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जीवन धारा: आपाधापी और संघर्षों के बीच आखिर इस जीवन का अर्थ क्या है
विक्टर फ्रैंकल
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Wed, 18 Feb 2026 07:46 AM IST
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सार
जीवन हर व्यक्ति से अलग-अलग प्रश्न पूछता है और प्रत्येक को अपने कर्मों, धैर्य व दृष्टिकोण से उसका उत्तर देना होता है। जिसके पास जीने के लिए एक ‘क्यों’ होता है, वह लगभग किसी भी ‘कैसे’ को सहन कर सकता है।
जीवन धारा
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
जीवन की आपाधापी और संघर्षों के बीच, अक्सर हम खुद से यह सवाल करते हैं कि आखिर इन सबका अर्थ क्या है? जब परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं और दुख की गहराई हमें घेर लेती है, तब उत्तर ढूंढना और भी कठिन हो जाता है। लेकिन मानवीय चेतना की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह शून्य में भी संगीत ढूंढ सकती है।
कल्पना कीजिए उस व्यक्ति की, जिससे उसका घर, उसका परिवार, उसकी पहचान और यहां तक कि उसके शरीर के कपड़े भी छीन लिए गए हों। मैंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी यातना शिविरों की उस नारकीय वास्तविकता को जिया, जहां मृत्यु हर पल द्वार पर दस्तक देती थी। वहां रहते हुए ही मुझे अनुभव हुआ कि जब बाहरी दुनिया सब कुछ छीन लेती है, तब भी हमारे पास एक ऐसी शक्ति बचती है, जिसे कोई तानाशाह नहीं छीन सकता और वह है अपनी परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया चुनने की स्वतंत्रता। मैंने शिविर के भीतर ही एक क्रांतिकारी सत्य की खोज की। मैंने देखा कि जो लोग शारीरिक रूप से बहुत बलिष्ठ थे, वे अक्सर जल्दी टूट गए, लेकिन जो लोग मानसिक रूप से किसी उद्देश्य से जुड़े थे, वे जीवित बच निकले। दरअसल, जब जीवन कठिनाइयों से भर जाता है, तब व्यक्ति यह मानने लगता है कि उसका जीवन निरर्थक है। लेकिन यदि वह अपने कष्ट में भी अर्थ खोज ले, तो वही पीड़ा उसकी शक्ति बन जाती है। तब वही दुख उसकी सहनशीलता और आत्मबल का स्रोत बन जाता है।
तब मुझे समझ आया कि जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसके अस्तित्व का महत्व है और उसके जीवन का कोई लक्ष्य है, तब उसका जीवन अपने आप बदल जाता है। तब वह अपने दुखों को बोझ नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व के रूप में देखना सीखता है। यही दृष्टिकोण उसे परिस्थितियों का शिकार बनने से रोकता है और परिस्थितियों का विजेता बना देता है।
अक्सर लोग पूछते हैं, ‘जीवन का अर्थ क्या है?’ मुझे लगता है कि यह सवाल ही गलत है। इसके बजाय हमें यह समझना चाहिए कि ‘जीवन हमसे क्या उम्मीद करता है?’ जीवन हर व्यक्ति से अलग-अलग प्रश्न पूछता है, और प्रत्येक को अपने कर्मों, धैर्य और दृष्टिकोण से उसका उत्तर देना होता है। जिसके पास जीने के लिए एक ‘क्यों’ (व्हाई) होता है, वह लगभग किसी भी ‘कैसे’ (हाउ) को सहन कर सकता है। जब तक हमारे पास कोई ऐसा लक्ष्य, कोई ऐसा कार्य या कोई ऐसा प्रिय व्यक्ति है, जिसके लिए हमें जीवित रहना है, तब तक हमारी इच्छाशक्ति अटूट रहती है। अर्थ की यह खोज कोई अमूर्त विचार नहीं है, बल्कि यह हर दिन के छोटे-छोटे निर्णयों में छिपी होती है।
