्रक्रिया संज्ञानात्मक आलस्य (काग्निटिव ऐट्रफी) पैदा करती है।
क्रिटिकल थिंकिंग किसी भी समाज की प्रगति का आधार होती है। यह हमें प्रश्न पूछने, तर्क करने और नई दिशा खोजने की शक्ति देती है, लेकिन एआई के अत्यधिक उपयोग से यह क्षमता कमजोर हो सकती है। यदि हम हर समस्या का समाधान मशीन से ही पूछने लगेंगे तो हमारी अपनी निर्णय क्षमता घटने लगेगी। एक और गंभीर समस्या पूर्वाग्रह की है।
एआई का ज्ञान पूरी तरह उस डाटा पर निर्भर करता है, जो उसे दिया जाता है। यदि डाटा में पक्षपात या अधूरी जानकारी है तो एआई के उत्तर भी उसी दिशा में झुक जाएंगे। इसका अर्थ यह है कि तकनीक कभी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हो सकती।
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने संकेत दिया है कि तकनीक का उपयोग सहायक के रूप में होना चाहिए, न कि निर्णयकर्ता के रूप में। कानून, पत्रकारिता, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सत्यापन की जिम्मेदारी इंसान की ही है। इस बहस का एक दूसरा पक्ष भी है।
कुछ लोग मानते हैं कि हर नई तकनीक के आने पर ऐसे डर पैदा होते हैं। जब कंप्यूटर आए थे, तब भी कहा गया था कि इंसान बेरोजगार हो जाएगा। इंटरनेट के समय भी यही आशंकाएं थीं, लेकिन अंततः तकनीक ने नए अवसर भी पैदा किए।
एआई के समर्थकों का तर्क है कि यह इंसान की जगह नहीं लेगा, बल्कि उसे अधिक सक्षम बनाएगा। यह कठिन और दोहराए जाने वाले कामों को मशीन पर छोड़कर इंसान को रचनात्मक कार्यों के लिए समय देगा।
यह तर्क आंशिक रूप से सही भी है। समस्या तकनीक में नहीं, अपितु उसके उपयोग के तरीके में है। यदि एआई को सहायक की तरह उपयोग किया जाए तो यह लाभकारी है। यदि इसे अंतिम निर्णयकर्ता बना दिया जाए तो खतरा शुरू हो जाता है।
आज सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है। हमें तकनीक का विरोध नहीं करना, अपितु उसके उपयोग की सीमाएं तय करनी हैं। 'ह्यूमन-इन-द-लूप' का सिद्धांत यही कहता है कि अंतिम नियंत्रण हमेशा इंसान के पास होना चाहिए। इसके साथ ही एक नई जिम्मेदारी डिजिटल साक्षरता की पैदा हुई है। अब केवल पढ़ना-लिखना पर्याप्त नहीं है।
लोगों को यह भी सीखना होगा कि एआई द्वारा दी गई जानकारी को कैसे परखा जाए? स्रोतों की जांच कैसे की जाए? तथ्य और भ्रम में फर्क कैसे किया जाए?
एआई के उपयोगकर्ताओं को यह समझना होगा कि तकनीक कोई जादुई समाधान नहीं है। वह केवल एक उपकरण है, जो इंसान के हाथों में सुरक्षित है। यदि हम अपनी क्रिटिकल थिंकिंग को बनाए रखेंगे तो एआई हमारे विकास का साथी बनेगा। यदि हमने सोचना छोड़ दिया तो वही तकनीक हमारे विवेक पर हावी हो सकती है।
यह बहस तकनीक बनाम इंसान की नहीं है, बल्कि तकनीक के उपयोग की है। भविष्य वही होगा जहां मशीनें काम करेंगी, लेकिन दिशा इंसान तय करेगा। एआई का युग आ चुका है। अब सवाल यह नहीं कि इसे रोका जाए या नहीं, बल्कि यह है कि इसे कैसे अपनाया जाए? ताकि सुविधा भी मिले और सोच भी सुरक्षित रहे। यही संतुलन आने वाले समय की सबसे बड़ी कसौटी होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।