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दूसरा पहलू: निर्वासित तिब्बतियों का अनूठा लोकतंत्र, अनुशासन और नैतिकता का अनोखा उदाहरण
मदन मोहन लखेड़ा
Published by: Shivam Garg
Updated Mon, 16 Mar 2026 06:52 AM IST
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सार
दुनिया भर में चुनाव अक्सर शोर और आरोप-प्रत्यारोप से घिरे रहते हैं। वहीं तिब्बती समुदाय के सरकार गठन की प्रक्रिया काफी अनोखी है।
निर्वासित तिब्बतियों का अनूठा लोकतंत्र
- फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार
ऐसे समय में जब, दुनिया भर में चुनाव अक्सर शोर, आरोप-प्रत्यारोप, ध्रुवीकरण और प्रतिस्पर्धा का पर्याय बन चुके हैं, तिब्बती समुदाय के चुनावी मॉडल में न प्रचार का कोलाहल है, न दलगत राजनीति का टकराव और न ही सत्ता के लिए मोल-भाव। 27 देशों में फैले निर्वासित तिब्बती समुदाय के बीच सरकार गठन की यह प्रक्रिया सादगी, अनुशासन और नैतिकता का अनोखा उदाहरण है। इसका केंद्र हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित मैक्लोडगंज है, जहां से दुनिया भर में फैले निर्वासित तिब्बतियों का केंद्रीय प्रशासन संचालित होता है।
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वर्ष 1959 में तिब्बत से पलायन के बाद आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के भारत में शरण लेने के साथ ही निर्वासन में एक राजनीतिक व सामाजिक संरचना खड़ी करने की आवश्यकता सामने आई। 1960 में बोधगया से इसकी नींव पड़ी और धर्मशाला निर्वासित तिब्बती प्रशासन का केंद्र बन गया। शुरुआती वर्षों में राजनीतिक अधिकार धर्मगुरु दलाई लामा के पास ही रहे, लेकिन बाद में उन्होंने स्वयं इसे अधिक लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए। 2001 में पहली बार निर्वाचित राजनीतिक प्रमुख सिक्योंग का पद अस्तित्व में आया, जो प्रधानमंत्री के बराबर का पद है। 2011 में दलाई लामा ने औपचारिक रूप से अपनी सभी राजनीतिक शक्तियां निर्वाचित नेतृत्व को सौंप दीं।
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मुख्य चुनाव आयुक्त लोबसांग येशी बताते हैं कि निर्वासित तिब्बती हर पांच वर्ष में सिक्योंग और निर्वासित संसद के 45 सदस्यों का चुनाव करते हैं। 30 सांसद भारत, नेपाल व भूटान से, 10 सांसद बौद्ध भिक्षुओं से और पांच अन्य देशों से निर्वाचित होते हैं। इस साल 90 हजार पंजीकृत मतदाताओं में से 51,140 तिब्बती लोगों ने पहले चरण के लिए फरवरी में बैलेट पेपर से मतदान किया। इसमें पेंपा सेरिंग 60 फीसदी से अधिक मतों के साथ दूसरी बार सिक्योंग बने हैं। अब अप्रैल में दूसरे चरण के चुनाव में 45 सांसद चुने जाएंगे। यही सांसद केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के सात विभागों के मंत्रियों का चुनाव करेंगे।
इस चुनावी व्यवस्था की सबसे अहम विशेषता दलीय राजनीति से दूरी है। उम्मीदवार व्यक्तिगत आधार पर मैदान में उतरते हैं। चुनाव आचार संहिता धार्मिक प्रतीकों, विशेषकर धर्मगुरु दलाई लामा की छवि के इस्तेमाल पर सख्त रोक लगाती है। निर्वासित सांसदों को कोई वेतन-भत्ता या विशेष सुविधा नहीं मिलती। दरअसल, यह चुनाव उस सामूहिक स्मृति, संघर्ष और उम्मीद को जीवित रखने का प्रयास है, जो अपने देश लौटने के सपने से जुड़ी है। यह बताता है कि लोकतंत्र की असली ताकत केवल सत्ता परिवर्तन में नहीं, बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी, अनुशासन और नैतिक प्रतिबद्धता में निहित होती है।