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बजट 2026 से उम्मीदें: घोषणाओं से आगे बढ़कर तय हो परिणामों की जवाबदेही
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सार
न्यू टैक्स रिजीम को सरल कहा जा रहा है, लेकिन क्या वह सुरक्षित भी है? यदि इसमें पीपीएफ और ईपीएफ जैसे दीर्घकालिक बचत साधनों को हतोत्साहित किया गया तो कल का बुजुर्ग आज के बजट का बोझ क्यों झेले?
निर्मला सीतारमण
- फोटो : PTI
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विस्तार
अक्सर बजट को आंकड़ों की बाजीगरी मान लिया जाता है, लेकिन सच यह है कि बजट किसी सरकार की आत्मा का एक्स-रे होता है। यह बताता है कि सत्ता में बैठे लोग किसे प्राथमिकता देते हैं? किसे केवल आश्वासन?
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इस वर्ष के बजट के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है, क्या सरकार ‘ग्रोथ’ यानी विकास और ‘इक्विटी’ यानी समानता के बीच ऐसा संतुलन बना पाएगी? जो केवल आर्थिक ग्राफ को ऊपर न ले जाए, बल्कि आम नागरिक के जीवन में भी सुरक्षा और भरोसे का एहसास पैदा करे।
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क्या विकास का अर्थ केवल जीडीपी के आंकड़े हैं या वह भी विकास है? जिसमें मध्यम वर्ग हर साल महंगाई से हारता चला जाए। सरकार को इस बार केवल टैक्स स्लैब में मामूली फेरबदल से आगे बढ़कर कर प्रणाली को अधिक मानवीय बनाना होगा। क्या यह संभव नहीं कि टैक्स स्लैब को हर साल स्वतः मुद्रास्फीति के अनुरूप समायोजित किया जाए?
यदि वेतन महंगाई के साथ नहीं बढ़ता तो कर सीमा क्यों स्थिर रहे? क्या मध्यम वर्ग की वास्तविक क्रय शक्ति की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?
न्यू टैक्स रिजीम को सरल कहा जा रहा है, लेकिन क्या वह सुरक्षित भी है? यदि इसमें पीपीएफ और ईपीएफ जैसे दीर्घकालिक बचत साधनों को हतोत्साहित किया गया तो कल का बुजुर्ग आज के बजट का बोझ क्यों झेले? क्या सामाजिक सुरक्षा केवल योजनाओं के नाम पर होगी या उसे वास्तविक बचत और भविष्य की गारंटी से जोड़ा जाएगा?
इसी तरह, जब घर खरीदना अब विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है तो होम लोन के मूलधन को 80सी की भीड़भाड़ वाली सीमा में क्यों रखा जाए? क्या एक स्वतंत्र डिडक्शन बनाकर लाखों परिवारों को स्थिरता का भरोसा नहीं दिया जा सकता?
स्वास्थ्य के मामले में सवाल और भी गंभीर हैं। क्या एक सभ्य समाज वह है, जहां बीमारी परिवार को कर्ज में डुबो दे? बजट में स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 3 प्रतिशत तक ले जाने का स्पष्ट रोडमैप क्यों नहीं होना चाहिए? क्या हर नागरिक के लिए वार्षिक स्वास्थ्य जांच को मुफ्त या सब्सिडी देना भविष्य के बड़े इलाज खर्च को कम नहीं करेगा?
कैंसर, हृदय रोग जैसी बीमारियां यदि शुरुआती स्तर पर पकड़ी जाएं तो क्या यह केवल मानव जीवन ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की भी रक्षा नहीं होगी? मानसिक स्वास्थ्य, क्या वह अब भी केवल कागजी नीति ही रहेगा या जिला स्तर पर विशेषज्ञों के साथ सक्रिय केंद्र वास्तव में काम करेंगे?
शिक्षा के क्षेत्र में आत्ममंथन जरूरी है। क्या डिग्रियों की संख्या बढ़ाने से ही युवा सक्षम हो जाएगा या अब समय ‘कौशल’ को केंद्र में रखने का है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जीडीपी के 6 प्रतिशत खर्च की बात कही गई है। क्या वह केवल दस्तावेजों में ही रहेगी? डिजिटल भारत की बात तब तक अधूरी है, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में तेज इंटरनेट हर बच्चे को नहीं मिलता।
क्या हाई-स्पीड इंटरनेट को मौलिक अधिकार की तरह नहीं देखा जाना चाहिए? यदि एआई और कोडिंग भविष्य की भाषा हैं तो छोटे शहरों और गांवों के बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय इनोवेशन फंड क्यों न हो? जो प्रतिभा को पिनकोड तक सीमित न होने दे।
महिलाओं को लेकर बजट की दृष्टि बदलनी होगी। क्या महिलाएं केवल योजनाओं की लाभार्थी हैं या वे अर्थव्यवस्था की चालक भी हो सकती हैं। जब तक केयर इकोनॉमी, क्रेच, वर्किंग हॉस्टल, सुरक्षित परिवहन, पर ठोस निवेश नहीं होगा, तब तक महिलाओं की श्रम भागीदारी कैसे बढ़ेगी? हर पांच किलोमीटर में गुणवत्तापूर्ण सरकारी क्रेच और कार्यस्थल आवास क्या कोई असंभव लक्ष्य है?
यदि महिलाओं को उद्यमी बनाना है तो ‘शिशु लोन’ की सीमा बढ़ाकर 10 लाख रुपए तक का ‘तरुण लोन’ क्यों न हो? ताकि वे छोटे नहीं, बड़े सपने देख सकें?
सवाल यही है, बजट किसके लिए है? शेयर बाजार के लिए या उस गृहिणी के लिए, जो हर महीने रसोई का हिसाब जोड़ती है? उस मरीज के लिए, जो इलाज के लिए गहने गिरवी रखने को मजबूर है? या उस युवा के लिए, जो प्रतिभा तो रखता है, लेकिन अवसर नहीं? एक आदर्श बजट वही होगा, जो केवल वित्तीय घाटे को नहीं, बल्कि ‘भरोसे के घाटे’ को भी पाटे।
अब समय आ गया है कि बजट घोषणाओं की सूची से आगे बढ़कर परिणामों की जवाबदेही तय की जाए, क्योंकि आखिरकार, बजट कोई लेखा-जोखा नहीं, बल्कि देश के नागरिकों से किया गया सबसे बड़ा सामाजिक अनुबंध होता है।
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