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बांग्लादेश और चुनावी सियासत: आखिर ‘जनादेश चोरी’ के आरोप को लेकर क्या समझा जाए?

Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Thu, 19 Feb 2026 03:25 PM IST
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सार

दरअसल, इस बात की पड़ताल दिलचस्प है कि ऐसे आरोप महज हार की बौखलाहट में लगाए जाते हैं? अपनी कमियों को छुपाने के लिए लगाए जाते हैं अथवा इनमें सच में बहुत दम होता है?

Now what is the meaning of the allegation of mandate theft in Bangladesh also
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान - फोटो : X-BNP
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विस्तार

चुनाव हारने के बाद ‘जनादेश चोरी’ अथवा ‘वोट चोरी’ का इल्जाम लगाना अब अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संस्कृति बनती जा रही है। पहले इस तरह के आरोप अमूमन हारने वाली सियासी पार्टियां चुनाव में धांधली अथवा नतीजों में हेराफेरी के रूप में लगाती थीं और ये आरोप अक्सर उस पार्टी पर लगते थे, जो चुनाव के समय सत्ता में रहती थी। भारत में भी राहुल गांधी और कुछ विपक्षी पार्टियां सत्तारूढ़ भाजपा और मोदी सरकार पर ‘वोट चोरी’ और ‘जनादेश चुराने’ के आरोप लगातार लगाते रहे हैं।

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अब बांग्लादेश में भी इसकी अनगूंज सुनाई दे रही है। वहां चुनाव में मात खाने वाली जमात-ए-इस्लामी और 11 पार्टियों के गठबंधन ने सत्ता में आई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) पर ‘जनादेश चुराने’ और वोटों की गिनती में ‘हेराफेरी’ का आरोप लगाया है। नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान को उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर सोशल मीडिया में ट्रोलकर उन्हें चुनाव जितवाने वाला ‘इंजीनियर’ बताया जा रहा है। हार की हताशा में ऐसा ही आरोप छह साल पहले अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने भी लगाया था, जब राष्ट्रपति पद का दूसरा चुनाव वो डेमोक्रेटिक पार्टी के हाथों हार गए थे।
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दरअसल, इस बात की पड़ताल दिलचस्प है कि ऐसे आरोप महज हार की बौखलाहट में लगाए जाते हैं? अपनी कमियों को छुपाने के लिए लगाए जाते हैं अथवा इनमें सच में बहुत दम होता है? खासकर तब, जब जीत- हार तगड़े मार्जिन के साथ हुई हो? या फिर ऐसे आरोपों का वास्तविक मकसद जनादेश को नकारकर उसका अपमान करना है? ऐसा लगता है कि देश कोई-सा भी हो, अगर लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव होने हैं तो किसी न किसी की हार या जीत तो होगी ही। यानी जनता जो आदेश देगी, वही वैध और शिरोधार्य होना चाहिए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जनादेश की पवित्रता पर संदेह का दाग लगाने की संस्कृति तेजी से फली-फूली है। इसमें आंशिक सच्चाई भी है।

बांग्लादेश के ताजा आम चुनाव वहां की मोहम्मद युनूस अंतरिम सरकार की देखरेख और प्रशासन की निगरानी में हुए थे। बीएनपी तो सत्ता से बाहर ही थी। बल्कि युनूस सरकार परोक्ष रूप से मुस्लिम कट्टरपंथी जमात- ए- इस्लामी और जेन-जी की नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) के दबाव में काम कर रही थी। कोशिश थी कि बांग्लादेश को उदार इस्लामिक स्टेट से कट्टरपंथी इस्लामिक देश में तब्दील कर कड़े शरिया कानून लागू किए जाएं। यानी देश में बंगाली अस्मिता की जगह मुस्लिम पहचान को तरजीह दी जाए। लेकिन बांग्लादेश के लोगों ने इस चाल को साफ नकार दिया, जिसमें वहां की महिलाओं की विशेष भूमिका रही, जो बुर्के में जिंदगी गुजारने के लिए कतई तैयार नहीं थी। जमात इस भावना को समझना नहीं चाहती थी। नतीजा यह हुआ कि अपेक्षाकृत मध्यमार्गी बीएनपी को चुनाव में बंपर जीत मिली।

उसने 299 में 209 सीटें और 49.97 फीसदी यानी आधे वोट हासिल किए, जबकि कट्टर इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी और 11 पार्टियों के गठबंधन को 68 सीटें और 31.76 प्रतिशत वोट ही मिले। शेख हसीना की सरकार को हटाकर ‘नया बांग्लादेश’ बनाने का दावा करने वाली नेशनल सिटीजन पार्टी को महज 6 सीटें और 3 फीसदी वोट ही मिले। उसके ज्यादातर प्रत्याशी चुनाव हार गए। 

