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कोरोना डायरी- 4: सन्नाटे की अनुगूंंज से उपजे मनोभाव 

Jaideep Karnik जयदीप कर्णिक
Updated Sun, 22 Mar 2020 08:21 PM IST
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coronavirus in india janta ka carfu and response
मौत के खतरे से शंकित समाज केवल घर में ही नहीं घुसा, मन के भीतर भी उतरा। - फोटो : अमर उजाला
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जैसे घड़ी की सुइयां रोकी जा रही हों। सबकुछ बंद है या किया जा रहा है। सबकुछ। जिनको लगता था कि ये तेजी से भागती दुनिया कभी रुकेगी नहीं, वो देख रहे हैं। एक विषाणु से मनुष्य की लड़ाई। ऐसी लड़ाई जिसमें विषाणु ने कुछ समय के लिए ही सही, दुनिया को थमने के लिए मजबूर कर दिया है।

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थम जाने की सूचनाएंं, जानकारी और अनुग्रह बहुत पहले शुरू हो गया था। पर अमल तब शुरू हुआ जब मुसीबत एकदम सिर पर आ खड़ी हुई। जब सख्ती भी की गई और जनता कर्फ़्यू का आग्रह किया गया। देश के प्रधानमंत्री द्वारा जनता के लिए जनता द्वारा लागू किए गए इस तरह के कर्फ़्यू का आग्रह महत्वपूर्ण है।
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दरअसल, कुछ अपवादों को छोड़कर सबकुछ मुकम्मल बंद ही रहा। पिछले 45 सालों में दंगे, फसाद, कर्फ़्यू, भारत बंद जैसे तमाम अनुभवों से गुजरते हुए भी इस तरह का दृश्य देखने को नहीं मिला। सोसायटी के गेट पर भी ताला था और सेक्टर के गेट पर भी। बस परिंदे ही पर मार रहे थे। 

मौत का भय और समाज 
मौत के खतरे से शंकित समाज केवल घर में ही नहीं घुसा, मन के भीतर भी उतरा। लोगों ने पक्षियों की चहचहाहट के वीडियो साझा किए। अपनों के साथ समय बिताने के अनुभव बताए। ये सुझाव भी बहुत आए कि अरे - ये कितना सुखद है। ये तो सन्नाटा नहीं शांति है। ये नीरव शांति हमें पसंद आ रही है।

बहुत लोगों ने लिखा, बताया कि ये तो सुकून देने वाली चुप्पी है। रेल, बस और सब गाड़ियों के पहिए थमे हुए हैं। चिमनियों से धुआंं नहीं निकला। आसमान मेंं हवाई जहाज नहीं है। कुछ है तो पक्षियों का कलरव। आज तो कुदरत भी हैरान है कि ये इंसान को क्या हो गया! ये एकदम क्यों रुक गए? 

coronavirus in india janta ka carfu and response
कोरोना वायरस ने तेज़ी से भागती इस दुनिया को ठहर कर सोचने पर मजबूर कर दिया है। - फोटो : अमर उजाला

इसे विडंबना कहें या विरोधाभास 
इसे विडंबना कहें या विरोधाभास - पर ये सब मौत की आहट के डर से हुआ। वरना इंसान की इस दौड़ती ज़िंदगी को यों थामना आसान नहीं था। एक विरोधाभास ये भी है कि जो रेल, बस, हवाई जहाज और कारखानों की चिमनी से निकलता धुआंं हमारे विकास का प्रतीक था आज उसे बंद कर वहांं पहुंचना पड़ रहा है, जहां से चले थे। इसके सही-गलत में पड़ने का ये वक्त नहीं है। बस फिलहाल ये ज़रूरी है। 

क्या हम ऐसे ही बने रहे सकते हैं। लंबे समय तक नहीं। जो ताना-बाना हमने बुना है, उसका यों ध्वंस नहीं हो सकता। हम लड़ेंगे और जीतेंगे। पर हम खुद को फिर से भी रचेंगे। इस महामारी ने हमें ये भी सिखाया है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो रुक नहीं सकता या टल नहीं सकता। इस तूफान के थम जाने के बाद हमें अपनी जीवन शैली मैं आवश्यक बदलाव करने ही होंगे।  

थमी और ठहरी हुई दुनिया 
तो जो भी हो इस कोरोना वायरस ने तेज़ी से भागती इस दुनिया को ठहर कर सोचने पर मजबूर कर दिया है। जब जान पर बन आती है तो ही हम उन सवालों के जवाब गौर से समझ रहे होते हैं जो हमें पता होते हैं पर हम उनकी अनदेखी कर भागे चले जाते हैं।

ये आत्मचिंतन का सही समय है। वायरस तो आख़िर चला ही जाएगा, हम दवाई ढूंंढ़ ही लेंगे, सो वायरस भी चला जाएगा और डर भी पर कुछ ज़रूरी बदलाव बने रहें तो बेहतर। हांं, हम हमेशा खुलकर जी सकें, ये दुनिया इस लायक तो हमेशा रहे ये कामना ज़रूरी है।

ज़रूरी ये भी है कि हमें आत्मचिंतन के लिए इस तरह की महामारी की आवश्यकता ना रहे।

जनता कर्फ़्यू ने हमें एक ही दिन में शांति और उद्घोष के दो सिरे दिखाए हैं। इन दोनों का ही अपना महत्व है। सन्नाटे की अनुगूंंज से निकाला संकल्प हमें इस महामारी से लड़ने की शक्ति दे, यही प्रार्थना है। 

चंचल हिरनी बनी डोलती
मन के वन में बाट जोहती,
वैसे तो वह चुप रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

सन्नाटे का मौन समझती
इच्छाओं का मौन परखती
सांसों के सरगम से निकले
प्राणों का संगीत समझती
तन्वंगी, कोकिलकंठी है
पीड़ाओं की चिरसंगी है
अपने निपट अकेलेपन के
वैभव में वह खुश रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

अभी कहां उसने जग देखा
किया पुण्य का लेखा-जोखा
अभी सामने सारा जीवन
उम्मीदों का खुला झरोखा
कुछ सपने उसके अपने हैं
महाकाव्य उसको रचने हैं
मन ही मन गुनती बुनती है
पर अपने धुन में रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

शब्द शब्द हैं उसकी थाती
जिनसे लिखती है वह पाती
वह कविता के अतल हृदय में
बाल रही है स्नेहिल बाती
लता-वल्लरी-सी शोभन वह
इक रहस्य-सी है गोपन वह
किन्तु हुलस कर बतियाती वह
कभी-कभी सुख-दुख कहती है
भीतर एक नदी बहती है।

कविता- ओम निश्चल

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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