सूत्र: जीने की वजह ढूंढें
जीवन हर किसी से प्रश्न पूछता है, और व्यक्ति का कर्म ही उसका उत्तर है। जिसके पास जीने की वजह होती है, वह किसी भी दुख को सहन कर सकता है। इसलिए, अपने जीवन को किसी उद्देश्य, किसी उत्तरदायित्व और किसी अर्थ से जोड़ें, क्योंकि जीवन का असली अर्थ सुख की खोज में नहीं, बल्कि प्रतिकूलताओं में ‘अर्थ’ ढूंढने की जिम्मेदारी में है।
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कल्पना कीजिए उस व्यक्ति की, जिससे उसका घर, उसका परिवार, उसकी पहचान और यहां तक कि उसके शरीर के कपड़े भी छीन लिए गए हों। मैंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी यातना शिविरों की उस नारकीय वास्तविकता को जिया, जहां मृत्यु हर पल द्वार पर दस्तक देती थी। वहां रहते हुए ही मुझे अनुभव हुआ कि जब बाहरी दुनिया सब कुछ छीन लेती है, तब भी हमारे पास एक ऐसी शक्ति बचती है, जिसे कोई तानाशाह नहीं छीन सकता और वह है अपनी परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया चुनने की स्वतंत्रता। मैंने शिविर के भीतर ही एक क्रांतिकारी सत्य की खोज की। मैंने देखा कि जो लोग शारीरिक रूप से बहुत बलिष्ठ थे, वे अक्सर जल्दी टूट गए, लेकिन जो लोग मानसिक रूप से किसी उद्देश्य से जुड़े थे, वे जीवित बच निकले। दरअसल, जब जीवन कठिनाइयों से भर जाता है, तब व्यक्ति यह मानने लगता है कि उसका जीवन निरर्थक है। लेकिन यदि वह अपने कष्ट में भी अर्थ खोज ले, तो वही पीड़ा उसकी शक्ति बन जाती है। तब वही दुख उसकी सहनशीलता और आत्मबल का स्रोत बन जाता है।
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तब मुझे समझ आया कि जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसके अस्तित्व का महत्व है और उसके जीवन का कोई लक्ष्य है, तब उसका जीवन अपने आप बदल जाता है। तब वह अपने दुखों को बोझ नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व के रूप में देखना सीखता है। यही दृष्टिकोण उसे परिस्थितियों का शिकार बनने से रोकता है और परिस्थितियों का विजेता बना देता है।
अक्सर लोग पूछते हैं, ‘जीवन का अर्थ क्या है?’ मुझे लगता है कि यह सवाल ही गलत है। इसके बजाय हमें यह समझना चाहिए कि ‘जीवन हमसे क्या उम्मीद करता है?’ जीवन हर व्यक्ति से अलग-अलग प्रश्न पूछता है, और प्रत्येक को अपने कर्मों, धैर्य और दृष्टिकोण से उसका उत्तर देना होता है। जिसके पास जीने के लिए एक ‘क्यों’ (व्हाई) होता है, वह लगभग किसी भी ‘कैसे’ (हाउ) को सहन कर सकता है। जब तक हमारे पास कोई ऐसा लक्ष्य, कोई ऐसा कार्य या कोई ऐसा प्रिय व्यक्ति है, जिसके लिए हमें जीवित रहना है, तब तक हमारी इच्छाशक्ति अटूट रहती है। अर्थ की यह खोज कोई अमूर्त विचार नहीं है, बल्कि यह हर दिन के छोटे-छोटे निर्णयों में छिपी होती है।
सूत्र: जीने की वजह ढूंढें
जीवन हर किसी से प्रश्न पूछता है, और व्यक्ति का कर्म ही उसका उत्तर है। जिसके पास जीने की वजह होती है, वह किसी भी दुख को सहन कर सकता है। इसलिए, अपने जीवन को किसी उद्देश्य, किसी उत्तरदायित्व और किसी अर्थ से जोड़ें, क्योंकि जीवन का असली अर्थ सुख की खोज में नहीं, बल्कि प्रतिकूलताओं में ‘अर्थ’ ढूंढने की जिम्मेदारी में है।