इस तगडी हार के बाद जमात और एनसीपी आरोप लगा रहे हैं कि चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई। यानी माहौल तो हमारे पक्ष में था, लेकिन नतीजे विपरीत आए। मतदान ठीक हुआ, लेकिन मतगणना में हेराफेरी हुई।

हमारे कई प्रत्याशियों को मामूली अंतर से हरवा दिया गया इत्यादि। ये सभी आरोप भारत में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा चुनाव नतीजों के बाद मोदी सरकार और भाजपा पर लगाए जाने वाले आरोपों की फोटो काॅपी लगते हैं। यहां एक फर्क और है।

बांग्लादेश में मतदान बैलेट पेपर से हुआ था, जबकि भारत में ईवीएम से चुनाव होता है। कांग्रेस और विपक्ष यह आशंका बार-बार जाहिर करते रहे हैं कि चुनाव आयोग की मदद से भाजपा ईवीएम में गड़बड़ी कराती है और चुनाव जीत जाती है। लेकिन बांग्लादेश का उदाहरण बताता है कि अगर जमात और अन्य पार्टियों के आरोप सही हैं तो बैलेट पेपर में धांधली तो और भी आसान है।

यह हमने पाकिस्तान के आम चुनाव में देखा, जहां बैलेट पेपर के जरिए हुए मतदान में वहां की सेना ने खुलेआम धांधली की और शहबाज शरीफ को जितवा दिया। अमेरिका में बैलेट पेपर और मशीन दोनो के जरिए चुनाव होता है, फिर भी ट्रंप सत्ता में रहकर भी पिछला चुनाव हार गए थे।

भारत में कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां ‘वोट चोरी’ का आरोप अमूमन उन राज्यों में लगाती है, जहां भाजपा सत्ता में है। लेकिन बांग्लादेश में तो चुनाव जीती बीएनपी सत्ता से बरसों से बाहर थी, फिर वो इतने बड़े पैमाने  पर ‘गड़बड़ी’ करने में कैसे कामयाब हो गई? और जमात जैसी पार्टियां, जिनका कि सत्ता पर परोक्ष नियंत्रण था, इस ‘गड़बड़ी’ को क्यों नहीं रोक पाई? उसका यह दावा कि चुनाव के समय माहौल उनके ‘पक्ष’ में था तो मतदान के वक्त अरब सागर की हवा कैसे  बदल गई? 

हाल में भारत के राज्य तेलंगाना में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव हुए हैं। इसमें सत्तारूढ़ कांग्रेस को बंपर जीत मिली है। लेकिन ये चुनाव ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से कराए गए।

इन नतीजों से कांग्रेस ‘संतुष्ट’ है, क्योंकि उसे जीत मिली है, जबकि चुनाव नतीजों पर विपक्षी भाजपा ने सवाल उठाया अब कोई ‘जनादेश चुराने’ का आरोप क्यों नहीं लगा रा है? इसका सीधा मतलब है कि यदि नतीजा अपने पक्ष में आए तो सब ठीक और न आए तो ‘आंगन टेढ़ा।‘

अब सवाल यह है कि भारत में ईवीएम से जहां चुनाव होते हैं, वहां कांग्रेस अमूमन हार जाती है और जहां बैलेट पेपर से चुनाव होते  हैं तो जीत जाती है? यह मतदान के माध्यम और तरीके का नतीजा है अथवा जनमत की अभिव्यक्ति?

अगर ईवीएम से ही हार-जीत तय होती तो भाजपा को दक्षिणी राज्यों और बंगाल में भी भारी बहुमत से जीतना चाहिए था। क्योंकि विपक्ष के अनुसार उसके पास तो चुनाव आयोग का रिमोट कंट्रोल भी है। और अगर बैलेट पेपर से ही हार-जीत का उचित  फैसला होता हो तो बांग्लादेश में जमात और एनसीपी को बंपर जीत मिलनी चाहिए थी। 

कहने का आशय यह कि जब राजनीतिक पार्टियां जमीनी स्तर पर अपना असर नहीं छोड़ पातीं, लोगों से जुड़ने का कैडर उनके पास नहीं होता, चुनाव जीतने की जिद नहीं होती, जनमानस से पार्टियों की सोच का तालमेल नहीं बैठता या फिर वे केवल हवा में लठ घुमा कर और शाब्दिक क्रांति से ही चुनाव जीतना चाहती हैं तो यह केवल खुद को धोखे में रखना है।

चुनाव जीतने के लिए सत्ता और धन के दुरूपयोग के आरोप  अपनी जगह हैं, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण जनता की नब्ज को पकड़ना है। बांग्लादेश में भी जमात द्वारा लगाया जा रहा ‘जनादेश चोरी’ का आरोप तब सही माना जा सकता था, जब दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के बीच हार-जीत का फैसला मामूली अंतर से होता। अब कोई जनता की सोच और समझ पर ही प्रश्न चिन्ह लगाना चाहे तो लोकतंत्र में उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं हो सकता।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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