फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   assembly election results 2023 mp rajasthan and chhattisgarh and congress

विधानसभा चुनाव परिणाम और कांग्रेस: क्या एक राष्ट्रीय दल लगातार होती पराजय से सीख लेगा?

Sun, 03 Dec 2023 07:03 PM IST
Satish Alia सतीश एलिया
Updated Sun, 03 Dec 2023 07:03 PM IST
सार

सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा जैसे कांग्रेस के कथित दमदार चेहरों की इस चुनाव में नाथ के आगे कोई बिसात ही नहीं दिखी। बस सियासी बिसात पर नाथ अपने हिसाब से मोहरे बिछाते चले गए। नेतृत्व मजबूर है।

विज्ञापन
assembly election results 2023 mp rajasthan and chhattisgarh and congress
सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा जैसे कांग्रेस के कथित दमदार चेहरों की इस चुनाव में नाथ के आगे कोई बिसात ही नहीं दिखी। - फोटो : Amar Ujala Digital

विस्तार

यह बात तो खैर अपने स्तर पर वैचारिक स्तर-हीनता को प्रश्रय देने जैसी होगी कि कांग्रेस इस सबसे कोई सबक लेगी। फिर भी सच यह कि इस दल के लिए एक बार फिर दिल से सोचने का समय आ गया है कि वह किस दिशा में जा रहा है। शायद विचार के केंद्र में यह सवाल प्रमुख रहेगा कि उसे किस तरफ ले जाया जा रहा है। वह भी हांकने के अंदाज में।

विज्ञापन


छत्तीसगढ़ और राजस्थान से इतर यदि केवल मध्यप्रदेश की बात करें तो ही स्थिति को साफ समझा जा सकता है। कांग्रेस के हिस्से में एक बार फिर आई बड़ी हार कई दिशा में ध्यान खींचती है। चुनाव के पहले से ही यह साफ था कि कमलनाथ ने पूरे अभियान की कमान अपने हाथ में ले ली है। वह हाथ भी ऐसा कि उसमें पंजे की संभावनाओं का जैसे कोई स्थान ही नहीं बचा था। निश्चित ही कमलनाथ ने एक जगह जोरदार विजय हासिल की। वह पार्टी के आलाकमान को अपने आगे नतमस्तक करने में सफल रहे।
विज्ञापन

 

सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा जैसे कांग्रेस के कथित दमदार चेहरों की इस चुनाव में नाथ के आगे कोई बिसात ही नहीं दिखी। बस सियासी बिसात पर नाथ अपने हिसाब से मोहरे बिछाते चले गए। नेतृत्व मजबूर है। उसकी अपनी सीमा रेखा है। उसे आज पार्टी के प्रति नहीं, बल्कि परिवार के प्रति निष्ठा वाले लोगों की बड़ी आवश्यकता है। यह उसके लिए अनिवार्यता बन गया है, इसीलिए तो यह हुआ कि पार्टी के हित को हिट करते हुए अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट और भूपेश बघेल बनाम एमएस सिंहदेव के प्रकरण में नेतृत्व ने घुटने टेकने में कोई संकोच नहीं किया।

विज्ञापन
विज्ञापन

शीर्ष की इस कमजोरी और परिवार से नजदीकी ही नाथ ने भी फायदा उठाने में कोई चूक नहीं की। शायद घर के अंदर की इस जीत ने ही कमलनाथ के भीतर वह आत्मविश्वास पनपा दिया कि चुनाव को लेकर वह कहीं ‘वन मैन आर्मी’ तो कभी-कभी ‘लोन वूल्फ’ वाली शैली में भी आगे बढ़ने से पीछे नहीं रहे। तीन राज्यों के इस राजहठ को अपने हित और हक में प्रश्रय देने की कांग्रेस की नीति का यह नतीजा हुआ कि आज वह हिंदी-भाषी राज्यों में केवल हिमाचल प्रदेश तक सिमट कर रह गयी है।

यै तो गनीमत है कि तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति की पिता-पुत्री वाली युति के परिवारवाद ने इस राज्य में कांग्रेस को जीत का अवसर दे दिया, वरना तो आज पंजे की लकीरों से एक और राज्य के लिए राजयोग का चिन्ह भी मिट गया होता। यह सवाल उठाने का भी कोई अर्थ नहीं है कि अंतत: कौन, किस तरीके से पनौती साबित हुआ है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed